भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 254 में से

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पृष्ठ 174

[ १७६ ] वे न्यायोचित सत्कार्यों के करने में भी धर्म की हानि समझते थे। धर्मान्धक मुसलमानों को छोड़कर ऐसे निष्ठुरता और अत्याचार के कामों को करने का भला कौन काफ़िर (हिन्दू) साहस कर सकता है ? दक्षिण के हिन्दुओं को दुराग्रही टीपू के क्रोध से मुक्त करने के बाद अपनी सम्पूर्ण सैनिक शक्ति को एकत्रित करके मरहठों ने उत्तर के शत्रुओं को दबाने का अवसर पाया, जिन्हें अकेले महादजी सींधिया ही अबतक रोके हुये थे। सालबाई के सुलहनामे के अनन्तर महादजी उत्तर को चले गए थे। उनके हृदय पर अग्रेज़ सेनापति के मातहत सुशिक्षित फौज का बड़ा प्रभाव था। उन्होंने भी पान पत के वीर सदाशिवराव भाऊ के उपाय को प्रयोग में लाने का निश्चय किया। सदाशिवराव ने ही सर्वप्रथम अपनी सेना को युरोपियनों की तरह बाक़ायद क़वायद और डिसिप्लन की शिक्षा दी थी-महादजी ने डा०बोइन नामक एक फ्रांसीसी जैनरल को रखकर एक विशाल सेना इस भांति सुसज्जित की जो किसी भी यूरोपियन सेना का भलीभांति सामना कर सकती थी इस प्रकार उन्होंने अपने आपको इस योग्य बना लिया कि उत्तर के सारे शत्रुओं को अपनी शर्तों पर संधि करने पर विवश किया। यद्यपि अंगरेज़ों ने यह प्रतिज्ञा की थी कि भारतवर्ष के बादशाह अर्थात् दिल्ली की राजनीति से उनका कोई सम्बन्ध न रहेगा और मरहठे जो चाहें कर सकेंगे, तो भी वे लोग असन्तोष फैलाते रहे और छिपे २ शाह आलम को अपने हाथ में रखने और उसे मरहठों के पास जाने से रोककर महादजी के रास्ते में रोड़े अटकाने से बाज़ न आये। यह सब कुछ होते हुये भी महादजी बादशाही राजनीति की बागडोर बड़ी मज़बूती के साथ अपने हाथों में पकड़े रहे। उन्होंने बादशाह को दिल्ली में लाकर वज़ीर की जगह के लिये मुसलमान प्रतिद्वं- द्वियों को हराया। मुसलमान और अङ्गरेज़ों को यह जानकर बहुत ही अधिक दुःख हुआ कि अन्त में बादशाह को महादजी को ही अपना

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