भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

[ १८४ ]

राजे, तुर्क, मुग़ल बादशाह, रुहेले, नवाब और फिरंगी राजनीतिक क्षेत्र से मिट कर आपके आज्ञापालक बन गये हैं। आपका यह दास जन्म से लेकर अपना माग जीवनकाल हाथ में तलवार लेकर, इस प्रजातन्त्र के हित के लिये, दूर देशों में ही व्यतीत करता रहा है। राजाओं पर विजय प्राप्त करके मारा मान, गौरव और प्रतिष्ठा जो मैंने पाई है, वह भी आपके चरणों मे बैठ कर आपकी जूतियों की रखवाली करने की मेरी तृष्णा को न बुझा सकी । मेरी यह हार्दिक इच्छा है कि दिल्ली में प्रधान- मन्त्री होकर रहने की अपेक्षा मुझे महाराष्ट्र मे पटेल बन कर रहने का अधिकार मिले। अतएव कृपा कर वेदूर देशों मे जाकर काम करने से मुझे मुक्त कर दें और यही सेवा करने की आज्ञा प्रदान करें। मुझे भी अपनी पूर्वजों की भांति आपकी वैयक्तिक सेवा मे समय व्यतीत करने का सुअवसर मिले।” महादजी वाक्-पटु था। पेशवा सव ई माधवराव अच्छी प्रकृति का और सरल हृदय नवयुवक था। वह राजनीति के सम्पूर्ण अङ्गों का ज्ञाता था।, महादजी वस्तुतः पेशवा का भक्त था और शीघ्र ही उसने उसे अपनी ओर आकर्षित कर लिया । उसके हृदय मे हिन्दू-पद पाद- शाही के प्रबन्ध-मन्त्री बनने का इच्छा उत्पन्न हुई, जिस पर इस समय नाना फडनवीस था। कुछ काल व्यतीत हो जाने पर स्वय प्रधान-मन्त्री नाना द्वारा निश्चित कार्यक्रम में हस्तक्षेप करने लगा और एक बार जब सुअवसर मिला तो उसने नाना के विचारों का घोर विरोध किया। लेकिन उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ जब उसने पेशवा को गम्भीरता-पूर्वक यह कहते सुना, "नाना और महादजी मेरे राज्य के दो हाथ हैं। प्रथम दाहिना और दूसरा बायां हाथ है और प्रत्येक अपने २ कार्य में दक्ष है। उनके संगठित कार्य से ही राष्ट्र को उन्नति है। इनमें से कोई अगर अपने पद से जरा भी हटा दिया जाय तो वह शक्तिहीन हो जाएगा।” यद्यपि महादजी बातचीत करते समय बड़ा सतर्क रहा था तो भी नानासाहब के चतुर और बुद्धिमान् मित्रवर्ग से यह बात छिपी न रह सकी।

[ १८० ]

इस समाचार को पाकर नाना, हरिपन्त फाड़के और समस्त मन्त्रिवर्ग चौंक पड़ा। उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य, सम्पूर्ण भारत को महाराष्ट्र के हिन्दू-साम्राज्य के अन्तर्गत करना था, जिसमें कोई भी स्वतन्त्रराज्य स्थापित न हो सके, अब अन्धकारमय देख पड़ने लगा। वे इस बात को अपने जीवन-काल में होता नहीं देख सकते थे। वे भली-भाँति जानते थे कि अपने पदों से हट जाने के प्रश्न का निपटारा तो हम त्यागपत्र द्वारा कर लेंगे, पर जनता पर इसका बड़ा बुरा प्रभाव पड़ेगा और वह असन्तुष्ट हो जायगी, जिससे अनिवार्य रूप से परस्पर युद्ध आरम्भ हो जायगा। अपना बयान देने के लिये नाना पूना पहुँचा। अपनी सारी सेवाओं का वर्णन करने के बाद उसने पेशवा से निवेदन किया कि "यदि आप सोन्धिया के हाथ में कठ-पुतली बन जायेंगे तो राज्य पर इसका बड़ा बुरा प्रभाव पड़ेगा। महादजी के परामर्श से यदि आप सहसा कोई काम कर बैठेंगे या कोई नवीन प्रबन्ध शुरू करेंगे तो आपस में लड़ाई छिड़ जायगी और हैदराबाद में तैयारी में लगे हुये मुसलमान तथा राज्य के नाश के इच्छुक अंग्रेजों की अभिलाषा पूर्ण हो जायगी और वे इस राज्य को छिन्न-भिन्न कर डालेंगे।" नेत्रों में आँसू भर कर प्रधान मन्त्री ने कहा—"यदि केवल मुझे अपने पद से हटाने का प्रयत्न है तो मैं प्रसन्नता- पूर्वक हटने को तैयार हूं, और यह मेरा त्याग-पत्र है। यदि इतने से राष्ट्र का भला हो और पारस्परिक युद्ध टल जाय तो कृपा करके मुझे आज्ञा दीजिये कि अब काशीजी जाऊँ और इस संसार से सम्बन्ध विच्छेद करने की कोशिश करूँ।" नवयुवक पेशवा पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा और महाराष्ट्र-निर्माता नाना के इस नम्र निवेदन पर उसका भी हृदय पिघल गया और उच्च स्वर से कहने लगा—"किन कारणों से आप ऐसा कह रहे हैं, और किस प्रकार ऐसे विचारों ने आपके हृदय में स्थान पाया ? आप केवल मेरे मन्त्री ही नहीं, किन्तु मेरे पथ-प्रदर्शक, राज- नैतिक गुरु और मित्र हैं। इस राज्य का सम्पूर्ण भार आपके कन्धों पर है और ज्यों ही आप हट जायेंगे यह गिर कर टुकड़े २ हो जायगा।"

[१६१]

