हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्द स्वराज सीखेंगे। इस तरह हम एक-दूसरे से लाभ उठायेंगे और सारी दुनिया को लाभ पहुँचायेंगे, लेकिन यह तो तभी हो सकता है जब हमारे संबंध की जड़ धर्म क्षेत्र में जमे। पाठक : राष्ट्र से आप क्या कहेंगे ? हम मानते हैं कि संपादक : राष्ट्र कौन ? आपकी क़ायम की पाठक : अभी तो आप जिस अर्थ में यह शब्द काम हुई शालाएँ और अदालतें हमारे किसी में लेते हैं उसी अर्थ वाला राष्ट्र यानी जो लोग यूरोप काम की नहीं हैं। की सभ्यता में रंगे हुए हैं, वो स्वराज्य की आवाज़ उठा उनके बजाय हमारी रहे हैं। पुरानी असली संपादक : इस राष्ट्र से मैं कहूँगा कि जिस शालाएँ और अदालतें हिन्दुस्तानी को स्वराज्य की सच्ची खुमारी यानी मस्ती ही हमें चाहिए। चढ़ी होगी, वही अंग्रेजों से ऊपर की बात कह सकेगा और उनके रौब से नहीं दबेगा। सच्ची मस्ती तो उसी को चढ़ सकती है, जो ज्ञान पूर्वक समझ बूझकर यह मानता हो कि हिन्द की सभ्यता सबसे अच्छी है और यूरोप की सभ्यता चार दिन की चाँदनी है। वैसे सभ्यताएँ तो आज तक कई हो गयीं और मिट्टी में मिल गयीं, आगे भी कई होंगी और मिट्टी में मिल जाएँगी। सच्ची खुमारी उसी को हो सकती है, जो आत्मबल अनुभव करके शरीर बल से नहीं दबेगा और निडर रहेगा तथा सपने में भी तोप बल का उपयोग करने की बात नहीं सोचेगा। सच्ची खुमारी उसी हिन्दुस्तानी को रहेगी, जो आज की लाचार हालत से बहुत ऊब गया होगा और जिसने पहले से ही ज़हर का प्याला पी लिया होगा। ऐसा हिन्दुस्तानी अगर एक ही होगा तो वह भी ऊपर की बात अंग्रेजों से कहेगा और अंग्रेजों को उसकी बात सुननी पड़ेगी। ऊपर की माँग माँग नहीं है, वह हिन्दुस्तानियों के मन की दशा को बताती है। माँगने से कुछ नहीं मिलेगा, वह तो हमें खुद लेना होगा। उसे लेने की हममें ताक़त होनी चाहिए। यह ताक़त उसी में होगी : ■ जो अंग्रेजी भाषा का उपयोग लाचारी से ही करेगा। ■ जो वकील होगा तो अपनी वकालत छोड़ देगा और खुद घर में चरखा चलाकर कपड़े बुन लेगा। 145