भारतकोश
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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

[ १७६ ] वे न्यायोचित सत्कार्यों के करने में भी धर्म की हानि समझते थे। धर्मान्धक मुसलमानों को छोड़कर ऐसे निष्ठुरता और अत्याचार के कामों को करने का भला कौन काफ़िर (हिन्दू) साहस कर सकता है ? दक्षिण के हिन्दुओं को दुराग्रही टीपू के क्रोध से मुक्त करने के बाद अपनी सम्पूर्ण सैनिक शक्ति को एकत्रित करके मरहठों ने उत्तर के शत्रुओं को दबाने का अवसर पाया, जिन्हें अकेले महादजी सींधिया ही अबतक रोके हुये थे। सालबाई के सुलहनामे के अनन्तर महादजी उत्तर को चले गए थे। उनके हृदय पर अग्रेज़ सेनापति के मातहत सुशिक्षित फौज का बड़ा प्रभाव था। उन्होंने भी पान पत के वीर सदाशिवराव भाऊ के उपाय को प्रयोग में लाने का निश्चय किया। सदाशिवराव ने ही सर्वप्रथम अपनी सेना को युरोपियनों की तरह बाक़ायद क़वायद और डिसिप्लन की शिक्षा दी थी-महादजी ने डा०बोइन नामक एक फ्रांसीसी जैनरल को रखकर एक विशाल सेना इस भांति सुसज्जित की जो किसी भी यूरोपियन सेना का भलीभांति सामना कर सकती थी इस प्रकार उन्होंने अपने आपको इस योग्य बना लिया कि उत्तर के सारे शत्रुओं को अपनी शर्तों पर संधि करने पर विवश किया। यद्यपि अंगरेज़ों ने यह प्रतिज्ञा की थी कि भारतवर्ष के बादशाह अर्थात् दिल्ली की राजनीति से उनका कोई सम्बन्ध न रहेगा और मरहठे जो चाहें कर सकेंगे, तो भी वे लोग असन्तोष फैलाते रहे और छिपे २ शाह आलम को अपने हाथ में रखने और उसे मरहठों के पास जाने से रोककर महादजी के रास्ते में रोड़े अटकाने से बाज़ न आये। यह सब कुछ होते हुये भी महादजी बादशाही राजनीति की बागडोर बड़ी मज़बूती के साथ अपने हाथों में पकड़े रहे। उन्होंने बादशाह को दिल्ली में लाकर वज़ीर की जगह के लिये मुसलमान प्रतिद्वं- द्वियों को हराया। मुसलमान और अङ्गरेज़ों को यह जानकर बहुत ही अधिक दुःख हुआ कि अन्त में बादशाह को महादजी को ही अपना

[ १७७ ] वजीर घोषित करने और शाही सेना भी उन्हीं के अधिकार में करने तथा दिल्ली और आगरे के दो सूबों का समस्त प्रबन्ध उन्हीं के हाथ में सौंप देने के लिए विवश होना पड़ा। इस प्रकार सिंधिया ने मुसलमानी साम्राज्य के कफ़न में अंतिम कील भी गाड़ दिया। इतना ही नहीं, बल्कि पेशवा को उसने "वजीर-ए-मुतलिक" के पद से विभूषित किया, और मुगल-सम्राट् के नाम पर उसे राज्य करने का अधिकार दिया तथा उसे महाराजाधिराज बना दिया इसके बदले में उसने ( ६५,००० ) पैंसठ हजार रुपये अपने निजी खर्च के लिये मांगे और नाममात्र का बादशाह कहलाने का हक भी मांगा। इस चकित कर देने वाली घटना और राज्य प्रबन्ध के परिवर्त्तन से उस समय कैसी दशा उत्पन्न हो गई थी उसका वर्णन उस समय के एक मरहठा संवाददाता के शब्दों मे किया जाता है-'राज्य हम लोगों का हो गया; मुग़ल सम्राट् प्रसन्नतापूर्वक पेंशनर होकर हमारे हाथ में है, वह अब भी बादशाह कहलाता है और यही उसकी इच्छा है। हम भी कुछ देर के लिये उसे ऐसा ही बनाये रखेंगे।” इसी प्रकार जब अंग्रेजों ने भी यह अधिकार प्राप्त कर लिया था तब वे भी इस प्रकार १८५७ तक ऐसा ही आडम्बर रचे रहे। महादजी ने इस घटना को हिन्दुओं पर किया उच्च आदर्श के रूप में रखने की इच्छा से सारे भारत में यह आज्ञा घोषित करा दी कि कहीं गोवध न हो। यह राजनीतिक परिवर्तन काग़ज़ों तक ही सीमित न रहा। उन्होंने सारे बुरे और हानिकारक नियमों को बन्द करना प्रारम्भ कर दिया और उनके स्थान पर महाराष्ट्र-मण्डल के हिन्दू-साम्राज्य के नियम प्रचलित कर दिये। महादजी ने सब से पहला काम यह किया कि अंग्रेजों को शाही- कर, मरहठों की चौथ और सरदेशमुखी देने के लिये कहा। उसके बाद उसने उन सूबेदारों और ज़मीदारों पर लगान लगाई जो कई वर्षों से स्वतन्त्र राजाओं की भांति कार्य कर रहे थे। महादजी के इस पग उठाने के कारण भारतवर्ष में तूफ़ान सा मच गया। सरदार, अमीर, खां-सब-के सब मरहठों से युद्ध करने के लिये तैयार हो गये, इतना ही नहीं, बल्कि

