हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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स्वामी बना दिया। अब्दाली अपने शत्रुओं के स्वभाव से भली-भांति परिचित था और उनकी योग्यता का भी उसे पूर्ण ज्ञान था। ज्यों ही पानीपत में विजय प्राप्त हुई, अब्दाली ने सोचा कि यदि मैं शीघ्र अपने देश को न लौटा तो जो थोड़ा सा लाभ प्राप्त हुआ है, वह भी मुझे विवश होकर खो देना पड़ेगा। नाना साहब ने पानीपत के युद्ध में बचे हुए सरदारों और आदमियों को इकट्ठे कर लिया था। मल्हारराव होल्कर, विट्ठल शिवदेव, नरोशङ्कर, जानोजी भोंसले तथा अन्यान्य मरहठे- सरदार अपनी-अपनी सेनाओं के साथ ग्वालियर में एकत्र होने लगे और उनके साथ नानासाहब दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये आगे बढ़ा। मरहठों के इस विचार को जान कर शुजा और नजीबखां भी कांप उठे, उन्हें निश्चय हो गया कि पानीपत के युद्ध में विजय प्राप्त करने का यह अर्थ नहीं है कि मरहठों पर विजय प्राप्त कर ली है। अतएव उन्होंने स्वतन्त्र रूप से सुलह की बात-चीत करनी प्रारम्भ की और नाना साहब के पास, जो ग्वालियर तक आ पहुँचा था, चापलूसी-भरे पत्र भेजने लगे। शुजा इस तथ्य को भली-भांति जानता था कि अब्दाली न ही अकेले, और न ही औरों की सहायता से हिन्दुओं को कुचल सकता है और न ही मुगल राज्य के लड़खड़ाते भवन को गिरने से बचा ही सकता है। अतः मुसलमानों की सेनाओं में भगदड़ मच गई। प्रत्येक सेना अपने बचाओ का उपाय सोचने लगी। इसलिये शुजा ने भी अब्दाली का साथ छोड़ दिया। अब्दाली दिल्ली लौट आया और वहां एक-दो सप्ताह ठहरा। नाना साहब ५०,००० सेना लेकर दिल्ली की ओर बड़ी तेज़ी के साथ आ रहा था। जब यह समा- चार पहुँचा कि अब्दाली के देश पर फारस वालों ने आक्रमण किया है तो अब्दाली का ध्यान उसी ओर गया और चिन्तित हो दिल्ली और दिल्ली के राज्य को छोड़ कर सन् १७६१ ई० में मार्च के महीने में सिन्ध को पार कर के जल्दी से वह अपने देश को लौट गया। इस प्रकार जिन इच्छाओं से प्रेरित होकर उसने सिन्ध पर आक्रमण किया