भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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अब्दाली बड़ी भारी सेनाओं के साथ बढ़ा आ रहा था। अटक और लाहौर में पड़ी हुई मरहठों की छोटी २ सेनाओं को इस सुविशाल फौज के मुकाबले में परास्त होना पड़ा। मरहठों के अतिरिक्त हिन्दुओं की दूसरी एकमात्र शक्ति, जिसने बड़ी वीरता से उत्तर-भारत में मुसलमानों का सामना किया, उन सिखों की थी जो अभी २ विकसित हो रहे थे। इन बहादुर शूरवीरों ने शक्तिभर उन्हें रोकने तथा उनको नष्ट करने का प्रयत्न किया। पर अभी तक ये लोग सुसंगठित नहीं थे, अतः वे अपने सूबे को भी स्वतन्त्र न कर सके। वह समय अभी आने वाला था। मार्ग में उसका किसी ने विशेषरूप से मुकाबला न किया। इस प्रकार वह अविरुद्ध गति से शीघ्र ही अपनी सेना सहित सरहिन्द पहुँच आया। राज- पूताने तथा अन्य स्थानों के बहुत से राजे और राजकुमार अब्दाली से सहानुभूति रखते थे—उसी अब्दाली के साथ जिसने कि हिन्दुओं के पवित्र स्थान मथुरा का नाश किया था और जो हिन्दुओं का कट्टर वैरी था। केवल एक दत्ताजी की सेना थी जो अब्दाली के "दिल्ली- सम्राट्" बनने के मार्ग में बाधक थी। दत्ताजी ने होल्कर को शीघ्र सहायता के लिये आने को लिखा, पर नजीब के उस धर्मपिता, सेनापति होल्कर ने अपने को छोटे २ सरदारों के साथ लड़ने में व्यस्त रखना ही उचित समझा। इस प्रकार अपार शत्रु-सेना में फंसी हुई मरहठा फौज को अपना जान बचाने का केवल एक मार्ग था कि वह दिल्ली छोड़ कर हट जाय। प्रत्येक अनुभवी और शूरवीर पुरुष ने दत्ताजी पर जोर दिया कि होल्कर के आने तक यहां से हट चलिये। उसके वीर भतीजे जनको जी राव ने भी यही प्रार्थना की, पर दत्ताजी ने किसी की एक न मानी। जब वह अनुभव करने लगा कि मेरे भोलेपन के कारण ही इस सेना की यह दुर्गति हुई तो वह चिन्ता-सागर में डूब गया। उसने हिन्दुओं के कट्टर दुश्मन नजीब की जान बचाई थी और उस पर विश्वास किया था। पर अब उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब इस ओर अधिक भीरुता न दिखायेगा। इसलिये जो भी उससे पीछे हटने को कहता, वह