नाना का गला भर आया और कहने लगे- "महाराज ! आपके जन्मकाल से ही नहीं; किन्तु इसके पहले से भी आपके अधिकारों और इस राज्य की भलाई के लिये मैंने लाखों मनुष्यों से शत्रुता उत्पन्न की । अब मेरी उन सेवाओं की गणना नहीं है और शत्रुओं की बात सुनी जाती है।" उदारचित्त नवयुवक इन बातों को सुन कर इतना दुःखी हुआ कि अपने राज्य के प्रधान और नाना के प्रधान-मन्त्री होने की सुधि भी उसे न रही और प्रेम से अधीर होने के कारण उसके गले में अपना हाथ डाल कर सिसकते हुये कहने लगा— "मेरा त्याग न कीजिये; दुःखित होने का कोई कारण नहीं है, आप न केवल मेरे प्रधान-मन्त्री ही हैं प्रत्युत् बालपन से आप ही मेरे पिता हैं। यदि मैं अपने मार्ग से पथ-भ्रष्ट हुआ हूँ तो उसके लिये क्षमा कीजिये। कदापि मैं तुम्हें अपने पद से त्याग-पत्र देने अथवा पृथक् होने की स्वीकृति नहीं दूँगा। मैं आजीवन आपको नहीं छोड़ सकता।" पेशवा के इन दयायुक्त विश्वासपूर्ण शब्दों से नाना, भाऊ, हरिपन्त फाडके तथा मन्त्री-मण्डल के अन्यान्य नेता सशक्त हुये और महादजी पर भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ा । वे भी विस्मित हो गये । चाहे व्यक्तिगत इच्छा जो कुछ भी रही हो, पर इसमें कुछ सन्देह नहीं कि महादजी हिन्दू-साम्राज्य के उतने ही बड़े भक्त और शुभचिन्तक थे जितना उनके कोई भी सहयोगी कार्यकर्त्ता वे सर्वदा अपने प्राण बलिदान करके उसे सर्वोपरि रखने में प्रयत्नशील रहने वाले थे । यह दादा राघोबा नहीं थे । यद्यपि उनका विचार महाराष्ट्र राज्य को अपने हाथ में रखने का था, पर वह कभी यह नहीं चाहते थे कि आपस में युद्ध हो । अतएव प्रसन्नतापूर्वक मन्त्रिमण्डल के साथ सहमत हो पेशवा की इच्छानुसार चलने पर तैयार हो गये। इसी बीच में हरिपन्त फाडके इत्यादि ने उनको घेर कर सूचित किया कि आपकी, मन्त्रिमण्डल के समस्त अधिकारों को अपने हाथ में रखने की इच्छा के कारण, हम लोगों में प्रतिद्वन्दिता होने

लगेगी, जिससे बाहरी शत्रु प्रबल होकर उस हिन्दू-साम्राज्य को, जिसके लिये सहस्रों वीर आत्मायें बलिदान हो गईं, बड़ी हानि पहुँचायेंगे। नाना ने त्याग-पत्र दे देना उचित समझा है, कारण, वे गृहकलह पसन्द नहीं करते। इन बातों का महादजी पर बड़ा प्रभाव पड़ा और उन्होंने प्रण किया कि भविष्य में अब वह कभी नाना और उसके दल का विरोध न करेगा। जैसा मरहठा इतिहास में कई बार पहिले भी हो चुका है, इस बार भी हुआ। जातीय हित के सामने व्यक्तिगत स्वार्थ को ठुकरा कर दो बड़े नेता सहयोगपूर्वक काम करने को फिर उद्यत हो गये। दोनों ने पेशवा के चरणों के पास बैठ कर शपथ खायी कि आज से वे लोग अपनी पुरानी बातों को भूल जायेंगे और पेशवा तथा इस प्रजातन्त्र की, जो हिन्दुओं और उनके धर्म का रक्षक है, सेवा में जीवन सफल करेंगे। नाना फड़नवीस और महादजी के मनोमालिन्य दूर हो जाने का - समाचार सारे महाराष्ट्र में फैल गया और सब लोगों ने इस बात पर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की। इस का अन्दाजा गोविन्दराव काले के पत्र से-जो उस समय के महाराष्ट्र-मण्डल का एक बड़ा भारी विद्वान् और देशभक्त राजनीतिज्ञ था और निज़ाम-राज्य में रेज़ीडेण्ट नियुक्त था-लग सकता है। यह पत्र निज़ाम की राजधानी से इस प्रकार लिखा गया था-"आप के पत्र ने मुझे प्रसन्न कर दिया और मेरे आनन्द का पारावार न रहा। जब सारा विवरण पढ़ चुका तो हृदय में अनेकों विचार उठने लगे। अटक से हिन्दमहासागर पर्यंत सारा देश हिन्दुओं का होने के कारण हिंदुस्तान है, न कि तुर्किस्तान। पांडवों के समय से लेकर महाराज विक्र- मादित्य तक ये ही हमारे देश की सीमाएं रही हैं और उन्होंने देशकी विदे- शियों से रक्षा की तथा उसपरशासन किया। परन्तु उनके उत्तराधिकारी इतने अयोग्य और नपुंसक निकले कि भारत के शासन की बागडोर यवनों के हाथ में चली गई और हमारी स्वाधीनता का नाश हो गया। बाबरके वंशजोंने हस्तिनापुर या देहली का राज्य जीता और अन्त में औरङ्गज़ेब के शासन-