[ १७८ ] हिन्दू-राजे और राव भी मुसलमानों और अंग्रेजों की सहायता से मरहठों की एकमात्र हिन्दू शक्ति का-जो कि भारत में एक हिन्दू-साम्राज्य स्थापित करने के समर्थ थी-विरोध करने लगे। उनका यह विरोध स्वाभा- विक ही था, पर इसके साथ ही यह बड़े अभाग्य की बात भी थी। जयपुर और जोधपुर के दो बड़े हिन्दू-राज्यों ने मिलकर एक संगठित दल तैयार किया। यह संगठन इतना शक्तिशाली बनाया गया था, जितना बड़ा वे आज तक मुसलमानों अथवा अंग्रेजों के विरुद्ध कभी न बना सके थे। फिर मुसलमानी सेनाओं से मिलकर इन लोगों ने लालसोटे के स्थान पर सोंधिया की फ़ौज से भीषण युद्ध किया। जिस समय घमसान का युद्ध हो रहा था, उसी समय सारी शाही मुसलमानी सेना एक इशारे पर, जो पहिले ही से नियत था, महादजी का साथ छोड़ राजपूतों से जा मिली। इस धोखे और विश्वासघात के कारण मरहठों को घोर पराजय उठानी पड़ी। पर वीर मरहठा सेनापति महादजी इससे तनिक भी विचलित न हुए और निर्भयतापूर्वक फ़ौरन अपनी सेना को एकत्रित करने लगे। मरहठा सेनापति लाखोवा दादा के अधीन आगरे का किला था, मुसलमानों ने उस पर बहुत दबाव डाल रखा था, परन्तु मरहठा सेनापति ने डट कर मुकाबला किया इस प्रकार उसने महादजी के शत्रुओं की बाढ़ को रोके रखा। ठीक इसी समय नजीबखां का पोता गुलामकादिर, जिसे मरहठे अभी तक भूले न थे और जिसे उन्होंने क्षमा नहीं किया था, महादजी के हाथों से दिल्ली की रक्षा करने के लिये, रुहेलों और पठानों की फ़ौज लिये आ पहुंचा। मूर्ख बादशाह के प्रोत्साहन से वह दिल्ली में घुस आया। महादजी उसी समय राजपूत और मुसलमानों की संयुक्त-शक्ति से आगरे में युद्ध कर रहे थे। उन्हों ने पहले से ही इन दुर्घटनाओं की सूचना नाना को लिख भेजी थी और स्पष्टतया बतला दिया था कि इन सब आफ़तों की जड़ केवल अंग्रेज़ ही हैं। अंग्रेज़ सामने होकर मरहठों का सामना करने का साहस न रखते थे। उन्होंने कई बार सामना करने

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का प्रयत्न भी किया, पर सर्वदा असफल रहे थे। अंग्रेज़ इस बात को भलीभांति जानते थे कि यदि मरहठे कुछ समय तक और वज़ीर के पद पर वर्त्तमान रहे, तो अवश्य ही कुछ दिनों में खुलमखुला खुद महा- राजाधिराज के पद पर आरूढ़ हो जायेंगे। पर मरहठे तो प्रायः पहले ही ऐसा कर चुके थे। इन सब कारणों से मुग़लपादशाह के अधिकारों को अपने हाथ में करने के लिये अंग्रेज़ बड़े ही व्यग्र हो रहे थे। अब हम अपने पाठकों का ध्यान मरहठा-सेनापति के उस उत्साह- वर्धक पत्र की ओर आकर्षित करना चाहते हैं जो उन्होंने पूना में नाना के यहां भेजा था। उसमे लिखा था "हम लोग बृहत् साम्राज्य की हित कामना के लिये ही जीवित तथा प्रजातन्त्र राज्य के अधिपति के भक्त हैं। हमें व्यक्तिगत डाह और द्वेष का परित्याग कर देना चाहिये। यदि किसी को मेरे सम्बन्ध में किसी प्रकार का सन्देह हो तो उसे वह अपने दिल से निकाल दे। मैंने इस प्रजातन्त्र राज्य की जो सेवा की है, वह उन निन्दकों को चुप करा देने के लिये काफ़ी है जो हम लोगों के वास्त- विक शत्रु हैं और जो हम में फूट डाल कर लाभ उठाना चाहते हैं। अब हम लोगों को समयानुसार काम करने के लिये उद्यत तथा बाद- शाही झण्डे के चारों ओर एकत्रित हो जाना परमावश्यक है, जिस से हम अपने उस जातीय महान् ध्येय को, जिसे हमारे पूर्वजों ने हमें सौंपा है, सारे भारतवर्ष में सुरक्षित रख सकें और अपने इस महान् साम्राज्य को टुकड़े २ होने और नष्ट होने से बचा सकें"। नाना सेनापति की इस प्रार्थना को उस समय अनसुनी करने वाला मनुष्य न था, जब कि जातीय-कार्य संकट में पड़ा हुआ था। हम लोग ऊपर कह आये हैं कि वह टीपू के साथ युद्ध कर रहा था। किन्तु जब वह टीपू को भलीभांति नीचा दिखा चुका, त्योंही होल्कर और अलीबहादुर को महादजी की सहायता के लिये भेज दिया। अब जबकि उनके पूर्वजों की वांच्छित हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित हो चुकी थी और सारा भारतवर्ष उसकी छत्र-छाया में आना ही चाहता था, राजपूतों और मरहठों को उस समय युद्ध के लिये उद्यत और शत्रुओं को सिर उठाने

[ १८० ] का मौका देते देख कर नाना को बड़ा ही दुःख हुआ और उसने राजपूतों और खास कर जयपुर के राजा के साथ पत्र-व्यवहार करना प्रारम्भ किया। उसने पेशवा की तरफ़ से पत्र लिखा, जिसमें महाराजा जयपुर को समझाने का प्रयत्न किया गया था कि मुसलमान हिन्दू-मात्र के शत्रु हैं और मरहठा-राज्य प्रायः स्थापित हो चुका है, अतएव आप लोगों को शत्रुओं के साथ मिलकर हमारे साथ शत्रुता करना उचित नहीं। पूना से भेजी हुई मरहठा-सेना की सहायता से महादजी ने शत्रुओं को भलीभांति पराजित कर दिया। फिर उसने बाता खां, अप्पा खांडे- राव और अन्य मरहठे-सेनापतियों के साथ डी बोइन की अध्यक्षता में दो सुशिक्षित सेनायें नजीव खाँ के पोते गुलामकादिर का सामना करने के लिये भेजीं। मुसलमानों ने भी युद्ध करने की ठान ली। दो बड़ी घमसान की लड़ाइयां हुईं। मुसलमान ऐसी बुरी तरह पराजित हुए जैसे पहले कभी नहीं हुए थे और इधर उधर भाग निकले। इस्माइल वेग और गुलामकादिर दिल्ली की ओर भगे। मरहठों ने उनका बड़ा पीछा किया। बादशाह भय से कांपने लगा। गुलामकादिर ने रुपया मांगा, पर बादशाह न दे सका। इस पर निर्दयी और असभ्य रुहेले सरदारों ने क्रोध से पागल होकर अत्याचार करना आरम्भ कर दिया और लूटमार करनी आरम्भ करदी। गुलामकादिर ने बादशाह को सिंहासन से खींच कर पृथ्वी पर दे मारा और अपने दोनों घुटनों को उसकी छाती पर रख कर, तलवार से उस बूढ़े, बेबस, अकबर और औरंगज़ेब की सन्तान की आंखें निकाल लीं। इतनी ही निर्दयता से उसे संतोष न हुआ, उसने उसकी स्त्रियों और लड़कियों को पकड़वा मंगाया और अपने नौकरों को उन पर अपनी आंखों के सामने बलात्कार करने की आज्ञा दी। गुलामकादिर के क्रोध करने के कारणों में एक कारण यह भी था कि वह अपनी जवानी के समय में शाहआलम की आज्ञा से नपुंसक बनाया गया था। राजधानी में लूट मच गई। मुसलमान मुसलमानों के ऊपर

