हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 68, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंजलदेवतातपत्रे पत्ररथकुलकलत्रान्तःपुरसौधे निजमधुमधुरामोदिनि कृतम- धुप्रमुदि मुमुदिषमाणे कुमुदवने, दिवसावसानताम्यत्तामरसमधुरमधुसपीति- प्रीते सुषुप्सति मृदुमृणालकाण्डकण्डूयनकुण्डलितकंधरे धुतपत्रराजिवीजित- राजीवसरसि राजहंसयूथे, तटलताकुसुममधूलिधूसरितसरिति सिद्धपुरपुरंध्रि- धम्मिल्लमल्लिकागन्धग्राहिणि सायंतने तनीयसि निशानिश्वासनिभे नभ- स्वति, संकोचोद्बद्ध्युच्चकेसरकोटिसंकटकुशेशयकोशकोटरकुटीशायिनि षट्- चरणचक्रे, नृत्योद्धूतधूर्जटिजटाटवीकुटजकुङ्मलनिकरनिभे नभस्तलं स्तबक-
शौक्लयं, हंसा एव वा शुक्लतया हासः । दन्तुरा एव दन्तुरिताः । ये च सहासास्ते लक्ष्यमाणदन्तद्वया दन्तुरा इव दृश्यन्ते । आतपत्रं छत्रम् । पत्ररथाः पक्षिणः । कलत्रं दाराः । मधु मकरन्दः, मद्यं च । मधुपा भ्रमराः, मद्यपाश्च । मुमुदिषमाणे विचकि- सिषति । अन्यत्र-मोदितुमिच्छति । प्रारिप्स्यमानगीतादिगोष्ठीबन्ध इति यावत् । 'मञ्चाः क्रोशन्ति' इतिवत् । ताम्यदिति । ताम्यन्ति, न तु तान्तानि, प्रदोषस्य न तावत्प्रवृत्तत्वात् । 'मधु, मद्यमपि । सपीतिस्तु सहपानम् । अनेन तु प्रेमातिशय आवेद्यते । सुषुप्सति निद्रासति । मृद्विति । कण्डूयनं विक्रियाविशेषम् । कुण्डलिता चक्रीकृता । राजीवं पद्मम् । राजहंसा इत्यत्रैकशेषः । तटशब्दः प्रत्यासत्त्युप- लक्षणार्थः । पुरंध्रिरुत्तममहिला । धम्मिल्लाः संयताः कचाः । मल्लिका भूपदी । एषा च सायंमेवोन्मिषति । सायंतने दिनान्तभवे । कोषः कुड्मलम् । कोटरमभ्य- न्तरम् । कुटी गेहम् । शयनमत्र विश्रमणम्, न. तु स्वापः, पौनरुक्त्यापत्तेः अटवीति । विवक्षितम् । तत्रैवाकृत्रिमकुसुमसंन्बन्धात् । कुटजं गिरिमल्लिका । कुङ्म-
का वाहन हंस अपनी उज्ज्वल हंसी से मन्दाकिनी की तरंगों को निम्नोन्नत बना र[हा] था। जलदेवता के छत्रस्वरूप और पक्षि-कामिनियों के अन्तःपुर के प्रासादरूप, अपन[े] मकरंद को मीठी सुगन्ध वाले, तथा भौरों को प्रसन्न करने वाले कुमुद तत्काल खि[ल] रहे थे। राजहंसों का समूह ढंपते हुए कमलों के मीठे मधु ( मकरन्द या मद्य) क[ा] सहपान करने से छक कर, गर्दन को कुण्डलित करके कोमल मृणालों द्वारा शरीर खु[ज-] लाते हुए, पंखों को फड़फड़ा कर पद्मसरोंवरों को हवा देते हुए ऊँघ रहा था। तट [की] लताओं के फूलों की धूल उड़ा कर धूसर बनाती हुई, सिद्धों के नगर को उत्त[म] महिलाओं के बंधे हुए केशपाश की मल्लिका की गंध लेकर रात की सांस के समान वा[यु] मंद-मंद बहने लगी। झुण्ड के झुण्ड भौंरे सिकुड़ जाने से पराग भरे कमलों के कोशों [की] संकीर्ण कुटिया में विश्राम करने लगे। नृत्य के समय हिलती हुई भगवान् शंकर [की] जटाटवी से कुटज फूल-जैसे गुच्छेदार तारे आकाश में छिटक गए। संध्या की लाली खि[ल]