[ १६३ ] काल में हम इतने दबा दिये गये कि हमारी यज्ञोपवीत धारण करने की धार्मिक स्वतन्त्रता भी छिन गई । इस समय अपने धर्म के निमित्त विवश होकर पोल-टैक्स देना पड़ता था तथा हमें विवश होकर अपवित्र भोजन खरीदना और खाना पड़ता था । 'ऐसे नाजुक समय में महाराज शिवाजी का जन्म हुआ जो एक नवीन युग के प्रवर्तक और धर्म के रक्षक थे । उन्होंने भारतवर्ष के एक कोने को स्वतन्त्र करके हिन्दू-धर्म को शरण दी । उसके पश्चात् नाना साहब और भाऊसाहब हुये, जिनका तेज सूर्य की भांति चमका । जो कुछ हम खो चुके थे वह सब महादजी सींधिया की बुद्धिमत्ता द्वारा हम लोगों ने महाराज पेशवा के शासनकाल में फिर लौटा लिया । यह सब कार्य किस प्रकार सम्पादित हुए यह सोचकर आश्चर्य होता है । एक बार भी सफलता प्राप्त कर लेने पर हम अन्धे हो जाते हैं और उसके भारी परिणाम को नहीं देखते । यदि ऐसी सफलता मुसलमानों ने प्राप्त की होती तो कई इतिहास उनके गुणानुवाद में तैयार हो जाते । मुसलमान एक छोटे काम को भी आसमान तक चढ़ा देते हैं, पर इसके विपरीत हिन्दू यदि कोई कितना भी गौरवपूर्ण कार्य क्यों न करें, हम उस प्रकट तक नहीं करते । किन्तु वास्तव में आश्चर्यजनक घटनाएं हुई हैं; अजेय जीता गया है । मुसलमान राज्य को काफिरों के हाथ मे जाने और काफिरशाही आने की बात सोच २ प्रत्यक्ष रो रहे हैं । 'वास्तव में जिन जिन लोगों ने भारतवर्ष में हमारे विरुद्ध सिर उठाया, महादजी ने सब को चकनाचूर कर दिया । हम लोगों ने जितनी सफलता प्राप्त की है वह मानवशक्ति के बाहर है । बहुत अंशों में सम्पूर्ण होते हुये भी अभी हमें बहुत से कार्य करने शेष हैं । कोई नहीं जानता कि कब और कहां हमारे गुण हमे असफल बनादें और दुष्टों की क्रूर दृष्टि हमारे लिये हानिकारक हो । हम लोगों का गौरव राज्य प्राप्त करने तक ही परिमित नहीं है, हम संसारिक सुखों से ही सन्तुष्ट नहीं हो सकते; वरन् वेद, पुराण और शास्त्रों की रक्षा, धर्म और हिन्दू-सभ्यता की वृद्धि

[ १६४ ]

और गौ-ब्राह्मण की सेवा करना भी हमारा मुख्य कर्तव्य है; और इन सब उद्देश्यों की पूर्ति की कुञ्जी आप और महादजी के हाथों में है। आप लोगों के बीच का ज़रा-सा भी मनो-मालिन्य शत्रुओं की शक्ति को प्रबल बना देगा। किन्तु अब आप लोगों के आपस में मेल हो जाने के समाचार ने हम लोगों की सारा शंकाओं का अन्त कर दिया। अब अपनी सेनाओं को हम लाहौर में पड़ो रहने दें और सीमान्त की ओर बढ़ने के लिये तैयार हों। हमारे शत्रुओं को यह आशा थी कि हम लोग आपस में लड़कर नष्ट हो जायेंगे; अब उनकी इन आशाओं पर पानी फिर गया। मुझे इसकी बड़ी चिन्ता थी; आज वे सारी चिन्तायें मिट गईं। अच्छा हुआ; बहुत ही अच्छा हुआ, अब मुझे शान्ति प्राप्त हुई है।" सच्चे उत्साही कार्यकर्त्ता द्वारा लिखा हुआ उपरोक्त पत्र, कई दर्जन नीरस इतिहासों की अपेक्षा, मरहठों की आत्मा, स्वभाव और उत्साह का कहीं ठीक चित्र खींच देता है। पर इन महान शंकाओं और आशाओं के संघर्ष के बीच ही महादजी को ज्वर हो गया और पूना के समीप वानावादी में १२ फ़रवरी सन १७६४ ई० को इस संसार से चल बसे। इस से समस्त राष्ट्र शोकसागर में डूब गया। शक्तिशाली सरदार और सेनापति महादजी की मृत्यु को देख कर महाराष्ट्र के शत्रुओं में नवीन जीवन का संचार हो गया, और वे महाराष्ट्र- मंडल को नष्ट करने के लिये प्राण-पण से प्रयत्न करने लगे। इन शत्रुओं में अग्रगण्य निज़ाम हैदराबाद थे जिनको मरहठों ने बिल्कुल निर्बल करके अच्छी प्रकार अपने हाथों में कर लिया था। अब वह मरहठों से बदला लेने का सुअवसर समझ कर उत्तेजित हो उठा। इस समय उसने अपनी सेना पहले की अपेक्षा बारहगुनी कर ली थी; और उसे एक फ्रांसीसी सेनापति की अध्यक्षता में रक्खा था। निज़ाम का मन्त्री मुशरूलमुल्क एक कट्टर मुसलमान था। महादजी ने, जो बादशाही अधिकार मुगल सम्राट से अपने पेशवा के लिये प्राप्त किया था, वह

[ १६५ ]

