भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 254 में से

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पृष्ठ 173

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अन्य मरहठे सेनापतियों ने एकत्रित होकर अपनी सेना को १० करने तथा भागों में विभाजित कर दिया, तथा शत्रुके बदामी आदि किलों २७ देने अधिकार कर लिया और उन्हें इतना तंग कर दिया कि ये विवश हो गये के तथा उन बेचारों ने भागकर पर्वतों की खोहों में शरण ली; पर हिन्दू सेना ने उस मुसलिम धर्मवीर टीपू को, जिसने हिन्दू-स्त्रियों, बच्चों और शांतिप्रिय साधुओं को सताने तथा उनकी बालिकाओं को धर्मभ्रष्ट करने में भारी ख्याति प्राप्त करली थी, वहां पर भी सुखपूर्वक न रहने दिया। जब टीपू ने देखा कि एक शक्तिशाली हिन्दू राज्य उसका सत्यानास कर के संसार में कहीं भी उसे शान्तिपूर्वक नहीं रहने देता तो उसने सुलह की प्रार्थना की। यद्यपि सहस्रों हिन्दू और उनकी बालिकाओं ने धर्मरक्षा के लिये अपने प्राण निछावर कर दिये तथापि टीपू सुलतान की तलवार की धार मुड़ने की अपेक्षा और तेज होती गई, यहां तक कि विवश होकर उनके (हिन्दुओं के) धर्मरक्षक को उनकी सहायता के लिये सेना भेजनी पड़ी। इस प्रकार हर तरह से विवश होकर टीपू ने नारगुन्द, कित्तूर और बादामी की रियासतों को मरहठों के हवाले किया तथा बकाया लगान का तीस लाख रुपया भी उसी समय दे दिया और उसी वर्ष पन्द्रह लाख रुपया और देने की प्रतिज्ञा की। अगर चाहते तो मरहठे भी अपनी शक्ति के जोर से मुसलमानों को हिन्दू बना कर उन मौलवी-मौलानाओं को, जो टीपू की आज्ञानुसार हिन्दुओं पर भांति-भांति के अन्याय और अत्याचार कर उनकी शिखा कटवा रहे थे, शिखा धारण करने पर विवश करते, परन्तु उन्होंने न तो मस्जिदें गिरवायीं और न बलपूर्वक मुसलमान लड़कियों को उनके घरों से निकाला या अन्य धर्मावलम्बियों को संगीनों के जोर से हिन्दू-धर्म में लाने का प्रयत्न किया। ऐसी सभ्यता और वीरता के काम तो मरहठों की शक्ति से बाहर थे क्योंकि इन लोगों ने तैमूर, टीपू, अल्लाउद्दीन और औरङ्गजेब की तरह कुरान की शिक्षा न पाई थी, इसलिये

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