भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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ने टीपू को हराया और उसे सन्धि करने पर विवश किया, जिसके अनुसार टीपू को चौथ का पिछला सारा बकाया चुकाना पड़ा और उसे नारगुन्द पर अत्याचार न करने की प्रतिज्ञा करनी पड़ी। किन्तु मरहठों के पीठ फेरते ही उसने सारी प्रतिज्ञा पर पानी फेर दिया। नारगुन्द का क़िला ले लिया और अपने पूर्वजों का अनुकरण करते हुए राजा तथा उनके समस्त परिवार को निर्दयतापूर्वक मरवा डाला और राजा की लड़की को अपने अन्तःपुर में ले गया। तत्पश्चात मानो स्वर्ग के समस्त सुखों पर एकाधिपत्य प्राप्त करने और पाक मौलवियों तथा मुसलिम इतिहास-लेखकों से दीनरक्षक, ग़ाज़ी, औरङ्गज़ेब और तिमूर इत्यादि महान् पदवियाँ पाने के लिये उसने कृष्णा और तुङ्गभद्रा के बीच की हिन्दू-जनता पर घोर पाशविक अत्याचार करने आरम्भ कर दिये। इसलाम मज़हब क़बूल कराने के लिये जितने प्रकार के कष्ट देते बन पड़े, टीपू ने एक को भी न छोड़ा; और धर्म-रक्षा में तत्पर मरहठों को मानों धत्ता बताने के लिये ही उसने बलपूर्वक हज़ारों मनुष्यों की सुन्नत करा डाली तथा उन पर हर प्रकार के पाशविक अत्याचारों का प्रयोग किया। हमें इस बात की ओर विशेष ध्यान देना चाहिये कि जो लोग मुसलमानों द्वारा युद्ध में मारे गये, यद्यपि उन्होंने अपने प्राण शिवाजी और श्री स्वामी समर्थ रामदास जी के उपदेशानुसार संगठित होकर लड़ते हुए समर्पण न किये थे तथापि यह तो अवश्य था कि इन लोगों ने अपमानित होने की अपेक्षा मृत्युमुख में जाना अधिक अच्छा समझा, क्योंकि एक दो नहीं बल्कि दो सहस्र से भी अधिक ब्राह्मणों ने, जिन्हें टीपू हठात् मुसलमान बनाना चाहता था, अपने धर्म से च्युत हो घृणा- स्पद बनने की अपेक्षा बलिदान हो जाने में गौरव समझ कर अपने को धर्म पर निछावर कर दिया। मरहठों के आन्दोलन से पहले ही धर्म पर बलिदान होना लोगों की प्रतिदिन की दिनचर्या थी, अर्थात् हिन्दुओं ने मुसलमानी धर्म ग्रहण करने की अपेक्षा शरीर त्याग कर देना उचित समझ रक्खा था। श्री स्वामी रामदास जी ने सह्याद्रि