उसे असह्य हो गया। मुसलमान गांव-गांव और घर-घर घूमकर डींग मारते फिरते और कहा करते थे कि शीघ्र ही युद्ध होगा; जिसमें काफिर- शाही का अन्त होगा और पूना में मुसलमानी ध्वजा फहराएगी। निज़ाम का मन्त्री इतना ढीठ हो गया कि जब मरहठा रेजिडेण्ट ने उससे चौथ मांगी तो उसने उत्तर दिया कि नाना स्वयं हैदराबाद आवें और हमें बतलावें कि उन्हें "चौथ" लेने का क्या अधिकार है। फिर उसने कहा— "यदि नाना यहां स्वयं न आएगा तो मैं शीघ्र ही उसे यहां ले आऊँगा।" फिर यह सोच कर कि सम्भव है कि इतने ही अपमान करने पर मरहठे लड़ने को उद्यत न हों, निज़ाम ने एक बादशाही उत्सव किया जिसमें दूसरे देशों के भी राजदूत बुलाये गये थे। उन राजदूतों के समक्ष अपने दो दरबारियों को नाना और माधोराव पेशवा बना कर उनका हर प्रकार से परिहास किया गया। इस पर मरहठे राजदूत गोविन्दराव पिंगले और गोविन्दराव काले क्रोध भरे उठ खड़े हुये और निज़ाम के इस असभ्यता- पूर्ण कार्य का घोर विरोध और निन्दा की और अन्त में मरहठा वीर ने ललकार कर कहा, "ऐ मुशीरुलमुल्क ! तू ने कई बार अपनी शक्ति पर अभिमान करके नाना को नीचा दिखलाने का प्रयत्न किया और चाहा कि उन्हें हैदराबाद आने के लिये विवश करूं, किन्तु स्वयं अपमानित हुआ। इस बार भी तूने इस राजदरबार में हमारे स्वामी का अपने दरबारियों द्वारा अपमान कराया है। मैं आज ही ललकार कर कहे देता हूँ कि यदि मरहठे तुमको जीते पकड़ कर महाराष्ट्र की राजधानी में तमाशा बनाकर न घुमायें तो मेरा नाम गोविन्दराव नहीं।" यह कह कर मरहठे-राजदूत निज़ाम के दरबार से निकल कर पूना के लिये चल दिये और पूना पहुँच कर लड़ाई की घोषणा कर दी। अंग्रेज़ दोनों विपक्षियों के हितकारी बनने का ढोंग दिखाने के लिये सुलह कराने का प्रयत्न करने लगे; किन्तु मरहठों ने उन्हें डांट कर कह दिया कि महाराष्ट्र-के कार्यों में आप लोग कभी भी हाथ न डाला करें। इस भाव को जानकर अंग्रेज़ ऐसे भयभीत

[ १६६ ]

हुये कि यद्यपि निज़ाम ने उनकी सहायता चाही, किन्तु अंग्रेजों ने देने का साहस न किया। निज़ाम ने लड़ाई की बड़ी तैयारी की थी। उसका मन्त्री बड़ी बड़ी डींगे मारता था और उसने कुछ मुसलमान मौलवियों को आज्ञा दे दी थी कि घूम-घूम कर यह प्रचार करो कि यह धार्मिक युद्ध है और इसमें भाग लेना प्रत्येक मुसलमान का परम कर्त्तव्य है। काफ़िरों का सत्यानास करके पूना को लूट कर जला देना हमारा परम धर्म है। वज़ीर मुशरुलमुल्क स्वयं कहा करता था कि मैं मुगलराज्य को मरहठों की पराधीनता से मुक्त करूँगा और इस बार नवयुवक पेशवा को भिक्षुक बना दूँगा, ताकि वह महाराष्ट्र छोड़ कर बनारस जाकर द्वार-द्वार भिक्षा मांगे। जबकि हैदराबाद का वज़ीर इस प्रकार की डींगें मारने में चूर हो रहा था, उस समय मरहठों का मन्त्री अपनी सेनाओं की गणना कर रहा था, और आक्रमण करने का उपाय सोच रहा था। यद्यपि उनके वीर सरदार और प्रधान सेनापति महादजी की मृत्यु हो गई थी, फिर भी मरहठों ने उस समय पूर्ण उत्साह दिखलाया। नाना की बुद्धि कभी इतनी प्रखर न हुई थी। अपने समाज के लोगों पर उसका जैसा अद्भूत प्रभाव इस बार दिखाई दिया पहले कभी देखने में न आया था। उसकी आज्ञा पर महाराष्ट्र की दूर देशों में फैली सेना, हिन्दू-पद-पादशाही के नाम पर पूना में एकत्रित होने लगी। महादजी का उत्तराधिकारी दौलतराव सींधिया, आगरे का रक्षक जीवादादा बख्शी, दूसरे सेनापति, और जो सेनायें उत्तरी भारतवर्ष में पठानों, रुहेलो और तुर्कों को आधीन किये हुए थीं, बुलाई गईं। तुकाजी होल्कर अपनी सेना के साथ वहां पर पहले से उपस्थित था। राघोजी भोंसला एक शक्तिशाली सेना लेकर नागपुर से चल पड़ा। गायकवाड़ भी बड़ौदा से चल कर पूना में आ पहुंचा। पटवर्धन, रास्ते, राजेबहादुर और विनचुरकर, घाटगे, च्यावन, डाफिले, पवार, थोराट आदि बहुत से सरदार और सेनापति इस स्थान पर एकत्रित हो गये। पेशवा

[ १६७ ]

ने स्वयं अपने मन्त्री को लिये सेना के साथ प्रस्थान किया। यह पहला अवसर था जब कि नवयुवक पेशवा ने स्वयं युद्ध में भाग लिया था। यह देखकर मरहठे-सिपाही, शूरता और वीरता से भर उठे और इस आक्रमण को बहुत आवश्यक समझने लगे। निज़ाम पहले से ही रणक्षेत्र में डटा था। निज़ाम के साथ एक लाख दस हज़ार घुड़सवार और पैदल सेना और बहुत बड़ा तोपखाना था। उसे विश्वास था कि वह विजयी होगा। मरहठों की बहुत-सी सेनायें सीमान्त प्रदेश की रक्षा के लिये पीछे रह गई थीं तथापि एक लाख तीस हज़ार सेना इकट्ठी हो गई। यह दोनों सेनायें महाराष्ट्र के सीमान्त पर पारंदा स्थान पर मिलीं। नाना ने परशु- राम भाऊ पटवर्धन को सारी सेना का सेनापति नियुक्त किया। ज्यों ही दोनों सेनायें इतनी दूरी पर आ गईं कि गोली एक दूसरे तक पहुँच सके, लड़ाई प्रारम्भ हो गई। पठानों ने कई बार मरहठों की सेना को पीछे हटने के लिये विवश किया। चूंकि इस पराजित सेना में परशुराम भाऊ भी सम्मिलित था इसलिए मुग़लों और पठानों की प्रसन्नता का पारावार न रहा और उन्होंने इस सफलता पर अपने खेमे में एक दरबार किया। किन्तु जब मरहठों की मुख्य सेना पहुँची तब निज़ाम को अपनी भूल मालूम हुई। अहमदअली खां ने ५० हज़ार चुनी सेना लेकर मरहठों की सेना का सामना करके बड़ी वीरता से वार करना आरम्भ कर दिया। भोंसले की सेना ने उनका मुकाबला किया और उनकी सेना पर गोलाबारी शुरू कर दी। शीघ्र ही सींधिया के तोप- खाने ने एक दूसरी तरफ़ से गोलाबारी करना आरम्भ कर दिया। लड़ाई ने बड़ा भयंकर रूप धारण कर लिया। मुसलमान अल्लाहोअकबर की ध्वनि से आकाश को गुंजाने लगे, किन्तु फिर भी वे अपने स्थान पर डटे न रह सके। वे पीठ दिखाकर भाग गये और उनकी सेना की बहुत बुरी पराजय हुई। निज़ाम भी बहुत डर गया और लड़ाई के मैदान से भाग गया और रात्रि हो जाने के कारण मरहठों के हाथ न आया। छोटी २ लड़ाइयां सारी रात होती रहीं। घबराहट के कारण मुसलमानी सेना

