भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पागल होकर बेतहाश दौड़ा जा रहा था। अन्त में राघोबा को उसके साथियों ने भी छोड़ दिया और उसे अपनी जाति द्वारा ही पराजित होना पड़ा। इसके पश्चात् वह निर्लज्ज बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी जाति के सब से कुटिल शत्रु की शरण में चला गया। सारी जातियों और रियासतों में से, जिनकी इच्छा अब भी भारतवर्ष में प्रधान शक्तिशाली बनने की थी, किसी ने भी मरहठों को सर्वश्रेष्ठ शक्ति मानने से इन्कार नहीं किया। जब तक सारा महाराष्ट्र इस महान हिन्दू साम्राज्य के अन्तर्गत संगठित होकर काम करता रहा, तब तक जिस किसी ने मरहठों को ललकारा, वह या तो बिल्कुल नष्ट कर दिया गया या उसको ऐसा नीचा दिखा कर दबाया गया कि वह क्रोध से भरा हुआ जमीन पर पड़ कर धूल चाटने लगा, अर्थात् मरहठों की पराधीनता में भलीभांति जकड़ दिया गया। मुसलमान—चाहे वे पठान, फारसी, मुगल या तुर्क थे अथवा वे सिंध पार के या भारतवर्ष के रहने वाले थे— ऐसे कुचल दिये गये कि उन्होंने पीछे, फिर कभी हिन्दूराज्य के सामने सिर न उठाया। वे अब भारतवर्ष के राजनैतिक क्षेत्र से एक प्रकार से मिटा दिये गये थे। प्रतिद्वंदी शक्तियों में एक पुर्तगेज़ों की शक्ति थी जिसने एक बार अपना प्रभाव अर्द्ध एशिया के ऊपर जमा लिया था। अब वह भी महाराष्ट्र शक्ति द्वारा अधःपतन की दशा को प्राप्त हो गई थी, क्योंकि पुर्तगेज़ कोंकण की स्वतन्त्रता की लड़ाई में इतने निर्बल कर दिये गये थे कि फिर कभी अपनी पूर्व शक्ति न प्राप्त कर सके। फ्रेंचों ने भी कभी मरहठों का खुली तौर पर सामना करने का साहस न किया। यद्यपि उन्हों ने कई बार हैदराबाद और अरकाट द्वारा पूना पर प्रभाव जमाने का प्रयत्न किया, किन्तु हर बार असफल होते रहे। इसके दो कारण थे, प्रथम यह कि यूरोप में उनका दूसरों के साथ युद्ध हो रहा था, जिस के कारण वे भारत में हिन्दू साम्राज्य के मार्ग में कंटक नहीं बनना चाहते थे। दूसरी बात यह थी कि वे भलीभांति जानते थे कि यही एक शक्ति है जो उनके प्रतिद्वंदी अंग्रेजों की नीच इच्छा को पूरी न होने देगी। अंग्रेजों