भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 132

[ १३२ ] अफ़गानों को अपने देश को लौट जाना पड़ा और इसके पीछे उन्होंने कभी हिन्दुस्तान के कामों में हाथ न डाला।" जब अब्दाली के शीघ्र लौट जाने का समाचार और शुजा तथा नजीबखां के प्रार्थना-पत्र मरहठों के पास पहुँचे तो उनकी प्रसन्नता का पारावार न रहा। नारोशंकर ने पानीपत की लड़ाई के दो महीने पश्चात् लिखा था—"ईश्वर का धन्यवाद है कि धर्म के स्तम्भ मरहठे हरिभक्तों की सेना अब भी हिन्द की स्वामिनी है।" सेनापति का यह वीरता-पूर्ण अंतिम वाक्य क्रमशः एक के पश्चात् दूसरे मरहठे की ज़बान से सुनाई देने लगा और सभी कहने लगे 'इसकी कोई चिन्ता नहीं, आखिर यह युद्ध है, हम इसके लिये पुनः प्रयत्न करेंगे।" इसी बीच में नानासाहब का स्वास्थ्य क्रमशः शोचनीय होता गया क्योंकि अन्तिम दो वर्षों से उनका शरीर शिथिल होता जा रहा था और इसी समय पानीपत का दुःखद समाचार उनको मिला। उन्होंने शूरवीरों की भांति इसे सहन करने का प्रयत्न किया, अपनी व्यक्तिगत दुःख-वेदना को छिपाकर अपनी जाति को इतना उत्साहित और इस योग्य बनाया कि वह अपनी पराजय का बदला ले सकें और बढ़कर एक शक्तिशाली और विजयी जाति बन जायें। किन्तु उसके हृदय में विश्वास, भाऊ तथा बहादुर सैनिकों और सिपाहियों की मृत्यु का दुःख ऐसा बैठ गया था कि कोई भी वस्तु उन्हें सांत्वना प्रदान न कर सकी। इनका स्वास्थ्य पहले ही से बिगड़ता जाता था, इस चिन्ता ने दशा और भी शोचनीय बना दी और अन्त में वे २३ जून सन् १७६१ ईस्वी को इस असार संसार से चल बसे। उस समय उनकी अवस्था केवल ४१ वर्ष की थी। इस प्रकार मरहठों के एक वीर नेता की असामयिक मृत्यु ने सारी प्रजा को दुःख सागर में डुबो दिया। उनकी योग्यता और उनके चरित्र के सम्बन्ध में यहां कुछ लिखना व्यर्थ है। उन्हें उनके कार्य, शब्दों की अपेक्षा अधिक बतला सकते हैं।