[ १६८ ]

तहस-नहस हुई। मौलवी लोगों द्वारा धर्म के नाम उत्साहित किये जाने पर भी मुग़ल घबराहट में पड़ कर अपने ही खेमे लूटने लगे और शीघ्र ही सिर पर पांव रख कर भाग निकले। मरहठे खेमों के रखवाले तम्बूमें थे। जो कुछ लेकर वे आगे जाते थे ये सब ले लिया करते थे। प्रातः काल निज़ाम की सेना पहिली जगह छोड़ कर खारदा गांव के दुर्ग के पीछे जाकर खड़ी हुई। उस समय उसकी सेना में केवल दस हज़ार सिपाही रह गये थे। मरहठे पार्श्ववर्ती पहाड़ों पर से उन पर गोलाबारी करने लगे। दो-तीन दिन तक मुग़ल उसको सह सके। तीसरे दिन उसकी दाढ़ी ही नहीं अपितु उसका धार्मिक साहस भी सच्चे अर्थों में झुलसा गया। तीसरे दिन प्यास से सूखे गले, धुएं से गला घुंटे हुए, शत्रुओं ने लड़ाई को बन्द करने की प्रार्थना की। मरहठों ने कहा कि पहले मिश- रलमुलक को हमारे हवाले करो तब कोई दूसरी बात होगी। लम्पटता- पूर्वक उसने मरहठे-राजदूत का, नहीं २ महाराष्ट्र के मन्त्री का, जो अप- मान किया है, उसको अपनी उस बड़ी भूल का अवश्य बदला देना पड़ेगा। उन्होंने निराश होकर अपने राजमन्त्री को मरहठों के हवाले किया और यह इच्छा प्रकट की कि आप जिस शर्त पर कहें हम लोग सुलह करने को तैयार हैं। पारंदा और ताप्ती के बीच का सारा देश और तीन करोड़ रुपये चौथ का बकाया मरहठों को मिले। इसके अतिरिक्त भोंसला ने १६ लाख रुपया लड़ाई का हरजाना अलग लिया। इन शर्तों पर मरहठों ने निज़ाम की सेनाको जो कि मरहठों की राजधानी पूना को जलाने, लूटने और पेशवा को काशी भेज कर भीख मंगाने आई थी लौट जाने दिया। मिशरलमुलक को मरहठों की विजयी काफ़िरों की सेना के बीच क़ैदी बना कर घुमाया गया। जब वह क़ैदी की दशा में मरहठों के खेमे-खेमे घुमाया जाता था तो काफ़िर उसे देख कर हर-हर महादेव की ध्वनि से आकाश गुंजाते थे। उन्होंने उस आदमी को पकड़ा था, जो नाना के पकड़ने की डींग मारा करता था। मरहठों ने अपने राजदूत

[ १६६ ]

के प्रण को पूरा किया। सज्जन मन्त्री और सर्व-प्रिय पेशवा ने शत्रु को यह दिखला दिया कि अगर वे चाहें तो उसे पूना के द्वार-द्वार घुमा सकते हैं। किन्तु उन्होंने उसका और अधिक अपमान करना उचित न समझा। नाना ने उसे क्षमा कर दिया। मरहठों ने यह दिखला दिया कि ये जिसे चाहें दण्ड दे सकते हैं, किन्तु वे बहुत लोगों को क्षमा ही कर दिया करते हैं। पेशवा ने सारे सेनापतियों के साथ बड़े धूमधाम और उत्सव के साथ अपनी राजधानी में प्रवेश किया। चारों ओर से मनुष्यों के झुंड-के-झुंड पूना में अपने पेशवा और बहादुर सैनिकों को बधाई देने के लिये आने लगे। पूना अपने विजयी सपूतों के स्वागत के लिये अति उत्तमता पूर्ण सजाया गया था। स्त्रियां बादशाही शहर के महलों की छतों झरोखों पर बैठी हुई विजयी शूरवीरों, सेनापतियों, राजनीतिज्ञों तथा अपने प्रिय पेशवा के ऊपर पुष्पों की वर्षा करती थीं। कुमारी कन्यायें तथा भद्र महिलायें, भक्ति और श्रद्धापूर्वक अपने २ द्वारों पर खड़ी होकर, अपने नवयुवक पेशवा की आरती उतारती थीं। अपनी राज्यभक्त और श्रद्धालु प्रजा द्वारा सम्मानित होता हुआ पेशवा अपने राजमहल की ओर बढ़ता गया। बहुत से सेनापति और सरदार- गण अपनी बड़ी बड़ी सेनायें लिये हुए, राजधानी के चारों ओर बहुत दिनों तक पड़े रहे। यह देखकर नाना के मन्त्रित्व और भाऊ के सेनापतित्व में हिन्दू-महा-राष्ट्र के दिनों की याद आने लगी। प्रिय पाठको! हम कुछ समय तक यहीं रुक जांय और अपने नवयुवक, भाग्यशाली और सुप्रसन्न पेशवा को अपनी प्रजा की अपार भक्ति और सर्वप्रियता का आनन्द लेने के लिये, बलवान् मन्त्रिगणों द्वारा जीते हुये राज्य को प्रजातन्त्र राज्य के उचित विभागों में विभाजित करके उनका सुप्रबन्ध करने के लिये, भविष्य कार्यक्रम बनाने के लिए, प्रान्तों के प्रतिनिधियों और सेनापतियों से परामर्श करने के लिये, महाराष्ट्र के निवासियों को विजय की प्रसन्नता पर आनन्द मनाने के लिये, भाट और

