भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 150 में से

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पृष्ठ 108

हिन्द स्वराज आपका धर्म किसी भी साधन से चोर को घर से निकालने का हरगिज नहीं है। जरा आगे बढ़ें। वह हथियारबंद आदमी आपकी चीज ले गया है। आपने उसे याद रखा है। आपके मन में उस पर गुस्सा भरा है। आप उस लुच्चे को अपने लिए नहीं, लेकिन लोगों के कल्याण के लिए सज़ा देना चाहते हैं। आपने कुछ आदमी जमा किए। अच्छे नतीजे लाने के उसके घर पर आपने धावा बोलने का निश्चय किया। लिए अच्छे ही साधन उसे मालूम हुआ। चाहिए और अगर सब वह भागा। उसने दूसरे लुटेरे जमा किये। वह भी नहीं तो ज्यादातर खीजा हुआ है। अब तो उसने आपका घर दिन-दहाड़े मामलों में हथियार लूटने का संदेशा आपको भेजा है। आप उसके बल से दयाबल मुकाबले के लिए तैयार बैठे हैं। इस बीच लुटेरा ज्यादा ताकतवर आपके आसपास के लोगों को हैरान करता है। वे साबित होता है। आपसे शिकायत करते हैं। आप कहते हैं: "यह सब हथियार में हानि है, मैं आप ही के लिए तो करता हूँ मेरा माल गया उसकी दया में कभी नहीं। तो कोई बिसात ही नहीं" लोग कहते हैं: "पहले तो वह हमें लूटता नहीं था। आपने जब से उसके साथ लड़ाई शुरू की है तभी से उसने यह काम शुरू किया है।" आप दुविधा में फँस जाते हैं। गरीबों के ऊपर आपको रहम है। उनकी बात सही है। अब क्या किया जाए? क्या लुटेरे को छोड़ दिया जाए? इससे तो आपकी इज़्ज़त चली जायेगी। इज़्ज़त सबको प्यारी होती है। आप गरीबों से कहते हैं: "कोई फिक्र नहीं। आइये, मेरा धन आपका ही है। मैं आपको हथियार देता हूँ। मैं आपको उनका उपयोग सिखाऊंगा। आप उस बदमाश को मारिए, छोड़िए नहीं", यों लड़ाई बढ़ी। लुटेरे बढ़े। लोगों ने खुद होकर मुसीबत मोल ली। चोर से बदला लेने का परिणाम यह आया कि नींद बेचकर जागरण मोल लिया। जहाँ शांति थी वहाँ अशांति पैदा हुई। पहले तो जब मौत आती तभी मरते थे। अब तो सदा ही मरने के दिन आए। लोग हिम्मत हारकर पस्तहिम्मत बने। इसमें मैंने बढ़ा- चढ़ाकर कुछ नहीं कहा है, यह आप धीरज से सोचेंगे तो देख सकेंगे। यह एक साधन हुआ। 107