हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १७७ ] वजीर घोषित करने और शाही सेना भी उन्हीं के अधिकार में करने तथा दिल्ली और आगरे के दो सूबों का समस्त प्रबन्ध उन्हीं के हाथ में सौंप देने के लिए विवश होना पड़ा। इस प्रकार सिंधिया ने मुसलमानी साम्राज्य के कफ़न में अंतिम कील भी गाड़ दिया। इतना ही नहीं, बल्कि पेशवा को उसने "वजीर-ए-मुतलिक" के पद से विभूषित किया, और मुगल-सम्राट् के नाम पर उसे राज्य करने का अधिकार दिया तथा उसे महाराजाधिराज बना दिया इसके बदले में उसने ( ६५,००० ) पैंसठ हजार रुपये अपने निजी खर्च के लिये मांगे और नाममात्र का बादशाह कहलाने का हक भी मांगा। इस चकित कर देने वाली घटना और राज्य प्रबन्ध के परिवर्त्तन से उस समय कैसी दशा उत्पन्न हो गई थी उसका वर्णन उस समय के एक मरहठा संवाददाता के शब्दों मे किया जाता है-'राज्य हम लोगों का हो गया; मुग़ल सम्राट् प्रसन्नतापूर्वक पेंशनर होकर हमारे हाथ में है, वह अब भी बादशाह कहलाता है और यही उसकी इच्छा है। हम भी कुछ देर के लिये उसे ऐसा ही बनाये रखेंगे।” इसी प्रकार जब अंग्रेजों ने भी यह अधिकार प्राप्त कर लिया था तब वे भी इस प्रकार १८५७ तक ऐसा ही आडम्बर रचे रहे। महादजी ने इस घटना को हिन्दुओं पर किया उच्च आदर्श के रूप में रखने की इच्छा से सारे भारत में यह आज्ञा घोषित करा दी कि कहीं गोवध न हो। यह राजनीतिक परिवर्तन काग़ज़ों तक ही सीमित न रहा। उन्होंने सारे बुरे और हानिकारक नियमों को बन्द करना प्रारम्भ कर दिया और उनके स्थान पर महाराष्ट्र-मण्डल के हिन्दू-साम्राज्य के नियम प्रचलित कर दिये। महादजी ने सब से पहला काम यह किया कि अंग्रेजों को शाही- कर, मरहठों की चौथ और सरदेशमुखी देने के लिये कहा। उसके बाद उसने उन सूबेदारों और ज़मीदारों पर लगान लगाई जो कई वर्षों से स्वतन्त्र राजाओं की भांति कार्य कर रहे थे। महादजी के इस पग उठाने के कारण भारतवर्ष में तूफ़ान सा मच गया। सरदार, अमीर, खां-सब-के सब मरहठों से युद्ध करने के लिये तैयार हो गये, इतना ही नहीं, बल्कि