भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 254 में से

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पृष्ठ 108

[ १०८ ] क्यों न हो, हिन्दू-पद-पादशाही का स्वप्न मेरी आँखों के सामने पूर्ण हो ही गया। यदि कोई जाति अपनी वीरता से एक दिन के लिये भी ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर सके, तो वह दिन सचमुच उसकी नसों में जीवन का रक्त प्रवाहित होने का ज्वलन्त प्रमाण है। ऐसा भाग्यशाली दिन, अपनी अल्प आयु में भी, अपनी विकसित शोभा में शताब्दियों की सफलताओं, सत्कर्मों, प्रसन्नताओं और आपत्तियों तथा कठिनाइयों को आँखों के सामने ला देता है। एक उसी दिन ने भली-भाँति साबित कर दिया कि सात सौ वर्ष के मुसलमानों के अन्याय हिन्दुओं की आत्माओं या उनके फिर युवावस्था प्राप्त करने के विचार को कुचल न सके। उन्होंने केवल अपने आपको उनके बराबर ही साबित नहीं किया, प्रत्युत उन पर विजय भी प्राप्त की। भाऊ यदि चाहता तो विश्वासराव को सारे भारतवर्ष का महा- राजाधिराज बना देता और इस प्रकार उसने हिन्दू-पद-पादशाही का आरम्भ कर दिया होता। लेकिन इस बात में शीघ्रता न करके उसने राजनैतिक बुद्धिमत्ता का पर्याप्त परिचय दिया। उसने सोचा कि मरहटों के डर से हिचकने वाले मुसलमान ही नहीं, बल्कि ऐसा करने से उत्तर- भारत के सारे हिन्दू-राजे भी शत्रु बन जायेंगे; तो भी उसने सब लोगों की परीक्षा करने और इस अद्वितीय शुभ अवसर का दुश्मन और दोस्त दोनों पर समयोचित प्रभाव डालने का निश्चय कर लिया। इसलिये इस महान् कार्य के उपलक्ष में उसकी आज्ञा से एक शाही दरबार किया गया जिसमें विश्वासराव ने सभापति का आसन ग्रहण किया। उसमें महाराष्ट्र के प्रत्येक भाग के प्रतिनिधि उपस्थित थे। इतना ही नहीं, बल्कि शूर- वीरता, वैभव, राजनीति, कुशलता और विद्वत्ता सब वहां सुशोभित थीं। दरबार आरम्भ हुआ। अश्वारोही सेना और तोपखाने, सहस्रों घोड़े और हाथी तथा कई हज़ार सिपाही और योद्धा जो हिन्दू-झण्डे को उत्तर में गोदावरी से सिन्ध तक और दक्षिण में समुद्र-तट तक ले गये थे; सहस्र नरसिंगों, तुरहियों, बन्दूकों और फ़ौजी ढोलों के साथ विजय की