भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

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राजे, तुर्क, मुग़ल बादशाह, रुहेले, नवाब और फिरंगी राजनीतिक क्षेत्र से मिट कर आपके आज्ञापालक बन गये हैं। आपका यह दास जन्म से लेकर अपना माग जीवनकाल हाथ में तलवार लेकर, इस प्रजातन्त्र के हित के लिये, दूर देशों में ही व्यतीत करता रहा है। राजाओं पर विजय प्राप्त करके मारा मान, गौरव और प्रतिष्ठा जो मैंने पाई है, वह भी आपके चरणों मे बैठ कर आपकी जूतियों की रखवाली करने की मेरी तृष्णा को न बुझा सकी । मेरी यह हार्दिक इच्छा है कि दिल्ली में प्रधान- मन्त्री होकर रहने की अपेक्षा मुझे महाराष्ट्र मे पटेल बन कर रहने का अधिकार मिले। अतएव कृपा कर वेदूर देशों मे जाकर काम करने से मुझे मुक्त कर दें और यही सेवा करने की आज्ञा प्रदान करें। मुझे भी अपनी पूर्वजों की भांति आपकी वैयक्तिक सेवा मे समय व्यतीत करने का सुअवसर मिले।” महादजी वाक्-पटु था। पेशवा सव ई माधवराव अच्छी प्रकृति का और सरल हृदय नवयुवक था। वह राजनीति के सम्पूर्ण अङ्गों का ज्ञाता था।, महादजी वस्तुतः पेशवा का भक्त था और शीघ्र ही उसने उसे अपनी ओर आकर्षित कर लिया । उसके हृदय मे हिन्दू-पद पाद- शाही के प्रबन्ध-मन्त्री बनने का इच्छा उत्पन्न हुई, जिस पर इस समय नाना फडनवीस था। कुछ काल व्यतीत हो जाने पर स्वय प्रधान-मन्त्री नाना द्वारा निश्चित कार्यक्रम में हस्तक्षेप करने लगा और एक बार जब सुअवसर मिला तो उसने नाना के विचारों का घोर विरोध किया। लेकिन उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ जब उसने पेशवा को गम्भीरता-पूर्वक यह कहते सुना, "नाना और महादजी मेरे राज्य के दो हाथ हैं। प्रथम दाहिना और दूसरा बायां हाथ है और प्रत्येक अपने २ कार्य में दक्ष है। उनके संगठित कार्य से ही राष्ट्र को उन्नति है। इनमें से कोई अगर अपने पद से जरा भी हटा दिया जाय तो वह शक्तिहीन हो जाएगा।” यद्यपि महादजी बातचीत करते समय बड़ा सतर्क रहा था तो भी नानासाहब के चतुर और बुद्धिमान् मित्रवर्ग से यह बात छिपी न रह सकी।