[ १८३ ] अत्याचार करने लगे, मानो इसलाम के नाम पर अन्य धर्मावलम्बियों पर कर रहे हों। इसी भांति जो पहले बाहर अन्याय करता है कभी न कभी घर पर भी अवश्य करता है। अतः अन्यायी कभी-न-कभी अपना ही नाश करते हैं, इसमें संदेह नहीं। अब अपने ही धर्मावलम्बियों द्वारा किये गये क्रूर तथा राक्षसी कृत्यों और अपमानों से नगर-निवासिनी मुसलिम-कन्याओं की कौन रक्षा करने वाला था काफिरों यानी हिन्दू और मरहठों के अतिरिक्त ऐसी और कोई नहीं कर सकता था। दिल्ली राज्यसिंहासन के अधिपति इन मुगलों और इनके पूर्वजों ने हिन्दुओं के मन्दिरों को धूल में मिला दिया था, उनकी मूर्तियां तोड़ डाली थीं। वे उनकी रानियों और राजकुमारियों को पकड़कर अपने महलों में ले गये थे। उन्होंने हिन्दू कन्याओं के सतीत्व को बलात्कार भ्रष्ट किया था। नवयुवकों को उनके धर्म से वंचित किया था। उन्होंने माता को बच्चे से, बहिन को भाई से जुदा किया था और हिन्दुओं के रक्त से होली खेली थी। यह सब कुछ इस लिये करते थे कि वे ग़ाज़ी की प्रतिष्ठा तथा इस दुनियां में धर्म-रक्षक की पदवी प्राप्त कर सकें तथा दूसरी दुनियां में अपने लिये पुण्य के भागी बन सकें। और अब हिन्दू दिल्ली में आ रहे हैं; लेकिन मसजिदों को तोड़ने के लिए नहीं; उनके खंडों को टुकड़े टुकड़े करने के लिये नहीं; मकबरों को धराशायी करने के लिये नहीं और न ही उन्हें अपवित्र करने के लिये; वे किसी राजकुमारी या दीन से दीन मुसलमान-कन्या पर हाथ लगाने या उसे हिन्दू बनाने के लिये, माता को बच्चे से छीनने अथवा पिता का पुत्र से वियोग कराने के लिये नहीं आ रहे। वे सत्यनासिनी शराब में पागल होकर खून बहाने या अपनी प्रतिष्ठा और गौरव का अंदाज़ा शत्रु के धड़से पृथक् की हुई खोपड़ियों के ढेर लगा कर लगाने नहीं आ रहे। उनका उद्देश्य राजधानी को जला कर राख कर डालने का भी नहीं है। वे ऐसा कर सकते थे; और अगर करते भी तो मुसलमानों

[ १८२ ] को इसके लिये उन्हें दोषी ठहराने का कोई हक़ न था। पर हिन्दू तो इसलिये आ रहे हैं कि बादशाह उसके परिवार और दिल्ली निवासियों की उन्हीं के सहधर्मियों के अन्याय और अत्याचार से रक्षा करें ! समस्त नगरनिवासी मरहठों के आगमन के लिये ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे और उनके पहुंचने पर क्या हिंदू क्या मुसलमान—सबने एक हृदय होकर उन का स्वागत किया। अलीजा बहादुर, अप्पा खांडेराव, रानाखां और डी बोइन ने शहर पर अधिकार कर लिया। लेकिन जब उन्हें मालूम हुआ कि गुलामक़ादिर पहले ही भाग गया है तो वे बड़े दुःखी हुए, क्योंकि वह नजीबखां का पोता और मरहठों का स्वाभाविक शत्रु था, और उसे कुछ दण्ड न मिले उन्हें बिल्कुल नापसन्द था। मरहठों ने औरङ्गजेब की सन्तानों के सुख के लिये मनुष्योचित समस्त उपायों का उपयोग किया, यद्यपि इसी परिवार ने मरहठों के सत्यानाश के लिये, गुलाम- क़ादिर के साथ मिलकर षड्यन्त्र रचा था। गुलामक़ादिर का पीछा करने के लिये एक बड़ी सेना पहले ही भेजी जा चुकी थी। वह भाग कर मेरठ के किले में छिपा हुआ अपनी रक्षा करने का विचार कर रहा था। गुलामक़ादिर ने थोड़ी देर तक इस सेना का मुकाबला किया, पर जब देखा कि अब बचना कठिन है तो एक घोड़े पर चढ़ कर भाग निकला। लेकिन घबरा- हट में घोड़े से गिर पड़ा और बेहोश हो गया। गांव वालों ने उसे पहचान लिया और उसे मरहठों के पास ले आये। उस अधम को दंड देने के लिये मुसलमान-जनता जितनी लालायित थी उतना और कोई भी न था। वह शिन्दे के सामने लाया गया और गुलामक़ादिर को उन सब शत्रुताओं का बदला चुकाना पड़ा जो कि उसकी तीन पीढ़ी और शिन्दे के मध्य थीं। उसकी बड़ी दुर्दशा की गई और चूंकि अब भी वह गालियां देने से बाज न आता था इस लिये उसकी जीभ काट ली गई और आंखें फोड़ दी गईं। इस प्रकार निर्दयतापूर्वक सताये जाने के बाद नजीब का पोता मुगल बादशाह के पास भेज दिया गया, जिसकी इच्छा अपने

[ १८३ ] सताने वाले को भी उसी दशा में देखने या सुनने की थी। यहां उसे मृत्युदंड मिला। इस प्रकार पानीपत के युद्ध-समय में मरहठों का नाश करने की प्रतिज्ञा करने वाले नजीब के परिवार का स्वयं मरहठों के हाथों ऐसा नाश हुआ कि उसके वंश या राज्य का निशान भी अवशेष न रहा। सन् १७८६ ई० में दूसरे मरहठे-सेनापतियों के साथ महादजी ने अपने शत्रुओं पर विजय पाने में सफलता प्राप्त की और मुसलमानों तथा उनके सहायक राजपूतों को हरा कर उनका नाश कर दिया और ऐसी वीरतापूर्वक अङ्गरेज़ों का सामना किया कि वे उसकी बहादुरी का लोहा मानकर दबने लगे। बूढ़ा मुग़ल बादशाह फिर इसके हाथ में आ गया और जब उसने महादजी को 'वकील-ए-मुतलिक' का पद देना चाहा तो उसने एक बार फिर इस पद को अपने स्वामी पेशवा के लिए प्राप्त किया। जिन दिनों मरहठी सेनायें इस प्रकार उत्तर में फँस रही थीं, टीपू के हृदय में फिर गुदगुदी पैदा हुई और उसने एक बार फिर अपनी शक्ति की परीक्षा करने का विचार किया। सन् १७८६ ई० में ही उसने धम- काना शुरू किया, पर वह सीधे मरहठों पर हमला करना नहीं चाहता था। वह किसी प्रकार अपना राज्य बढ़ाना चाहता था। उसने सोचा कि अगर मरहठों के कारण मैं अपना राज्य कृष्णा नदी की ओर नहीं बढ़ा सकता तो अपने पड़ोसी ट्रावनकोर के दुर्बल हिन्दू-राज्य पर आक्रमण कर उसी पर क्यों न अधिकार कर लूँ ? इस लिये नाना ने निज़ाम और अङ्गरेज़ों को साथ मिला कर टीपू से युद्ध ठान लिया और पटवर्धन ने भी टीपू के राज्य पर आक्रमण कर दिया। ध्यान देने की बात है कि मरहठों के पहुँचने पर उस प्रान्त के निवासियों ने अन्यायी टीपू के विपक्ष में उनकी सहायता की, यहां तक कि उन लोगों ने टीपू के सरदारों को वहां से निकाल बाहर किया और मरहठों के बाकी पड़े करों को वसूल करने में सहायता करने लगे। हुबली, घोड़वाड़ और

