भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 254 में से

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करने का दृढ निश्चय कर लिया ताकि वह उत्तर भारत स्थित मरहठा सेना की पराजय और उससे उत्पन्न बुराइयों का लाभ न उठा सके। यद्यपि उसका व्यक्तिगत शोक सचमुच असहनीय था और उसका स्वास्थ्य पहले ही से खराब था, तो भी अपनी जाति और सम्बन्धियों के बदला लेने और अब्दाली को हराने के भाव ने उसे चैन न लेने दिया। उसने समस्त उत्तर-भारत के हिन्दू-राजाओं को बड़े जोरदार शब्दों में पत्र लिखे जिनमें उसने लिखा कि आप लोगों ने युद्ध से अलग रह कर तमाशा देखने की जो आत्मघातिनी नीति ग्रहण की है उस पर धिक्कार है। और शत्रुओं की ओर उनका ध्यान दिलाते हुए लिखा कि आप के धर्म के शत्रु तथा हिन्दुत्व के विरोधी सब मिलकर हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के नाश करने के लिये सुसंगठित उद्योग कर रहे हैं, अतः आप लोगों का युद्ध से अलग हाथ पर हाथ धरे रहना ठीक नहीं है। उस ने लोगों को हिन्दू धर्म की स्वतन्त्रता के युद्ध में अपनी सहायता करने के लिये निमन्त्रित किया और उन्हें विश्वास दिलाया कि यद्यपि हमें पानीपत के युद्ध में हार हुई तो भी मैं मुग़लों के नष्ट राज्य के स्थान पर अब्दाली का दूसरे मुसलिम-राज्य के स्थापित करने की महत्वाकांक्षा को निष्फल कर दूंगा। उस ने लिखा, "यह सत्य है कि मेरा नवयुवक राजकुमार विश्वासराव अभिमन्यु की तरह युद्ध करता हुआ स्वर्गगामी हुआ। मेरे भाई भाऊ और वीर जानकोजी के विषय में किसी को मालूम नहीं कि उनके साथ क्या बनी। इसके साथ कई अन्य सेना पति और सरदार भी मारे गये। लेकिन इन बातों की कोई चिंता नहीं करनी चाहिये। आख़िर यह युद्ध है। हार और जीत का प्रश्न बहुधा संयोग और ईश्वरेच्छा पर निर्भर रहता है। अतः इस का विशेष नहीं। इन सब के होते हुए भी हम इस के लिये प्रयत्न करेंगे।" इस अक्षय दृढ़ता तथा डटे रहने के गुण ने, जिसे मरहठों ने इस विकट जातीय नाश के समय भी प्रकट किया, उन्हें हिन्दुस्तान का

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