[ २०० ] राज-कवियों को अपने पूर्वजों और सन्तानों के गुणगान जिनको सुनकर अब भी मनुष्य आनन्द से विह्वल हो जाता है किसानों को नाना के सुप्रबन्ध से प्रसन्न होकर अपने हलों के पीछे गाना गाने के लिये छोड़ दें ; और हम उन मन्दिरों के दृश्य को देखें जहां पर सहस्रों मनुष्य भेंट लेकर नाना प्रकार से पूजा करने के लिये एकत्रित हुये हैं और अपने पूजन में मग्न हैं, जहां देशों के भिन्न-भिन्न भागों के यात्री, संन्यासी, योगी, यती और वैज्ञानिक हरिद्वार से लेकर रामेश्वर तक, अपने- अपने कार्यों में निश्चित होकर संलग्न हैं और जहां धनी लोग शास्त्रों और वेदों के अध्ययन के प्रोत्साहन के लिये करोड़ों रुपये व्यय कर रहे हैं, जिससे अध्यापक और विद्यार्थी गुरुकुल और महाविद्यालयों में विद्याध्य- यन कराते और करते हैं, जहां सैनिक और मल्लाह लोग वीरतापूर्ण कहा- नियां अपनी प्यारी स्त्रियों और अपनी पूज्य माताओं को सुना रहे हैं और उन्हें अपने शौर्यपूर्ण कार्यों का समर्थन कराने के लिये शत्रुओं से लूट में पाये हुये हीरे जवाहरात और स्वर्ण को दिखा रहे हैं, सारा महाराष्ट्र स्वतन्त्र है और आनन्द के सागर में किल्लोल कर रहा है। पाठको ! हमें प्रजा को ऐसे आनन्द में ही छोड़ देना उचित है ताकि स्वतन्त्रता और राष्ट्र-महत्ता के फल का उपभोग कर सकें जोकि उन्होंने कई पीढ़ियों के अपार परिश्रम और प्रयत्नों से प्राप्त किया है। यद्यपि उसे परमात्मा ने यह ज्ञान दिया है कि सुख क्षणिक है, तथापि वह सदैव वैभव की चोटी पर रहना चाहता है। इसलिए जितने समय तक उन सुखों को वह भोग सकता है उसे भोग लेने देना चाहिए। अब हम, जो कुछ पहिले संक्षेप से महाराष्ट्र के वर्तमान इतिहास में लिख आये हैं, उसी का सिंहावलोकन करेंगे। हम महाराष्ट्र के इतिहास को भारत के इतिहास से सम्बन्धित करने की चेष्टा करेंगे और यह दिखाने का प्रयत्न करेंगे कि यह भारत के इतिहास का ही एक अंग है एवं उसका एक महत्वपूर्ण और मार्मिक अध्याय है।

उत्तरार्ध सिंहावलोकन १. आदर्श महाराष्ट्र प्रभुत्व के अधीन अखिल भारतीय हिंदू साम्राज्य। "स्वामी हिंदुराज्यकार्यधुरंधरः राज्याभिवृद्धिकर्तेः तुम्हा लोकांचे आज्ञेवगनीं पावले. संपूर्ण हिन्दुस्तान निरुपद्रवी राहे तें, संपूर्ण देशदुर्ग हस्तवश्य करून वारणशीस जाऊन, श्रीविश्वेश्वरस्थापना करितात"॥ ॐ — रामचंद्र पंत अमात्य महाराष्ट्र के इतिहास का सिंहावलोकन हम इस उद्देश्य से कर रहे हैं ताकि विस्तृत वर्णनों के झमेलों में से उन मुख्य २ घटनाओं को पृथक करके ऐसे क्रम से रखें जिससे हम पान-हिन्दू आन्दोलन दृष्टि से वर्तमान महाराष्ट्र के इतिहास का उचित मूल्य आंक सकें और उसकी यथार्थ प्रशंसा भी कर सकें। हमारा ऐसा करने का दूसरा उद्देश्य यह है कि हम इसको इस प्रकार से वर्णन करें जिससे यह प्रकट हो कि महाराष्ट्र का इतिहास भी हिन्दू-राष्ट्रीय इतिहास का ही एक अंग है अथवा ॐ सारे भारत के शासक, अपने राज्य को सुव्यवस्थित रूप से चलाने वाले, राज्य की प्रतिदिवस वृद्धि करने वाले महाराज ! आपकी आशीर्वाद से हमने इस कार्य में सफलता प्राप्त करके सारे भारत में शान्ति स्थापित करदी, सारे किलो पर अपना अधिकार कर लिया, और बनारस में विश्वेश्वर जी की स्थापना की है।

