भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

हिन्द स्वराज्य अदालतों के ज़रिये हम पर अंकुश जमाया है और अगर हम वकील न बनें तो ये अदालतें चल ही नहीं सकतीं। अगर अंग्रेज ही जज होते, अंग्रेज ही वकील होते और अंग्रेज ही सिपाही होते, तो वे जहाँ झगड़े नहीं होते सिर्फ़ अंग्रेजों पर ही राज करते। हिन्दुस्तानी जज वहाँ भी वे झगड़े खड़े और हिन्दुस्तानी वकील के बगैर उनका काम चल करते हैं। उनके दलाल नहीं सका। वकील कैसे पैदा हुए, उन्होंने कैसी जोंक की तरह गरीब धाँधल मचाई, यह सब अगर आप समझ सकें, लोगों से चिपकते हैं तो मेरे जितनी ही नफ़रत आपको भी इस पेशे के और उनका खून चूस लिए होगी। अंग्रेजी सत्ता की एक मुख्य कुंजी लेते हैं। वह पेशा ऐसा है उनकी अदालतें हैं और अदालतों की कुंजी वकील कि उसमें आदमियों को हैं। अगर वकील वकालत करना छोड़ दें और झगड़े के लिए बढ़ावा वह पेशा वेश्या के पेशे जैसा नीच माना जाए, तो मिलता ही है। वकील अंग्रेजी राज एक दिन में टूट जाए। वकीलों ने लोग निठगे होते हैं। हिन्दुस्तानी प्रजा पर यह तोहमत लगवाई है कि हमें झगड़े प्यारे हैं और हम कोर्ट-कचहरी रूपी पानी की मछलियाँ हैं। जो शब्द मैं वकीलों के लिए इस्तेमाल करता हूँ, वे ही शब्द जजों पर भी लागू होते हैं। ये दोनों मौसेरे भाई हैं और एक-दूसरे को बल देने वाले हैं। 76