हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछुटकारा पाठक : आपके विचारों से ऐसा लगता है कि आप एक तीसरा ही पक्ष कायम करना चाहते हैं। आप एक्स्ट्रीमिस्ट भी नहीं हैं और मॉडरेट भी नहीं हैं। संपादक : यहाँ आपकी भूल होती है। मेरे मन में तीसरे पक्ष का कोई ख़्याल नहीं है। सबके विचार एक से नहीं रहते। मॉडरेटों में भी सब एक ही विचार के हैं, ऐसा नहीं मानना चाहिए। जिसे लोगों की सेवा ही करनी है, उसके लिए पक्ष जो लोग उनके दबाव से चुप रहे कैसा ? मैं तो मॉडरेटों की सेवा करूँगा और होंगे वे लड़ेंगे, फोड़े को एक्स्ट्रीमिस्टों की भी करूँगा। जहाँ उनके दबाकर रखने से कोई फायदा विचार से मेरी राय अलग पड़ेगी वहाँ मैं नहीं। उसे तो फूटना ही चाहिए। उन्हें नम्रता से बताऊंगा और अपना काम इसलिये अगर हमारे भाग्य में करता चलूँगा। आपस में लड़ना ही लिखा होगा पाठक : अगर आप दोनों से कहना चाहें तो तो हम लड़ मरेंगे। उसमें कमजोर क्या कहेंगे ? को बचाने के बहाने किसी दूसरे संपादक : एक्स्ट्रीमिस्टों से मैं कहूँगा कि को बीच में पड़ने की ज़रूरत आपका हेतु हिन्दुस्तान के लिए स्वराज्य नहीं है। इसी से तो हमारा हासिल करने का है। स्वराज्य आपकी सत्यानाश हुआ है। इस तरह कोशिश से मिलने वाला नहीं है। स्वराज्य कमज़ोर को बचाना उसे और तो सबको अपने लिए पाना चाहिए और भी कमज़ोर बनाने जैसा है। सबको उसे अपना बनाना चाहिए। दूसरे मॉडरेटों को इस बात पर अच्छी लोग जो स्वराज्य दिला दें वह स्वराज्य नहीं तरह विचार करना चाहिए। है, बल्कि परराज्य है। इसलिए सिर्फ़ अंग्रेजों को बाहर निकाला कि आपने स्वराज्य पा लिया, ऐसा अगर आप मानते हों तो वह ठीक नहीं है। सच्चा स्वराज्य जो मैंने पहले बताया वही होना चाहिए। उसे आप गोला-बारूद से कभी नहीं पायेंगे। गोला-बारूद हिन्दुस्तान को सधेगा नहीं। इसलिए सत्याग्रह पर ही भरोसा रखिए। मन में ऐसा शक भी पैदा न 141