हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १३० ]
पुनरुत्थान के प्रयत्न को अपनी वीरता और साहस द्वारा असफल बना रहे थे, उन्हीं दिनों सिक्खों को अपने तईं एक शक्तिशाली मंडल में संगठित करने का अवकाश मिल गया। पानीपत के युद्ध में इतनी बड़ी हानि उठा कर अब्दाली ने पंजाब के राज्य को अपने राज्य में मिलाने का जो थोड़ा बहुत सुख स्वप्न देखा था इस नई शक्ति ने उसमें भी से वंचित कर दिया। अब पंजाब महाराष्ट्रीय हिन्दुओं के हाथ से निकल जाने पर भी मुसलमानों के हाथ में न रह सका। अब्दाली के प्रस्थान करते ही पंजाब के हिन्दुओं ने उनके मोर्चों पर आक्रमण कर दिया और यद्यपि वह दोबारा सिंध पार करके आया तो भी उन्होंने अपनी मातृ-भूमि को स्वतन्त्र करा ही लिया। शीघ्र ही मरहठों ने भी दिल्ली में प्रवेश किया और एक बार फिर वे सम्पूर्ण भारतवर्ष की सर्वश्रेष्ठ राज्य-शक्ति बन गये। सिक्खों ने भी सोचा कि वे कभी भी अपना शासन अपने प्रांत की सीमाओं के पार, पूर्व की ओर दिल्ली तक न बढ़ा सकेंगे तो भी वे इतने शक्तिशाली हो गये थे कि अपनी रक्षा बाहर से आने वाले शत्रुओं से भलीभांति कर सकते थे। अतः फिर कभी भयानक हठधर्मी तथा लोभी पठानों या तुर्कों की इच्छा सिन्धु पार करने की न हुई। उलटे सिक्खों ने ही सिन्धु नदी पार कर के अपनी जातीय ध्वजा को बड़ी धूमधाम से काबुल नदी के किनारे तक पहुंचा कर शत्रुओं को नतमस्तक होने पर विवश किया। उनके आतंक से मुसलमान इतने भयभीत हो गये थे कि पठानों के घरों में सिक्खों का नाम लेकर छोटे २ बच्चों को डराया जाता था। पान-हिन्दू-दृष्टि से देखा जाये तो मुसलमान सर्वथा अपना स्वार्थ सिद्ध करने में असमर्थ रहे। उन्होंने पानीपत की लड़ाई में विजय तो अवश्य प्राप्त की पर इस विजय में वे उस युद्ध में हार गये जिसे उन्होंने हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित करने वालों के विरुद्ध उठाया था, और पानीपत के साथ साथ उन्हें सारे हिन्दुस्तान अर्थात् अटक से लेकर समुद्र तक के सारे प्रदेश को हिन्दुओं के अधीन छोड़ना पड़ा।