उसका एक अध्याय ही है, यद्यपि वह कितना ही महत्वशाली और शानदार है। इसलिए यह परमावश्यक था कि हम महाराष्ट्र के इतिहास का यथासंभव संक्षेप से वर्णन करते। इसके साथ यह भी जरूरी था कि हम उस मूलकारण, स्रोत तथा प्रेरक शक्ति को भी एक निश्चित रूप में प्रकट करते जिसमें कि प्रोत्साहित होकर सारी महाराष्ट्र जाति एक शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य स्थापित करने तक, संघर्ष तथा, प्रयत्न करती रही और अपने प्राणों की आहुतियां चढ़ाती रही। क्योंकि महाराष्ट्र प्रांत से बाहर वाले लोग महाराष्ट्र के इतिहास के प्रथम भाग से ही भली भांति परिचित हैं और उस भाग का, पिछले भाग की अपेक्षा, मान भी अधिक करते हैं—पिछला भाग बालाजी विश्वनाथ के प्रादुर्भाव तथा महाराष्ट्र-मण्डल की स्थापना से आरम्भ होता है। इसके विषय में लोग बहुत कम जानते हैं। रानाडे जैसे विद्वान् शिवाजी तथा : राजाराम के वंशजों के पूर्ण वृत्तान्त उनके वास्तविक रूप में पहले ही प्रकट कर चुके हैं। हमने भी प्रथम भाग की केवल दो चार घटनाओं का ही स्थूल दृष्टि से वर्णन किया है। दूसरे भाग का हमने विस्तार पूर्वक वर्णन किया है यद्यपि वह भी सम्पूर्ण नहीं कहा जा सकता। दूसरे भाग के आरम्भ होने के साथ ही महाराष्ट्र का इतिहास विशेष महाराष्ट्र का इतिहास नहीं रह जाता, वरन् वह इतना महत्वशाली बन जाता है कि उसे सारे भारतवर्ष का इतिहास मानना पड़ता है। पान-हिन्दु सिद्धांत की दृष्टि से महाराष्ट्र इतिहास का सिंहाव- लोकन करने, तथा उन सिद्धान्तों को, जिन सिद्धान्तों ने कि महा- राष्ट्रवासियों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रोत्साहित किये रखा—निश्चित रूप में प्रकट करने का जो हमने प्रयास किया है, उनके संबन्ध में हमने अपनी ओर से कुछ नहीं लिखा, अपितु उस आन्दोलन के संचालक विचारकों तथा कार्यकर्ताओं तथा उनके महान् उद्देश्यों से ही उसका समर्थन कराया है। इस आन्दोलन में सम्मिलित होनेवाले वीर मुख से कुछ न कह

[ ३ ]

कर अपने कार्यों से ही अपने उद्देश्यों को जनता के सामने रखते थे, कारण यह था कि वे हिन्दू-जाति के अङ्गों को पुष्ट करने में इतने व्यस्त थे कि उन्हें कुछ कहने का अवकाश ही नहीं मिलता था; तो भी जो कुछ इन्होंने कहा है उसका प्रभाव उतना ही पड़ा है जितना कि उनके कार्यों का। उनके इन कथनों और कार्यों के द्वारा हमने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि उस वीर-महाकाव्य का मुख्य विषय, उस प्रबल संगीत की टेक तथा वह ध्येय जिसने सारे आन्दोलन में जीवन का संचार किया तथा जनता को प्रोत्साहित किये रखा—यह था कि हिन्दूधर्म को विदेशी गैर- हिन्दुओं के शासन की धार्मिक तथा राजनैतिक जंजीरों से मुक्त कराया जाय तथा एक विशाल शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया जाय जो भारतीय सभ्यता और धर्म की रक्षा करने के योग्य हो, जिस में धर्मोन्मत्त विदेशी अपनी हठधर्मी के कारण भारत का सत्यानाश न कर डालें। इस उद्देश्य से न केवल शिवाजी और रामदासजी ही प्रभावित हुए थे वरन् उनके पीछे होने वाले लोगों ने इसी उद्देश्य को दृष्टि में रख कर कार्य किया और एक विशाल साम्राज्य की स्थापना करने में वे सफल भी हुए। सर्वप्रथम शाह जी ने "स्वधर्म राज्य" का स्वप्न लिया। फिर उसके सुपुत्र शिवाजी ने अपने साथियों को अपना परम ध्येय "हिन्दवी स्वराज्य' बताया, तत्पश्चात् बाजीराव ने हिन्दू-पद-पादशाही की स्थापना का दृढ़ निश्चय प्रकट किया; अंत में बुद्धिमान् राजदूत गोविन्दराव काले न १७८५ मे विजय ध्वनि में कहा—'भारत हिन्दुओं का देश है (हें हिंदुस्थान आहे) यह तुर्कों का नहीं है (तुर्कस्थान नव्हे)। देव और धर्म तथा सच्चाई और ईश्वर की सेवा के लिए समर्पित हिन्दू-साम्राज्य की स्थापना की इस श्रेष्ठ धारणा और सजीव उद्देश्य ने इस आंदोलन में अंतिम समय तक स्फूर्ति का संचार किये रखा। स्वतन्त्रता के मौलिक सिद्धांत, स्वराज्य तथा स्वधर्म के पर फैलाये एक शताब्दी तक भारतरूपी अंडे को सेंते रहे और उसमे से शक्तिशाली जाति का जन्म हुआ जिसने इसके

