हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्द स्वराज वे मजदूर से ज्यादा रोजी क्यों माँगते हैं ? उनकी जरूरतें मजदूर से ज्यादा क्यों हैं ? उन्होंने मजदूर से ज्यादा देश का क्या भला किया है ? क्या भला करने वाले को ज्यादा पैसा लेने का हक है ? और अगर पैसे के खातिर उन्होंने भला किया हो, तो उसे भला कैसे कहा जाए ? यह तो उस पेशे का जो गुण है वह मैंने बताया। वकीलों के कारण हिन्दू-मुसलमानों के बीच कुछ दंगे हुए हैं, यह तो जिन्हें अनुभव है वे जानते होंगे। उनसे कुछ खानदान बरबाद हो गए हैं। उनकी बदौलत भाइयों में ज़हर दाखिल हो गया है। कुछ रियासतें वकीलों के जाल में फँसकर क़र्ज़दार हो वे मजदूर से ज्यादा रोजी गयी हैं। बहुत से गरासिये इन वकीलों की क्यों माँगते हैं ? उनकी कारस्तानी से लुट गए हैं। ऐसी बहुत सी मिसालें जरूरतें मजदूर से ज्यादा दी जा सकती हैं। क्यों हैं ? उन्होंने मजदूर से लेकिन वकीलों से बड़े से बड़ा नुकसान तो ज्यादा देश का क्या भला यह हुआ है कि अंग्रेजों का जुआ हमारी गर्दन पर किया है ? क्या भला मजबूत जम गया है। आप सोचिये ! क्या आप करने वाले को ज्यादा मानते हैं कि अंग्रेजी अदालतें यहाँ न होतीं तो वे पैसा लेने का हक है ? हमारे देश में राज कर सकते थे ? ये अदालतें और अगर पैसे के खातिर लोगों के भले के लिए नहीं हैं। जिन्हें अपनी सत्ता उन्होंने भला किया हो, तो कायम रखनी है, वे अदालतों के जरिये लोगों को उसे भला कैसे कहा बस में रखते हैं। लोग अगर खुद अपने झगड़े जाए ? यह तो उस पेशे निबटा लें, तो तीसरा आदमी उन पर अपनी सत्ता का जो गुण है वह मैंने नहीं जमा सकता। बताया। सचमुच जब लोग खुद मार-पीट करके या रिश्तेदारों को पंच बनाकर अपना झगड़ा निबटा लेते थे तब वे बहादुर थे। अदालतें आयीं और वे कायर बन गये। लोग आपस में लड़कर झगड़े मिटायें, यह जंगली माना जाता था। अब तीसरा आदमी झगड़ा मिटाता है, यह क्या कम जंगलीपन है ? क्या कोई ऐसा कह सकेगा कि तीसरा आदमी जो फैसला देता है वह सही फैसला ही होता है ? कौन सच्चा है, यह दोनों पक्ष के लोग जानते हैं। हम भोलेपन में मान लेते हैं कि तीसरा आदमी हमसे पैसे लेकर हमारा इन्साफ़ करता है। इस बात को अलग रखें। हकीकत तो यही दिखानी है कि अंग्रेजों ने 75