भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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[ १३१ ] पर उन्हीं दिनों जब कि हिन्दू इस बड़ी लड़ाई को उत्तर भारत में अपने यवन विरोधियों के साथ लड़ रहे थे, एक तीसरा लड़ाका इस भीषण तमाशे को देखता रहा और धूर्तता से धीरे २ लड़ने वालों की श्रेणी में आने का प्रबन्ध करने लगा । पानीपत की लड़ाई से इन्हें ही सब से अधिक प्रसन्नता हुई क्योंकि पानीपत की लड़ाई से हिन्दू और मुसलमान दोनों शक्तिहीन हो रहे थे । अतः मरहठों को बंगाल पर आक्रमण करने के निश्चय को किसी अन्य समय के लिये उठाना पड़ा । पानीपत की लड़ाई के वास्तविक विजेता न हिन्दू थे और न मुसलमान- वरन ये धूर्त षड्यन्त्रकारी अँग्रेज थे जो कि उस युद्ध को ध्यानपूर्वक देखते रहे और उन दोनों की दुर्बलताओं का लाभ उठाते रहे । यद्यपि यह बात सत्य है कि पानीपत की लड़ाई ने ईस्ट इण्डिया- कम्पनी को कुछ दिनों के लिये और जीवन-प्रदान कर दिया और मरहठों को विवश किया कि वे अँग्रेज़ों के साथ अपना अंतिम हिसाब- किताब करने के विचार को स्थगित कर दें, तथापि यह सोचना भूल है कि केवल इस लड़ाई से ही अंग्रेज़ों को कोई बड़ा स्थायी लाभ हुआ हो क्योंकि हम आगे देखेंगे कि मरहठों ने शीघ्र ही पानीपत की क्षति को पूरा कर लिया था । यदि मरहठों में घरेलू झगड़े न उत्पन्न हुए होते तथा उनके सुयोग्य नेताओं की असामयिक मृत्युएं न हुई होती तो पानीपत में हार होने पर भी उन्होंने अंग्रेज़ों को भी जीत लिया होता । अंग्रेज़ों की सफलता मरहठों के पानीपत में हारने के कारण उतनी अधिक न हुई जितनी कि अन्त समय उनमें आपस में लड़ाई हो जाने के कारण हुई । इस विषय में मेजर इवानमब्राल लिखता है—"पानीपत की लड़ाई भी मरहठों के लिये गौरव और विजय ही सिद्ध हुई । मरहठे हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियों के लिये लड़े, पर उनके हार जाने पर भी विजयी