भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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हिन्द स्वराज ■ जो वकील होने के कारण अपने ज्ञान का उपयोग सिर्फ़ लोगों को समझाने और लोगों की आँखें खोलने में करेगा। ■ जो वकील होकर वादी-प्रतिवादी, मुद्दई और मुद्दालय के झगड़ों में नहीं पड़ेगा, अदालतों को छोड़ देगा और अपने अनुभव से दूसरों को अदालतें छोड़ने के लिए समझाएगा। ■ जो वकील होते हुए भी जैसे वकालत छोड़ेगा वैसे न्यायाधीशपन भी छोड़ेगा। ■ जो डॉक्टर होते हुए भी अपना पेशा छोड़ेगा और समझेगा कि लोगों की चमड़ी चोंथने के बजाय बेहतर है कि उनकी आत्मा को छुआ जाए और उसके बारे में शोध-खोज करके उन्हें तंदुरुस्त बनाया जाए। ■ जो डॉक्टर होने से समझेगा कि खुद चाहे जिस धर्म का हो, लेकिन अंग्रेजी फार्मेसियों में जीवों पर जो निर्दयता की जाती है, वैसी निर्दयता से बनी हुई दवाओं से शरीर को चंगा करने के बजाय बेहतर है कि शरीर रोगी रहे। ■ जो डॉक्टर होने पर भी खुद चरखा चलायेगा और जो लोग बीमार होंगे उन्हें उनकी बीमारी का सही कारण बताकर उसे दूर करने के लिए कहेगा, निकम्मी दवाएँ देकर उन्हें गलत लाड़ नहीं लड़ायेगा। वह तो यही समझेगा कि निकम्मी दवाएँ न लेने से बीमार की देह अगर गिर भी जाए, तो उससे दुनिया अनाथ नहीं हो जाएगी और यही मानेगा कि उसने बीमार पर सच्ची दया की है। ■ जो धनी होने पर भी धन की परवाह किये बिना अपने मन में होगा वही कहेगा और बड़े से बड़े सत्ताधीश की भी परवाह न करेगा। ■ जो धनी होने से अपना रुपया चरखे चालू करने में खरचेगा और खुद सिर्फ़ स्वदेशी माल का इस्तेमाल करके दूसरों को भी ऐसा करने के लिए बढ़ावा देगा। ■ दूसरे हर हिन्दुस्तानी की तरह जो यह समझेगा कि यह समय पश्चाताप का, प्रायश्चित्त का और शोक का है। ■ जो दूसरे हर हिन्दुस्तानी की तरह यह समझेगा कि अंग्रेजों का क़ुसूर निकालना बेकार है। हमारे क़ुसूर की वजह से वे हिन्दुस्तान में आये, हमारे क़ुसूर के कारण ही वे यहां रहते हैं और हमारा क़ुसूर दूर होगा तब वे यहाँ 146