[ १८४ ] मिश्रीकोट के ले लेने पर मरहठे बड़ी तेज़ी से आगे बढ़े। टीपू का हाल ही का जीता हुआ धारवाड़ घेर लिया गया। मुसलमान सेनापति ने बड़ी वीरतापूर्वक वहाँ मुक़ाबला किया। मरहठों की सलाह न मान कर अङ्गरेज़ों ने चाहा कि छापा मार कर क़िले को ले लें, पर बुरी तरह असफल रहे। बड़ी वीरतापूर्वक कुछ दिनों तक युद्ध होता रहा। अन्त में बार २ आक्रमण करके मरहठों ने उसे ले लिया। पानसे, रास्ते और दूसरे सेनापतियों ने तुंगभद्र नदी पार करके सान्ती, बदनूर, पेनगिरी इत्यादि स्थानों को शत्रु से जीत कर अधिकार में कर लिया। उधर मरहठों की जल-सेना भी बेकार न बैठी थी। इसने समुद्र तट की रक्षा करने के साथ ही साथ करवार तथा हसार इत्यादि स्थानों से मुसलमान सेनापतियों को निकाल बाहर किया। नरसिंह राव देवजी, गणपतिराव महेन्डेल तथा अन्य सेनापतियों ने चन्दावर, गिरिसप्पा, धारेश्वर और उद्गिनी आदि स्थानों को ले लिया और इसके बाद मरहठी फ़ौज श्रीरंगापट्टम की ओर बढ़ी जहां दूसरी ओर से लार्ड कार्नवालिस की अध्यक्षता में इंगलिश सेना भी आ रही थी, जो टीपू की चालबाजियों से व्याकुल हो गई थी। घबराहट और भूख-प्यास के मारे उसका बुरा हाल था और अश्वारोही सेना पैदल हो रही थी, क्योंकि जहां आदमियों का यह हाल था वहां घोड़े को कौन पूछता? चारे बिना घोड़े मर गये थे। भूखों मरती हुई अङ्गरेज़ी सेना के सुख का पारावार न रहा जब उसने सम्पूर्ण सामानों से लैस तथा सुसज्जित महाराष्ट्र-सेना को आते देखा। हरिपन्त फाडके ने मित्रों को सब आवश्यक वस्तुएँ देकर निश्चिन्त किया और यह संयुक्त सेना दस दिन तक वहाँ ठहरी रही। मरहठे इस समय चाहते तो टीपू के राज्य का नाम-निशान भी शेष न रह पाता, पर नाना के विचार के अनुसार उसका सर्वनाश करना उचित न था। वह चाहता था कि टीपू कुछ दिन और इसी प्रकार मद्रास में अङ्गरेज़ों की इच्छा-पूर्ति के मध्य कण्टक-स्वरूप बना रहे। इसी लिये घमसान

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की लड़ाई के बाद जब टीपू ने अपने को सर्वथा मरहठों और अङ्गरेजों के हाथ में समझ कर सुलह की प्रार्थना की तो परशुराम भाऊ और हरिपन्त फाडके के कारण अङ्गरेजों को विवश होकर सन्धि करनी पड़ी। इस सन्धि के अनुसार टीपू ने मरहठों को अपना आधा राज्य तथा लड़ाई का हर्जाना तीन करोड़ रुपये दिये और प्रतिज्ञा की कि वह भविष्य में ट्रावनकोर के राजा को न सतायेगा। उसके दोनों लड़कों को मरहठे और अङ्गरेजों ने अपने पास जमानत के रूप में रक्खा। जो कुछ टीपू से मिला उसे दोनों ने निज़ाम के साथ बराबर २ तीन भागों में विभाजित कर लिया। मरहठों को एक करोड़ रुपये क्षतिपूर्ति और नब्बे लाख सालाना आय की ज़मीन मिली। इस प्रकार टीपू के साथ तीसरी लड़ाई का अन्त हुआ और मरहठी सेना सन् १७९२ ई० में बड़ा प्रतिष्ठा और नाम के बाद पूना पहुँची। महाराष्ट्र राज्य के उत्तरी विभाग की सेना का सेनापति भी उसी समय पठान और रहेलों के साथ नाम प्राप्त करके राजधानी की ओर लौटा। फाडके और रास्ते, तथा महादजी की सेनायें भी, जिन्होंने क्रमशः दक्षिण भारत में हिन्दुत्व की टीपू के क्रोध से रक्षा की और अङ्गरेजों तथा फ्रांसीसियों के परोक्ष में मुग़ल बादशाह को हिन्दू- साम्राज्य का पेन्शनर-मात्र बना छोड़ा था, पूने में आ मिलीं। इन महान् पुरुषों के पूना में संगम ने भारत तथा भारत से बाहर के दरबारों को भयभीत कर दिया; उन्हें अपना भाग्य भविष्य में शंकित दिखाई पड़ी। इस बड़े संगम का क्या अर्थ हो सकता था ? इसके पश्चात् महा- राष्ट्र-मण्डल कौन कार्य अपने हाथ में लेगा तथा अब इसका शिकार कौन होगा। —इत्यादि बातों को जानने के लिये सब लोगों की दृष्टि पूना की ओर लग रही थी क्योंकि पूना के अन्तर्गत हो जाने के कारण अब दिल्ली की कोई गणना ही न होती थी। लेकिन मरहठे अपने ही तईं झूठी बातों के भ्रम में पड़कर परेशान होने लगे। नाना और महादजी अब एक दूसरे के विरुद्ध हो गये थे। सब लोग जानते थे कि इन दोनों

