हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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·ने स्वयं पेशवा को महाराजाधिराज-पद से विभूषित करना स्वीकार किया। इन राजनैतिक कठिनाइयों के दूर हो जाने पर बड़ी धूम-धाम से पेशवा को महाराजाधिराज तथा वकीले-मुतलिक की पदवी दी गई। और यह इनाम उनके वंशजों के लिये सदा के लिये सुरक्षित कर दिया गया। अब पेशवा को मुग़ल बादशाह के नाम पर काम करने का अधि- कार मिल गया। यही नहीं, बल्कि उसके सेनापति महादजी को यह भी अधिकार मिल गया कि मुग़ल बादशाह के जिस पुत्र को चाहें उसका उत्तराधिकारी बनायें। अब सारे भारतवर्ष में घोषणा कर दी गई कि कोई गोवध न करे। सिंधिया, नाना फडनवीस तथा अन्यान्य महाराष्ट्र- सेनापतियों और नेताओं ने इस पवित्र कार्य के लिये उन्हें धन्यवाद दिया। अब मरहठों ने अपने अधिकारों को इस योग्य बना लिया था कि उनके द्वारा अपने प्रतिद्वन्द्वियों को चाहे वे यूरोपियन हों या एशि- याई—तथा जो मुग़ल बादशाह ही को वास्तविक महाराज मानने के बहाने उनका (मरहठों का) अपमान करते थे—नष्ट कर सकें। शासन-कार्य में भी मरहठों ने मुग़ल बादशाह के स्थानापन्न समझे जाने का दावा पेश किया। वे शाही फ़ौज के सेनापति तथा राज्य के मन्त्री थे; मुग़ल-राज्य के उत्तराधिकारी चुनने के लिये स्वतन्त्र थे; और सब से बड़ी बात तो यह थी कि वकील-ए-मुतलिक (महाराजाधिराज) का पद सदा के लिये उनका हो गया था। जब उत्सव समाप्त हो गया तो मनुष्यों की भारी भीड़ उस जुलूस के महल को लौटने का दृश्य देखने के लिये एकत्रित हो गयी। मनुष्यों की जयध्वनि, और तोप-बन्दूकों की गरज से आकाश गूँज उठा। जुलूस के महल के सामने पहुँचने पर पेशवा ने इसके संयोजकों की बड़ी प्रतिष्ठा की। हिन्दू-पद-पादशाही के सेनापति तथा इस उत्सव के विधाता महादजी अपनी सारी शक्ति और शान का विचार छोड़ कर आगे बढ़, पेशवा का जूता उठा लिया और धीरे से बोला— "हिन्दू-साम्राज्य के अधिपति महाराजाधिराज ! सारे राजकुमार, राजे,