भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 176

[ १७८ ] हिन्दू-राजे और राव भी मुसलमानों और अंग्रेजों की सहायता से मरहठों की एकमात्र हिन्दू शक्ति का-जो कि भारत में एक हिन्दू-साम्राज्य स्थापित करने के समर्थ थी-विरोध करने लगे। उनका यह विरोध स्वाभा- विक ही था, पर इसके साथ ही यह बड़े अभाग्य की बात भी थी। जयपुर और जोधपुर के दो बड़े हिन्दू-राज्यों ने मिलकर एक संगठित दल तैयार किया। यह संगठन इतना शक्तिशाली बनाया गया था, जितना बड़ा वे आज तक मुसलमानों अथवा अंग्रेजों के विरुद्ध कभी न बना सके थे। फिर मुसलमानी सेनाओं से मिलकर इन लोगों ने लालसोटे के स्थान पर सोंधिया की फ़ौज से भीषण युद्ध किया। जिस समय घमसान का युद्ध हो रहा था, उसी समय सारी शाही मुसलमानी सेना एक इशारे पर, जो पहिले ही से नियत था, महादजी का साथ छोड़ राजपूतों से जा मिली। इस धोखे और विश्वासघात के कारण मरहठों को घोर पराजय उठानी पड़ी। पर वीर मरहठा सेनापति महादजी इससे तनिक भी विचलित न हुए और निर्भयतापूर्वक फ़ौरन अपनी सेना को एकत्रित करने लगे। मरहठा सेनापति लाखोवा दादा के अधीन आगरे का किला था, मुसलमानों ने उस पर बहुत दबाव डाल रखा था, परन्तु मरहठा सेनापति ने डट कर मुकाबला किया इस प्रकार उसने महादजी के शत्रुओं की बाढ़ को रोके रखा। ठीक इसी समय नजीबखां का पोता गुलामकादिर, जिसे मरहठे अभी तक भूले न थे और जिसे उन्होंने क्षमा नहीं किया था, महादजी के हाथों से दिल्ली की रक्षा करने के लिये, रुहेलों और पठानों की फ़ौज लिये आ पहुंचा। मूर्ख बादशाह के प्रोत्साहन से वह दिल्ली में घुस आया। महादजी उसी समय राजपूत और मुसलमानों की संयुक्त-शक्ति से आगरे में युद्ध कर रहे थे। उन्हों ने पहले से ही इन दुर्घटनाओं की सूचना नाना को लिख भेजी थी और स्पष्टतया बतला दिया था कि इन सब आफ़तों की जड़ केवल अंग्रेज़ ही हैं। अंग्रेज़ सामने होकर मरहठों का सामना करने का साहस न रखते थे। उन्होंने कई बार सामना करने