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व्यक्तियों में पारस्परिक द्वेष बढ़ रहा है। पर ये दोनों देशभक्त "हिन्दू- प्रजातन्त्र" स्थापित करने की लालसा और भक्ति के कारण ही अपने भावों को रोके और दबाये हुये थे, और इस प्रजातन्त्र की स्थापना, रक्षा और इसको प्रभावशाली बनाने में, इन दोनों से बढ़कर शायद ही किसी व्यक्ति ने अधिक परिश्रम किया हो पर, क्या वह द्वेषाग्नि, जो आज तक छिपी थी, भड़क कर गृह-कलह पैदा कर देगी ? अगर ऐसा हुआ तो हिन्दू-राज्य के लिये इससे बढ़ कर दुःख की बात और क्या हो सकती है ? सारा महाराष्ट्र इस ख्याल से काँप उठता था; और सब लोग बड़ी चिन्तापूर्वक अपने दोनों बहादुरों और राजनीति-विशेषज्ञों की ओर देख रहे थे । हम पहले ही लिख चुके हैं कि बूढ़ा मुग़ल बादशाह, जो अब भी मरहठों की कृपा से बादशाह की उपाधि का उपभोग कर रहा था, 'वकीले मुतलिक' और 'महाराजाधिराज' का पद महादजी को देना चाहता था; किन्तु इसने अपने लिये अस्वीकार कर उसे अपने स्वामी बालक पेशवा के लिये प्राप्त किया । यह कार्य केवल दिखलाने मात्र को न था । यद्यपि एक बेबस और अयोग्य व्यक्ति के लिये उन पदों का मूल्य उतना भी न था, जितना कि उस काग़ज का मूल्य था जिस पर वह उपाधि लिखी हुई थी, तो भी यह शब्द निरर्थक ही न रहे। उनका पदाधिकारी मुग़ल बादशाह के नाम पर सम्पूर्ण मुग़ल साम्राज्य पर राज्य करने का अधिकारी हो गया और मुग़ल बादशाह ने अपने बादशाही अधिकारों से त्याग-पत्र दे दिया । मरहठों, अङ्गरेज़ों और दूसरे विधर्मियों के बीच बादशाही ताज के लिये मुक़ाबिला था, इसलिये यही उचित समझा गया कि ताज और पद बूढ़े मुग़ल बादशाह के पास पहले ही की भांति बने रहें। इस प्रकार मुग़ल सम्राट् को सारे अधिकारों से वंचित कर दिया गया । लेकिन अङ्गरेज़ और दूसरी मुसलिम शक्तियां भी यह भली-भाँति जानती थीं कि ये पद अगर एक बार भी मरहठों के हाथ में चले गये तो

ऐसे सुरक्षित हो जाएँगे कि उनके पास फटकना भी दुस्तर हो जायगा। अतः द्वेष-भाव से प्रेरित हो, मरहठों को नीचा दिखाने की इच्छा से, अङ्गरेज़ों ने पुराने मुग़ल बादशाह को अपना बादशाह साबित करने की कोशिश की और इस बात को सर्व साधारण पर विदित कराने के लिये उत्तरी सरकार को (जिसे अपने बाहुबल द्वारा उन्होंने बहुत पहले से जीत लिया था) अपने पास रखने के लिये शाहआलम से आज्ञा मांगी। किन्तु मरहठे भी अपने प्रतिद्वन्द्वियों से पीछे रहने वाले न थे। अतएव सम्राट् के नाम की आड़ लेकर वे सब प्रकार से राज्य-संचालन करते रहे और यही कारण महादजी सींधिया के महाराष्ट्र-मण्डल के मुखिया के लिये "महाराजाधिराज" और "वकीले मुत'लिक़" की पदवियों को मुग़ल सम्राट् से प्राप्त करने का था। अब बहुत दिनों के बाद एक अत्यन्त आदर्श जीवन व्यतीत करने के पश्चात् वह अपने छोटे सरदार को नवयुवक भगवान् के रूप में देखने के लिये लालायित होकर आया था; इसलिये प्राप्त किये हुये पदों से उसे विभूषित करने के लिये महा- दजी ने एक महान् उत्सव की आयोजना की। जिस समय महाराष्ट्र-सेनापति महादजी की यह इच्छा हुई कि पेशवा को, जो पहले से ही राजाधिराज हैं, महाराज के पद से विभूषित करें, उसी समय नाना ने एक दल तैयार किया, जो इस पर यह कहकर आपत्ति करने लगा कि इससे महाराज-सितारा का अपमान होगा। ऐसे बहुत से उदाहरण मिल सकते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि एक राज्य के निवासियों या रक्षित राज्यों के पदाधिकारियों ने दूसरे राजाओं के दिये पदों को स्वीकार किया है और उससे उनके राज्य की कोई भी हानि नहीं हुई है। यही नहीं, कितने तो ऐसे भी उदाहरण हैं कि दूसरे राज्य वालों के दिये पदों को लोगों ने यह सोच कर स्वीकार कर लिया है कि उनके राज्य की उन्नति होगी। इन बातों के यथार्थ होते हुये भी, इस विचार से कि जातीय आन्दोलन में किसी प्रकार का भेदभाव न उपस्थित हो, महादजी ने महाराज-सितारा से प्रार्थना की; जिसके उत्तर में छत्रपति

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·ने स्वयं पेशवा को महाराजाधिराज-पद से विभूषित करना स्वीकार किया। इन राजनैतिक कठिनाइयों के दूर हो जाने पर बड़ी धूम-धाम से पेशवा को महाराजाधिराज तथा वकीले-मुतलिक की पदवी दी गई। और यह इनाम उनके वंशजों के लिये सदा के लिये सुरक्षित कर दिया गया। अब पेशवा को मुग़ल बादशाह के नाम पर काम करने का अधि- कार मिल गया। यही नहीं, बल्कि उसके सेनापति महादजी को यह भी अधिकार मिल गया कि मुग़ल बादशाह के जिस पुत्र को चाहें उसका उत्तराधिकारी बनायें। अब सारे भारतवर्ष में घोषणा कर दी गई कि कोई गोवध न करे। सिंधिया, नाना फडनवीस तथा अन्यान्य महाराष्ट्र- सेनापतियों और नेताओं ने इस पवित्र कार्य के लिये उन्हें धन्यवाद दिया। अब मरहठों ने अपने अधिकारों को इस योग्य बना लिया था कि उनके द्वारा अपने प्रतिद्वन्द्वियों को चाहे वे यूरोपियन हों या एशि- याई—तथा जो मुग़ल बादशाह ही को वास्तविक महाराज मानने के बहाने उनका (मरहठों का) अपमान करते थे—नष्ट कर सकें। शासन-कार्य में भी मरहठों ने मुग़ल बादशाह के स्थानापन्न समझे जाने का दावा पेश किया। वे शाही फ़ौज के सेनापति तथा राज्य के मन्त्री थे; मुग़ल-राज्य के उत्तराधिकारी चुनने के लिये स्वतन्त्र थे; और सब से बड़ी बात तो यह थी कि वकील-ए-मुतलिक (महाराजाधिराज) का पद सदा के लिये उनका हो गया था। जब उत्सव समाप्त हो गया तो मनुष्यों की भारी भीड़ उस जुलूस के महल को लौटने का दृश्य देखने के लिये एकत्रित हो गयी। मनुष्यों की जयध्वनि, और तोप-बन्दूकों की गरज से आकाश गूँज उठा। जुलूस के महल के सामने पहुँचने पर पेशवा ने इसके संयोजकों की बड़ी प्रतिष्ठा की। हिन्दू-पद-पादशाही के सेनापति तथा इस उत्सव के विधाता महादजी अपनी सारी शक्ति और शान का विचार छोड़ कर आगे बढ़, पेशवा का जूता उठा लिया और धीरे से बोला— "हिन्दू-साम्राज्य के अधिपति महाराजाधिराज ! सारे राजकुमार, राजे,

