भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पर्वत की चोटी पर खड़े होकर उच्च स्वर से कहा कि ऐसा करना भूल है; क्योंकि यद्यपि यह बात सत्य है कि मुसलमान होने की अपेक्षा मर जाना अधिक श्रेयस्कर है तथापि इससे भी बढ़ कर यह बात श्रेयस्कर है कि हम लोग प्रयत्न करें कि हमें कोई मुसलमान न बना सके और न हम मारे जायं। हमें अत्याचार करने वाली शक्ति को ही नष्ट कर देना चाहिये। मर जाना अच्छा है, पर विधर्मियों को मारते हुए प्राण दे देना इस से भी श्रेष्ठ है। उनके सैकड़ों चेले इस सिद्धान्त को छिपे २ मठों में जा जा कर लोगों को समझाने लगे। घर २ में इसका प्रचार होने लगा और उन्होंने लोगों को समझाया कि केवल कांटों के छत्र की ही इच्छा मत रक्खो, बल्कि असली विजय के ताज के लिये भी उसके साथ ही प्रयत्न करते जाओ। इन सब बातों को जानते हुए भी टीपू सुल्तान ने औरङ्गजेब की भांति जबर्दस्ती हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का कार्य आरम्भ कर दिया जबकि महाराज शिवाजी के वंशज अभी तक पूना में राज्य कर रहे थे। सहस्रों ब्राह्मणों तथा आन्ध्र, करनाटक और तामिल प्रान्त के हिन्दुओं का करुण आर्तनाद पूना पहुँचा; उन लोगों ने मुसलमानों के हाथों से मुक्ति दिलाने के लिये मरहठों से प्रार्थना की। क्या ब्राह्मण-राज्य इस बात को सहन कर सकता था ? क्या मरहठों का हिन्दू-राज्य कृष्णा नदी के पार रहने वाले अपने धर्म-सब- न्धियों की इस दुर्दशा को सुनकर कभी चुप बैठा रह सकता था ? नहीं; यह सर्वथा असम्भव था। टीपू का ऐसा करना मरहठों को युद्ध के लिये ललकारना था; जिसे उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर लिया, और यद्यपि उनकी सेना उत्तरी भारतवर्ष में लड़ने में व्यस्त थी, तोभी नाना ने अपने सधर्मियों की सहायतार्थ तुरन्त ही कर्णाटक की ओर प्रयाण कर दिया। निज़ाम को भी उसने अपनी ओर इस शर्तपर मिला लिया कि टीपू के राज्य का जो भाग वे जीतेंगे, उसका तीसरा भाग उसको देंगे। इस के बाद उसने मरहठी सेना को अपनी सम्पूर्ण शक्ति से धर्मांध टीपू पर आक्रमण करने की आज्ञा दी, जिसके अनुसार पटवर्धन बेहरे तथा