हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 150 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्द स्वराज्य से चले जाएँगे या बदल जाएँगे। ■ दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह जो यह समझेगा कि मातम के वक्त मौज- शौक नहीं हो सकते। जब तक हमें चैन नहीं है तब तक हमारा जेल में रहना या देश निकाला भोगना ही ठीक है। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह यह समझेगा कि लोगों को समझाने के बहाने जेल में न जाने की खबरदारी रखना निरा मोह है। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह यह समझेगा कि कहने से करने का असर अद्भुत होता है, हम निडर होकर जो मन में है वही कहेंगे और इस तरह कहने का जो नतीजा आये उसे सहेंगे, तभी हम अपने कहने का असर दूसरों पर डाल सकेंगे। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह यह समझेगा कि हम दुःख सहन करके ही बंधन यानी गुलामी से छूट सकेंगे। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह समझेगा कि अंग्रेजों की सभ्यता को बढ़ावा देकर हमने जो पाप किया है, उसे धो डालने के लिए अगर हमें मरने तक भी अंडेमान में रहना पड़े, तो वह कुछ ज्यादा नहीं होगा।
स्वराज्य की सच्ची खुमारी उसी को हो सकती है, जो आत्मबल अनुभव करके शरीर बल से नहीं दबेगा और निडर रहेगा तथा सपने में भी तोप बल का उपयोग करने की बात नहीं सोचेगा। सच्ची खुमारी उसी हिन्दुस्तानी को रहेगी, जो आज की लाचार हालत से बहुत ऊब गया होगा और जिसने पहले से ही जहर का प्याला पी लिया होगा।
■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह समझेगा कि कोई भी राष्ट्र दुःख सहन किये बिना ऊपर चढ़ा नहीं है। लड़ाई के मैदान में भी दुःख ही कसौटी होता है, न कि दूसरे को मारना। सत्याग्रह के बारे में भी ऐसा ही है। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह समझेगा कि यह कहना कुछ न करने के लिए एक बहाना भर है कि ‘जब सब लोग करेंगे तब हम भी करेंगे’। हमें ठीक लगता है इसलिए हम करें, जब दूसरों को ठीक लगेगा तब वे करेंगे, यही करने का सच्चा रास्ता है। अगर मैं स्वादिष्ट भोजन देखता हूँ, तो उसे खाने के लिए दूसरे की राह नहीं देखता। ऊपर कहे मुताबिक प्रयत्न करना, दुःख सहना यह स्वादिष्ट भोजन है। ऊब कर लाचारी से करना या दुःख सहना निरी बेगार है। 147