भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 254 में से

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[ १०१ ] विमोहित हो गया कि उसने नजीबखां की, गंगा पार करने के लिये नावों का पुल बनाने की प्रतिज्ञा पर पूर्ण विश्वास कर लिया। बगल पर हमला करने में एक ओर मरहठों को देर होती गई, दूसरी ओर नजीबखां उनके विरुद्ध मुसलमानों का गुट तैयार करने की विशेष सुविधा मिलती गई। इस कार्य में उसे इतनी सफलता प्राप्त हुई कि उसने दिल्ली के बादशाह की हस्ताक्षरयुक्त एक चिट्ठी अब्दाली के पास भेज दी जिसमें उससे एक बार फिर भारत पर आक्रमण करने की प्रार्थना की गई। इस उत्साह भरी प्रार्थना ने धार्मिक-हठी पठानों को धर्म और अल्लाह के नाम पर जगा दिया। क्या अब्दाली हिन्दुस्तान को विध- र्मियों और मूर्ति-पूजकों के पंजे से छुड़ाकर मुसलमानी बादशाहत को बचाकर धर्म का रक्षक नहीं हो जायगा ? उधर अब्दाली भी अपने लड़के की हार से लज्जित हुआ पड़ा था, क्योंकि मरहठों ने हिन्दुस्तान का ताज उसके हाथ से छीन लिया था। उन्हों ने उसे मुल्तान और पंजाब से निकाल ही नहीं दिया था वे तो प्रत्युत काबुल और कंधार पर भी "हिन्दुस्तान के राज्य का भाग होने" का दावा करने लगे थे। और इसका बदला वह कुछ भी न ले सका था। अब वह फिर भारत पर आक्रमण करने, इस राज्य को अधिकृत करने तथा मरहठों की हिन्दू- पद-पादशाही स्थापित करने की महत्त्वाकांक्षा को, जो सामान्यतः सम्पूर्ण हो चुकी थी, नाश करने को उद्यत हो गया। उसने इस गुट का नेता बनने का वचन दे दिया और एक बड़ी सेना के साथ सिन्ध पार करके लाहौर ले लिया। अब्दाली के हमले का समाचार ज्यों ही दिल्ली पहुँचा, नजीबखां ने नकाब उतार दी और खुल्लमखुल्ला अब्दाली का अनुयायी बन गया। अब दत्ताजी को पेशवा की आज्ञा की अवहेलना करने की अपनी भूल मालूम हुई और उसने यह समझ लिया कि नजीब और शुजा ने पूरी तरह धोखा देकर उसे दुश्मनों के बीच घेरकर फंसा दिया है। शुजा एक तरफ था और दूसरा ओर नजीब, रुहेले तथा पठान थे। पीछे से

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