भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 150 में से

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पृष्ठ 39

हिन्द स्वराज पाठक : जब आपके ऐसे ख़्याल हैं तो जिन अंग्रेजों के नाम से पार्लियामेन्ट राज करती है उनके बारे में अब कुछ कहिये, ताकि उनके स्वराज्य का पूरा ख़्याल मुझे आ जाए। संपादक : जो अंग्रेज 'वोटर' हैं, उनकी धर्म पुस्तक (बाइबल) तो है अखबार। वे अखबारों से अपने विचार बनाते हैं। अखबार अप्रामाणिक होते हैं, एक ही बात को दो शक्लें देते हैं। एक दल वाले उसी बात को बड़ी बनाकर दिखलाते हैं, तो दूसरे दल वाले उसी को छोटी कर डालते हैं। एक अखबार वाला किसी अंग्रेज नेता को प्रामाणिक मानेगा, तो दूसरा अखबार वाला उसको अप्रामाणिक मानेगा। जिस देश में ऐसे अखबार हैं उस देश के आदमियों की कैसी दुर्दशा होगी? पाठक : यह तो आप ही बताइये। संपादक : उन लोगों के विचार घड़ी-घड़ी में बदलते हैं। उन लोगों में यह कहावत है कि सात-सात बरस में रंग बदलता है। घड़ी के लोलक की तरह वे इधर-उधर घूमा करते हैं। जमकर वे बैठ ही नहीं सकते। कोई दौर-दमाम वाला आदमी हो और उसने अगर बड़ी-बड़ी बातें कर दीं या दावतें दे दीं, तो वे नक्कारची की तरह उसी के ढोल पीटने लग जाते हैं। ऐसे लोगों की पार्लियामेन्ट भी ऐसी ही होती है, उनमें एक बात ज़रूर है। वह यह कि वे अपने देश को खोयेंगे नहीं। अगर किसी ने उस पर बुरी नजर डाली तो वे उसकी मिट्टी पलीद कर देंगे, लेकिन इससे उस प्रजा में सब गुण आ गये या उस प्रजा की नक़ल की जाए, ऐसा नहीं कह सकते। अगर हिन्दुस्तान अंग्रेज प्रजा की नक़ल करे तो हिन्दुस्तान पामाल हो जाए, ऐसा मेरा पक्का ख़्याल है। पाठक : अंग्रेज प्रजा ऐसी हो गई है, इसके आप क्या कारण मानते हैं? संपादक : इसमें अंग्रेजों का कोई ख़ास कुसूर नहीं है, पर यूरोप की आजकल की सभ्यता का कुसूर है। वह सभ्यता नुकसानदेह है और उससे यूरोप की प्रजा पामाल होती जा रही है। 38