हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
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पक्के दिल के होंगे, तो तीसरे की कुछ नहीं चलेगी। यह काम हिन्दू आसानी से कर सकते हैं। उनकी संख्या बड़ी है, वे अपने को ज्यादा पढ़े-लिखे मानते हैं, इसलिए वे पक्का दिल रख सकते हैं। दोनों क़ौमों के बीच अविश्वास है, अगर दो भाई चाहते हों कि इसलिए मुसलमान लॉर्ड मॉर्ले से कुछ हक उनका आपस में मेल बना रहे, माँगते हैं। इसमें हिन्दू क्यों विरोध करें? तो कौन उनके बीच में आ अगर हिन्दू विरोध न करें तो अंग्रेज चौंकेंगे, सकता है ? अगर तीसरा आदमी मुसलमान धीरे-धीरे हिन्दुओं का भरोसा दोनों के बीच झगड़ा पैदा कर करने लगेंगे और दोनों का भाईचारा बढ़ेगा। सके, तो उन भाइयों को हम अपने झगड़े अंग्रेजों के पास ले जाने में हमें कच्चे दिल के कहेंगे। उसी तरह शरमाना चाहिए। ऐसा करने से हिन्दू कुछ अगर हम हिन्दू और मुसलमान खोने वाले नहीं हैं, इसका हिसाब आप खुद कच्चे दिल के होंगे, तो फिर लगा सकेंगे। जिस आदमी ने दूसरे पर अंग्रेजों का कुसूर निकालना विश्वास किया, उसने आज तक कुछ खोया बेकार होगा। कच्चा घड़ा एक नहीं है। कंकड़ से नहीं तो दूसरे कंकड़ मैं यह नहीं कहना चाहता कि हिन्दू- से फूटेगा ही। घड़े को बचाने मुसलमान कभी झगड़ेंगे ही नहीं। दो भाई का रास्ता यह नहीं है कि उसे साथ रहें तो उनके बीच तकरार होती है। कंकड़ से दूर रखा जाए। कभी हमारे सिर भी फूटेंगे। ऐसा होना ज़रूरी नहीं है, लेकिन सब लोग एक सी अक्ल के नहीं होते। दोनों जोश में आते हैं तब अक्सर गलत काम कर बैठते हैं। उन्हें हमें सहन करना होगा, लेकिन ऐसी तकरार को भी बड़ी वकालत बघारकर हम अंग्रेजों की अदालत में न ले जाएँ। दो आदमी लड़ें, लड़ाई में दोनों के सिर या एक का सिर फूटे तो उसमें तीसरा क्या न्याय करेगा ? जो लड़ेंगे वे जख्मी भी होंगे। बदन से बदन टकरायेगा तब कुछ निशानी तो रहेगी ही। उसमें न्याय क्या हो सकता है?
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