भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 184 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 67

प्रथम उच्छ्वासः २५ Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सारिकासहस्रचरणालक्तकरसानुलिप्त इव प्रकटयति च तारापथे पाट- लताम्, तारापथप्रस्थितसिद्धदत्तदिनकरास्तमयार्घ्यावर्जिते रञ्जित- ककुभि, कुसुम्भभासि स्रवति पिनाकिप्रणतिमुदितसंध्यास्वेदसलिल इव रक्तचन्दनद्रवे, वन्दारुमुनिवृन्दारकवृन्दबध्यमानसंध्याञ्जलिवने, ब्रह्मो- त्पत्तिकमलसेवागतसकलकमलाकर इव राजति ब्रह्मलोके; समुच्चा- रिततृतीयसवनब्रह्मणि ब्रह्मणि, ज्वलितवैतानज्वलनज्वालाजटालाजि- रेष्वारब्धधर्मसाधनशिविरनीराजनेष्विव सप्तर्षिमन्दिरेषु, अघमर्षणमु- षितकिल्बिषविषगदोल्लाघलघुषु यतिषु संध्योपासनासीनतपस्विपङ्क्ति- पूतपुलिने प्लवमाननलिनयोनियानहंसहासदन्तुरितोर्मिणि मन्दाकिनीजले, लोभात्सा कथ्यते कविवरैरभिसारिकेति ॥' तारापथो नभः । आवर्जिते प्रकीर्णे । ककुभो दिशः । कुसुम्भं पद्मकम् । रक्तचन्दनद्रवे स्रवति सतीति योजना । वन्दारु वन्दनशीलम् । वृन्दारकशब्दः प्रशंसायाम् । सवनं प्रातःसंध्याह्ने सायं च सोम- यागैकदेशस्नानमित्यन्ये । ब्रह्म वेदः । वैतानो यज्ञभवः । जटालानि व्याप्तानि । अजिराण्यङ्गणानि । आरब्धे धर्मसाधने शिबिरे पुण्योपकरणस्कन्धावारे नीराज- नाख्यं शान्तिकर्म येषु । धर्मोपकरणविषये मा दोषः प्रादुरभवन्निति । 'शमनं सर्वपापानां जप्यं त्रिष्वघमर्षणम्' । गदो रोगः । उल्लाघं स्वस्थताकरम् । यत- यश्चतुर्थाश्रमिणः । सद्यो जलत्यक्तं तटं पुलिनम् । नलिनयोनिर्ब्रह्मा । हंसानां हासः इन्द्र का हाथी ऐरावत सुवर्ण के तटों पर अपने दाँतो को पांट कर बजाता हुआ स्वच्छन्द होकर मन्दाकिनी के किनारों को खोदने लगा । आकाश लाल हो गया, मानो मार्ग में इधर-उधर घूमती हुई सहस्रों विद्याधरी अभिसारिकाओं के चरणों में लगे महावर से पुत गया हो । आकाश में घूमते हुए सिद्धों द्वारा सूर्यास्त के अर्घ्यरूप में ढाला गया, दिशाओं को रंजित करता हुआ कुसुम्भी रंग का रक्तचन्दन चू रहा था, मानो शिव के प्रणाम करने में विभोर संध्या के शरीर से पसीना निकल रहा हो । वंदनशील मुनिजन अपनी सन्ध्योपासना में अंजलियाँ बाँध रहे थे, मानो ब्रह्माजी की उत्पत्ति वाले कमल की सेवा के लिए समस्त कमल इकट्ठे हों, इस प्रकार ब्रह्मलोक सुशोभित हो रहा था । ब्रह्माजी तीसरी बार ( संध्या- कालीन ) सवन ( यज्ञीय स्नान ) विषयक वेद का उच्चारण कर रहे थे । सप्तर्षियों के गृह- प्रांगण में यज्ञाग्नि की ज्वालाएँ व्याप्त थीं, मानो शिविर में धर्म का एक कार्य नीराजन (आरती) नामक शान्तिकर्म हो रहा हो । अघमर्षण मन्त्र के जप से पाप के विषाक्त रोग का विनाश हो जाने से यतिलोग स्वस्थ हो रहे थे । ( मन्दाकिनी के तट का ) पुलिन संध्यो- पासना के लिए तपस्वियों के बैठने से और भी पवित्र हो रहा था । तैरता हुआ ब्रह्मा जी CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.