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राजे, तुर्क, मुग़ल बादशाह, रुहेले, नवाब और फिरंगी राजनीतिक क्षेत्र से मिट कर आपके आज्ञापालक बन गये हैं। आपका यह दास जन्म से लेकर अपना माग जीवनकाल हाथ में तलवार लेकर, इस प्रजातन्त्र के हित के लिये, दूर देशों में ही व्यतीत करता रहा है। राजाओं पर विजय प्राप्त करके मारा मान, गौरव और प्रतिष्ठा जो मैंने पाई है, वह भी आपके चरणों मे बैठ कर आपकी जूतियों की रखवाली करने की मेरी तृष्णा को न बुझा सकी । मेरी यह हार्दिक इच्छा है कि दिल्ली में प्रधान- मन्त्री होकर रहने की अपेक्षा मुझे महाराष्ट्र मे पटेल बन कर रहने का अधिकार मिले। अतएव कृपा कर वेदूर देशों मे जाकर काम करने से मुझे मुक्त कर दें और यही सेवा करने की आज्ञा प्रदान करें। मुझे भी अपनी पूर्वजों की भांति आपकी वैयक्तिक सेवा मे समय व्यतीत करने का सुअवसर मिले।” महादजी वाक्-पटु था। पेशवा सव ई माधवराव अच्छी प्रकृति का और सरल हृदय नवयुवक था। वह राजनीति के सम्पूर्ण अङ्गों का ज्ञाता था।, महादजी वस्तुतः पेशवा का भक्त था और शीघ्र ही उसने उसे अपनी ओर आकर्षित कर लिया । उसके हृदय मे हिन्दू-पद पाद- शाही के प्रबन्ध-मन्त्री बनने का इच्छा उत्पन्न हुई, जिस पर इस समय नाना फडनवीस था। कुछ काल व्यतीत हो जाने पर स्वय प्रधान-मन्त्री नाना द्वारा निश्चित कार्यक्रम में हस्तक्षेप करने लगा और एक बार जब सुअवसर मिला तो उसने नाना के विचारों का घोर विरोध किया। लेकिन उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ जब उसने पेशवा को गम्भीरता-पूर्वक यह कहते सुना, "नाना और महादजी मेरे राज्य के दो हाथ हैं। प्रथम दाहिना और दूसरा बायां हाथ है और प्रत्येक अपने २ कार्य में दक्ष है। उनके संगठित कार्य से ही राष्ट्र को उन्नति है। इनमें से कोई अगर अपने पद से जरा भी हटा दिया जाय तो वह शक्तिहीन हो जाएगा।” यद्यपि महादजी बातचीत करते समय बड़ा सतर्क रहा था तो भी नानासाहब के चतुर और बुद्धिमान् मित्रवर्ग से यह बात छिपी न रह सकी।

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इस समाचार को पाकर नाना, हरिपन्त फाड़के और समस्त मन्त्रिवर्ग चौंक पड़ा। उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य, सम्पूर्ण भारत को महाराष्ट्र के हिन्दू-साम्राज्य के अन्तर्गत करना था, जिसमें कोई भी स्वतन्त्रराज्य स्थापित न हो सके, अब अन्धकारमय देख पड़ने लगा। वे इस बात को अपने जीवन-काल में होता नहीं देख सकते थे। वे भली-भाँति जानते थे कि अपने पदों से हट जाने के प्रश्न का निपटारा तो हम त्यागपत्र द्वारा कर लेंगे, पर जनता पर इसका बड़ा बुरा प्रभाव पड़ेगा और वह असन्तुष्ट हो जायगी, जिससे अनिवार्य रूप से परस्पर युद्ध आरम्भ हो जायगा। अपना बयान देने के लिये नाना पूना पहुँचा। अपनी सारी सेवाओं का वर्णन करने के बाद उसने पेशवा से निवेदन किया कि "यदि आप सोन्धिया के हाथ में कठ-पुतली बन जायेंगे तो राज्य पर इसका बड़ा बुरा प्रभाव पड़ेगा। महादजी के परामर्श से यदि आप सहसा कोई काम कर बैठेंगे या कोई नवीन प्रबन्ध शुरू करेंगे तो आपस में लड़ाई छिड़ जायगी और हैदराबाद में तैयारी में लगे हुये मुसलमान तथा राज्य के नाश के इच्छुक अंग्रेजों की अभिलाषा पूर्ण हो जायगी और वे इस राज्य को छिन्न-भिन्न कर डालेंगे।" नेत्रों में आँसू भर कर प्रधान मन्त्री ने कहा—"यदि केवल मुझे अपने पद से हटाने का प्रयत्न है तो मैं प्रसन्नता- पूर्वक हटने को तैयार हूं, और यह मेरा त्याग-पत्र है। यदि इतने से राष्ट्र का भला हो और पारस्परिक युद्ध टल जाय तो कृपा करके मुझे आज्ञा दीजिये कि अब काशीजी जाऊँ और इस संसार से सम्बन्ध विच्छेद करने की कोशिश करूँ।" नवयुवक पेशवा पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा और महाराष्ट्र-निर्माता नाना के इस नम्र निवेदन पर उसका भी हृदय पिघल गया और उच्च स्वर से कहने लगा—"किन कारणों से आप ऐसा कह रहे हैं, और किस प्रकार ऐसे विचारों ने आपके हृदय में स्थान पाया ? आप केवल मेरे मन्त्री ही नहीं, किन्तु मेरे पथ-प्रदर्शक, राज- नैतिक गुरु और मित्र हैं। इस राज्य का सम्पूर्ण भार आपके कन्धों पर है और ज्यों ही आप हट जायेंगे यह गिर कर टुकड़े २ हो जायगा।"

