हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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उसे केवल एक ही उत्तर देता था कि—"जो चाहें हट जांय। मैं किसी को विवश नहीं करता, पर मैं अपनी जगह से नहीं हिल सकता। हट कर मैं नाना साहब और भाऊ को कौन-सा मुंह दिखलाऊंगा ? मैं लड़ाई में अब्दाली का सामना करूंगा और यदि ईश्वर की इच्छा हुई तो या तो उसे मिटा दूंगा, या लड़ते हुए अपने प्राण दे दूंगा।" इसी बीच में, गाज़ीउद्दीन को पता लग गया कि बादशाह पठानों के षड्यन्त्र में शामिल है और इस प्रकार मुझे मार कर मेरा पद छीनना चाहता है। अतएव उसको पृथक् करके मार डाला और दूसरे मनुष्य को गद्दी पर बिठा कर मरहठी सेना से जा मिला ! दत्ताजी ने अपनी प्रतिज्ञानुसार ही कुरुक्षेत्र में अब्दाली का सामना किया। उसकी व्यक्तिगत वीरता के कारण मरहठे सिपाही इतने उत्तेजित हो उठे कि अब्दाली को विवश होकर पीछे हटना पड़ा और उसे विश्वास हो गया कि वह अकेला सींधिया का सामना करने में असमर्थ है। अतएव उसने यमुना पार करने का उद्योग किया, जिसमे सफलता प्राप्त करने के पश्चात् शुक्रताल पर नजीबखां की सेना से जा मिला। शुजा भी अहमदखां, बङ्गश और कुतबशाह के साथ उनसे वहां जा मिला। मुसलमानों का गुट इस बार इतना दृढ़ हो गया जितना इससे पहले कभी नहीं हुआ था। जब यह स्पष्ट दिखाई देने लगा कि इस ज्वार का रोकना अकेले दत्ताजी के लिये असम्भव है। इसलिये उसके सलाहकारों ने एक बार फिर पीछे हटने के लिये कहा। पर उस वीर ने पहले ही की तरह दृढ़ उत्तर दिया "जो चाहें चले जांय, दत्ताजी अवश्य क्षत्रिय-धर्म का पालन करेगा"। इस वीर सेनापति के मुख से निकले हुये ये शब्द निरर्थक न गये, प्रत्युत इनका बड़ा प्रभाव पड़ा और किसी ने उसका साथ न छोड़ा। १० जनवरी सन् १७६० ई० को मरहठी सेना यमुना के घाट के लिये रवाना हुई, ताकि वह अब्दाली को, जो यमुना पार करने के उद्योग में था, पीछे हटाये। लड़ाई प्रारम्भ हुई और क्रमशः बायाजी,