भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

[ १०७ ] जाट ही मरहठों की सहायता के लिये आये । भाऊ ने स्वयं आगे कर बड़ी प्रतिष्ठा के साथ उनका स्वागत किया और दोनों ने पवित्र जल स्पर्श करके अन्त तक शत्रु से युद्ध करने की शपथ खाई। अब सब की आँखें दिल्ली की ओर फिरीं । हिन्दू और दोनों ही ऐतिहासिक राजधानी दिल्ली को अधीन करने का महत्व करने लगे। भाऊ ने सिन्धिया, होल्कर और बलवन्तराव मेहेंदडाले सेनाओं को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये भेजा । पठानों ने, इस पर अधिकार जमाये बैठे थे, बड़े उत्साह के साथ सामना किया- मरहठों के साथ देर तक लड़ने में असमर्थ होने के कारण उन्होंने में शहर को मरहठों के हाथ सुपुर्द कर दिया। शहर विजय मरहठा-सेना ने किले पर आक्रमण किया । मुसलमानों ने किले की के लिये बड़ी वीरता दिखलाई, पर मरहठों के सामने एक न चली उनकी भयंकर शक्तिशाली तोपों ने मुसलमानों के किले पर उनका अधि- कार रखना असम्भव कर दिया । मुसलमानी सेना ने हार मान ली राजधानी और किला हाथ आ जाने का समाचार सुनकर, हिन्दू-आन्दो- लन के पक्षपाती सभी मनुष्यों ने बड़ी खुशी मनाई । मरहठी-सेना ने बड़ी धूमधाम से दिल्ली में प्रवेश किया और ने मरहठी ध्वजा पाण्डवों की राजधानी में गाड़ दी। पृथ्वीराज के हिन्दू या दृग्भक्त सेना के लिये यह पहला ही अवसर था जबकि एक स्वतन्त्र झण्डे के तले इस उत्सव के साथ दिल्ली में प्रविष्ट हुई। आखिरकार पठानों, रुहेलों, मुगलों, तुर्कों, शेखों और सैयदों के प्रयत्न करने पर भी मुसलमानी हलाली झण्डा हिन्दुस्तान की राजधानी पर स्थिर न रह सका और उसके स्थान पर हिन्दू-पद-पादशाही का झण्डा लहराने लगा। शक्तिशाली मुस्लिम फ़ौज के साथ यमुना के दूसरे किनारे पर पड़ा हुआ अब्दाली कुछ भी न कर सका। सदाशिवराव अनुभव करने लगा कि चाहे एक ही दिन के लिये