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नाना का गला भर आया और कहने लगे- "महाराज ! आपके जन्मकाल से ही नहीं; किन्तु इसके पहले से भी आपके अधिकारों और इस राज्य की भलाई के लिये मैंने लाखों मनुष्यों से शत्रुता उत्पन्न की । अब मेरी उन सेवाओं की गणना नहीं है और शत्रुओं की बात सुनी जाती है।" उदारचित्त नवयुवक इन बातों को सुन कर इतना दुःखी हुआ कि अपने राज्य के प्रधान और नाना के प्रधान-मन्त्री होने की सुधि भी उसे न रही और प्रेम से अधीर होने के कारण उसके गले में अपना हाथ डाल कर सिसकते हुये कहने लगा— "मेरा त्याग न कीजिये; दुःखित होने का कोई कारण नहीं है, आप न केवल मेरे प्रधान-मन्त्री ही हैं प्रत्युत् बालपन से आप ही मेरे पिता हैं। यदि मैं अपने मार्ग से पथ-भ्रष्ट हुआ हूँ तो उसके लिये क्षमा कीजिये। कदापि मैं तुम्हें अपने पद से त्याग-पत्र देने अथवा पृथक् होने की स्वीकृति नहीं दूँगा। मैं आजीवन आपको नहीं छोड़ सकता।" पेशवा के इन दयायुक्त विश्वासपूर्ण शब्दों से नाना, भाऊ, हरिपन्त फाडके तथा मन्त्री-मण्डल के अन्यान्य नेता सशक्त हुये और महादजी पर भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ा । वे भी विस्मित हो गये । चाहे व्यक्तिगत इच्छा जो कुछ भी रही हो, पर इसमें कुछ सन्देह नहीं कि महादजी हिन्दू-साम्राज्य के उतने ही बड़े भक्त और शुभचिन्तक थे जितना उनके कोई भी सहयोगी कार्यकर्त्ता वे सर्वदा अपने प्राण बलिदान करके उसे सर्वोपरि रखने में प्रयत्नशील रहने वाले थे । यह दादा राघोबा नहीं थे । यद्यपि उनका विचार महाराष्ट्र राज्य को अपने हाथ में रखने का था, पर वह कभी यह नहीं चाहते थे कि आपस में युद्ध हो । अतएव प्रसन्नतापूर्वक मन्त्रिमण्डल के साथ सहमत हो पेशवा की इच्छानुसार चलने पर तैयार हो गये। इसी बीच में हरिपन्त फाडके इत्यादि ने उनको घेर कर सूचित किया कि आपकी, मन्त्रिमण्डल के समस्त अधिकारों को अपने हाथ में रखने की इच्छा के कारण, हम लोगों में प्रतिद्वन्दिता होने

लगेगी, जिससे बाहरी शत्रु प्रबल होकर उस हिन्दू-साम्राज्य को, जिसके लिये सहस्रों वीर आत्मायें बलिदान हो गईं, बड़ी हानि पहुँचायेंगे। नाना ने त्याग-पत्र दे देना उचित समझा है, कारण, वे गृहकलह पसन्द नहीं करते। इन बातों का महादजी पर बड़ा प्रभाव पड़ा और उन्होंने प्रण किया कि भविष्य में अब वह कभी नाना और उसके दल का विरोध न करेगा। जैसा मरहठा इतिहास में कई बार पहिले भी हो चुका है, इस बार भी हुआ। जातीय हित के सामने व्यक्तिगत स्वार्थ को ठुकरा कर दो बड़े नेता सहयोगपूर्वक काम करने को फिर उद्यत हो गये। दोनों ने पेशवा के चरणों के पास बैठ कर शपथ खायी कि आज से वे लोग अपनी पुरानी बातों को भूल जायेंगे और पेशवा तथा इस प्रजातन्त्र की, जो हिन्दुओं और उनके धर्म का रक्षक है, सेवा में जीवन सफल करेंगे। नाना फड़नवीस और महादजी के मनोमालिन्य दूर हो जाने का - समाचार सारे महाराष्ट्र में फैल गया और सब लोगों ने इस बात पर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की। इस का अन्दाजा गोविन्दराव काले के पत्र से-जो उस समय के महाराष्ट्र-मण्डल का एक बड़ा भारी विद्वान् और देशभक्त राजनीतिज्ञ था और निज़ाम-राज्य में रेज़ीडेण्ट नियुक्त था-लग सकता है। यह पत्र निज़ाम की राजधानी से इस प्रकार लिखा गया था-"आप के पत्र ने मुझे प्रसन्न कर दिया और मेरे आनन्द का पारावार न रहा। जब सारा विवरण पढ़ चुका तो हृदय में अनेकों विचार उठने लगे। अटक से हिन्दमहासागर पर्यंत सारा देश हिन्दुओं का होने के कारण हिंदुस्तान है, न कि तुर्किस्तान। पांडवों के समय से लेकर महाराज विक्र- मादित्य तक ये ही हमारे देश की सीमाएं रही हैं और उन्होंने देशकी विदे- शियों से रक्षा की तथा उसपरशासन किया। परन्तु उनके उत्तराधिकारी इतने अयोग्य और नपुंसक निकले कि भारत के शासन की बागडोर यवनों के हाथ में चली गई और हमारी स्वाधीनता का नाश हो गया। बाबरके वंशजोंने हस्तिनापुर या देहली का राज्य जीता और अन्त में औरङ्गज़ेब के शासन-

[ १६३ ] काल में हम इतने दबा दिये गये कि हमारी यज्ञोपवीत धारण करने की धार्मिक स्वतन्त्रता भी छिन गई । इस समय अपने धर्म के निमित्त विवश होकर पोल-टैक्स देना पड़ता था तथा हमें विवश होकर अपवित्र भोजन खरीदना और खाना पड़ता था । 'ऐसे नाजुक समय में महाराज शिवाजी का जन्म हुआ जो एक नवीन युग के प्रवर्तक और धर्म के रक्षक थे । उन्होंने भारतवर्ष के एक कोने को स्वतन्त्र करके हिन्दू-धर्म को शरण दी । उसके पश्चात् नाना साहब और भाऊसाहब हुये, जिनका तेज सूर्य की भांति चमका । जो कुछ हम खो चुके थे वह सब महादजी सींधिया की बुद्धिमत्ता द्वारा हम लोगों ने महाराज पेशवा के शासनकाल में फिर लौटा लिया । यह सब कार्य किस प्रकार सम्पादित हुए यह सोचकर आश्चर्य होता है । एक बार भी सफलता प्राप्त कर लेने पर हम अन्धे हो जाते हैं और उसके भारी परिणाम को नहीं देखते । यदि ऐसी सफलता मुसलमानों ने प्राप्त की होती तो कई इतिहास उनके गुणानुवाद में तैयार हो जाते । मुसलमान एक छोटे काम को भी आसमान तक चढ़ा देते हैं, पर इसके विपरीत हिन्दू यदि कोई कितना भी गौरवपूर्ण कार्य क्यों न करें, हम उस प्रकट तक नहीं करते । किन्तु वास्तव में आश्चर्यजनक घटनाएं हुई हैं; अजेय जीता गया है । मुसलमान राज्य को काफिरों के हाथ मे जाने और काफिरशाही आने की बात सोच २ प्रत्यक्ष रो रहे हैं । 'वास्तव में जिन जिन लोगों ने भारतवर्ष में हमारे विरुद्ध सिर उठाया, महादजी ने सब को चकनाचूर कर दिया । हम लोगों ने जितनी सफलता प्राप्त की है वह मानवशक्ति के बाहर है । बहुत अंशों में सम्पूर्ण होते हुये भी अभी हमें बहुत से कार्य करने शेष हैं । कोई नहीं जानता कि कब और कहां हमारे गुण हमे असफल बनादें और दुष्टों की क्रूर दृष्टि हमारे लिये हानिकारक हो । हम लोगों का गौरव राज्य प्राप्त करने तक ही परिमित नहीं है, हम संसारिक सुखों से ही सन्तुष्ट नहीं हो सकते; वरन् वेद, पुराण और शास्त्रों की रक्षा, धर्म और हिन्दू-सभ्यता की वृद्धि

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और गौ-ब्राह्मण की सेवा करना भी हमारा मुख्य कर्तव्य है; और इन सब उद्देश्यों की पूर्ति की कुञ्जी आप और महादजी के हाथों में है। आप लोगों के बीच का ज़रा-सा भी मनो-मालिन्य शत्रुओं की शक्ति को प्रबल बना देगा। किन्तु अब आप लोगों के आपस में मेल हो जाने के समाचार ने हम लोगों की सारा शंकाओं का अन्त कर दिया। अब अपनी सेनाओं को हम लाहौर में पड़ो रहने दें और सीमान्त की ओर बढ़ने के लिये तैयार हों। हमारे शत्रुओं को यह आशा थी कि हम लोग आपस में लड़कर नष्ट हो जायेंगे; अब उनकी इन आशाओं पर पानी फिर गया। मुझे इसकी बड़ी चिन्ता थी; आज वे सारी चिन्तायें मिट गईं। अच्छा हुआ; बहुत ही अच्छा हुआ, अब मुझे शान्ति प्राप्त हुई है।" सच्चे उत्साही कार्यकर्त्ता द्वारा लिखा हुआ उपरोक्त पत्र, कई दर्जन नीरस इतिहासों की अपेक्षा, मरहठों की आत्मा, स्वभाव और उत्साह का कहीं ठीक चित्र खींच देता है। पर इन महान शंकाओं और आशाओं के संघर्ष के बीच ही महादजी को ज्वर हो गया और पूना के समीप वानावादी में १२ फ़रवरी सन १७६४ ई० को इस संसार से चल बसे। इस से समस्त राष्ट्र शोकसागर में डूब गया। शक्तिशाली सरदार और सेनापति महादजी की मृत्यु को देख कर महाराष्ट्र के शत्रुओं में नवीन जीवन का संचार हो गया, और वे महाराष्ट्र- मंडल को नष्ट करने के लिये प्राण-पण से प्रयत्न करने लगे। इन शत्रुओं में अग्रगण्य निज़ाम हैदराबाद थे जिनको मरहठों ने बिल्कुल निर्बल करके अच्छी प्रकार अपने हाथों में कर लिया था। अब वह मरहठों से बदला लेने का सुअवसर समझ कर उत्तेजित हो उठा। इस समय उसने अपनी सेना पहले की अपेक्षा बारहगुनी कर ली थी; और उसे एक फ्रांसीसी सेनापति की अध्यक्षता में रक्खा था। निज़ाम का मन्त्री मुशरूलमुल्क एक कट्टर मुसलमान था। महादजी ने, जो बादशाही अधिकार मुगल सम्राट से अपने पेशवा के लिये प्राप्त किया था, वह

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उसे असह्य हो गया। मुसलमान गांव-गांव और घर-घर घूमकर डींग मारते फिरते और कहा करते थे कि शीघ्र ही युद्ध होगा; जिसमें काफिर- शाही का अन्त होगा और पूना में मुसलमानी ध्वजा फहराएगी। निज़ाम का मन्त्री इतना ढीठ हो गया कि जब मरहठा रेजिडेण्ट ने उससे चौथ मांगी तो उसने उत्तर दिया कि नाना स्वयं हैदराबाद आवें और हमें बतलावें कि उन्हें "चौथ" लेने का क्या अधिकार है। फिर उसने कहा— "यदि नाना यहां स्वयं न आएगा तो मैं शीघ्र ही उसे यहां ले आऊँगा।" फिर यह सोच कर कि सम्भव है कि इतने ही अपमान करने पर मरहठे लड़ने को उद्यत न हों, निज़ाम ने एक बादशाही उत्सव किया जिसमें दूसरे देशों के भी राजदूत बुलाये गये थे। उन राजदूतों के समक्ष अपने दो दरबारियों को नाना और माधोराव पेशवा बना कर उनका हर प्रकार से परिहास किया गया। इस पर मरहठे राजदूत गोविन्दराव पिंगले और गोविन्दराव काले क्रोध भरे उठ खड़े हुये और निज़ाम के इस असभ्यता- पूर्ण कार्य का घोर विरोध और निन्दा की और अन्त में मरहठा वीर ने ललकार कर कहा, "ऐ मुशीरुलमुल्क ! तू ने कई बार अपनी शक्ति पर अभिमान करके नाना को नीचा दिखलाने का प्रयत्न किया और चाहा कि उन्हें हैदराबाद आने के लिये विवश करूं, किन्तु स्वयं अपमानित हुआ। इस बार भी तूने इस राजदरबार में हमारे स्वामी का अपने दरबारियों द्वारा अपमान कराया है। मैं आज ही ललकार कर कहे देता हूँ कि यदि मरहठे तुमको जीते पकड़ कर महाराष्ट्र की राजधानी में तमाशा बनाकर न घुमायें तो मेरा नाम गोविन्दराव नहीं।" यह कह कर मरहठे-राजदूत निज़ाम के दरबार से निकल कर पूना के लिये चल दिये और पूना पहुँच कर लड़ाई की घोषणा कर दी। अंग्रेज़ दोनों विपक्षियों के हितकारी बनने का ढोंग दिखाने के लिये सुलह कराने का प्रयत्न करने लगे; किन्तु मरहठों ने उन्हें डांट कर कह दिया कि महाराष्ट्र-के कार्यों में आप लोग कभी भी हाथ न डाला करें। इस भाव को जानकर अंग्रेज़ ऐसे भयभीत