: [ ४ ] मनोरथों को सफल बना दिया। दूसरी परमावश्यक बात, जो हम अपनी इस पुस्तक द्वारा महा- राष्ट्र प्रांत से बाहर रहने वाले भारतवासियों के मन में बिठाना चाहते हैं, यह है कि इस कार्य की पूर्त्ति के लिये एक या दो मनुष्य, या एक पीढ़ी ही नहीं, वरन सारी मरहठा-जाति ही उद्यत हो गई थी। यद्यपि हिन्दू-जाति की इस परतन्त्रता की लड़ाई का प्रारम्भ महाराज शिवाजी और स्वामी रामदास जी के वंशजों ने किया था; किन्तु उनकी मृत्यु के पश्चात् यह आन्दोलन बन्द न हुआ, वरन उनकी आनेवाली सन्तानें उनके सिद्धान्तों का अनुसरण करती हुई इस आन्दोलन की सफलता के लिये प्राणपण से प्रयत्न करती चली गईं। ज्यों २ समय बीतता गया त्यों २ यह आन्दो- लन फैलता गया। बड़े २ वीरता के कार्य सम्पादन हुए और उनके द्वारा बड़ी २ सफलतायें भी प्राप्त हुईं। योग्य पुरुषों, स्त्रियों, राजनीतिज्ञों, शूरवीरों, राजाओ और राजाओं को राजा बनाये रखने वाले सूरमाओं और लेखकों ने सहस्रों और लाखों की संख्या में इस कार्यक्षेत्र में पदा- र्पण किया और उनका यह कार्य एक सौ वर्ष तक यथाक्रम उन्नति को प्राप्त होता गया। सारे लोग ज़रीपताका, हिंदु धर्म की पताका - सुनहले गेरुआ वस्त्र के झंडे के नीचे कार्य करते रहे। इसके साथ ही-साथ जब हमारा ध्यान मरहठों के अद्भुत राज- नैतिक ज्ञान और शासन-चातुरी की ओर जाता है और हम यह देखते हैं कि मरहठे अपने राज्यों को मिला कर महाराष्ट्र-मण्डल के रूप में परि- णत कर देते हैं तो हम इस निश्चय पर पहुंचते हैं कि मरहठा-आन्दो- लन न केवल सार्वजनिक आन्दोलन ही था, वरन् उसने भारतवासियों के जीवन में राजनैतिक विचारों और कार्यक्रम के क्रमिक विकास की ओर भी बड़ी प्रगति की थी। जैसे प्रजातन्त्र राज्य को मरहठों ने स्थापित करके लगभग एक सौ वर्ष तक उसका सुचारु रूप से प्रबन्ध किया वैसे प्रजातन्त्र राज्य का उदाहरण भारतवर्ष के वर्तमान इतिहास में एक भी

[ ५ ] नहीं पाया जाता । इस महाराष्ट्र-मण्डल के शासन प्रबन्ध में किसी व्यक्ति विशेष का लेशमात्र अधिकार न था । इस आन्दोलन में भाग लेने वाले व्यक्तियों का ध्येय एक ही था । उनके भीतर प्रजातन्त्र राज्य स्थापित करने के अतिरिक्त और कोई दूसरा भाव न था। महाराष्ट्र- मण्डल के प्रत्येक प्रधान कार्यकर्ता का कार्य, उत्तरदायित्व और अधिकार परिमित था । जिन मनुष्यों की शिक्षा-दीक्षा प्रजातन्त्र राज्य की छत्र- छाया में होती है वे एकतन्त्रात्मक राज्यशासन की अपेक्षा संयुक्तराज्य अमेरिका की शासनप्रणाली की ओर ही अधिक झुकते हैं। वर्त्तमान भारत के इतिहास में प्रजातन्त्रराज्य का दूसरा उदाहरण सिक्ख शासन-विधान में भी मिलता है। किन्तु यह प्रजातन्त्र बहुत छोटे परिमाण में था और इसकी शासनपद्धति भी नियमित नहीं थी, जिसके कारण यह उतने दिनों तक न ठहर सका जितने समय तक महाराष्ट्रमण्डल कार्य करता रहा; किन्तु यह राज्य भी देशभक्ति के उन्हीं उच्च आदर्शों और सिद्धान्तों से परिपूर्ण था, जिनसे कि महाराष्ट्रमण्डल । इसीलिये हम बड़े सम्मान पूर्वक इस बात का वर्णन करते हैं कि सिक्ख-राज्य, हिन्दू-प्रजातन्त्र राज्य का एक दूसरा उदाहरण है । मरहठा-आन्दोलन के राष्ट्रीय तथा पान-हिन्दवी सिद्धांत पर इस पुस्तक में इस लिए अधिक जोर दिया गया है क्यों कि यह आंदोलन जनता की भलाई और समस्त हिन्दुहित के भावों मे भरा हुआ था। परन्तु इससे यह ही न समझ लेना चाहिये कि इस आन्दोलन में भाग लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल सार्व-जनिक भावों और हिन्दू-हितों को ही ध्यान में रखकर कार्य करता था । ऐसा करना हमरी भारी भूल होगी । इस पवित्र धर्मयुद्ध के साथ-साथ मरहठों में गृह कलह भी वर्तमान थी । इसका कारण यह था कि मरहठे पहले हिन्दू थे और इसके पीछे मरहठा । इसी कारण हिन्दुओं के भीतर जो सद्गुण और दुर्गुण, शक्ति और निर्बलता तथा सामूहिक और व्यक्तिगत हित के भाव वर्तमान थे उनका कुछ-न-कुछ

[ ६ ] अंश उसमें वर्तमान होना स्वाभाविक ही था। मुसलमान अपने पहले आक्रमण में जिन धार्मिक भावों, सामाजिक संगठन और वीरतापूर्ण उत्साह के कारण विजयी हुए थे, वे गुण हिन्दुओं में बहुत ही कम विद्यमान थे। इस स्थान पर उस समय के—उदाहरणतया पृथ्वीराज और मुहम्मद गौरी के समय के—हिन्दू और मुसलमानों की त्रुटियों और शक्तियों में तुलना करना उचित नहीं जान पड़ता, किन्तु इस बात का प्रकट कर देना आवश्यक प्रतीत होता है कि उन कारणों को बतला दें, जिनसे मुसलमान विजयी होते रहे और अपनी राजनैतिक सत्ता, राज्य और धर्म को इतना अधिक बढ़ा सके। मुसलमान यह शिक्षा प्राप्त करके निकले थे कि इस्लाम धर्म से भिन्न सब धर्म नर्क में लेजाने वाले हैं, अन्य धर्मों का जड़ से सत्या- नाश करदेना पुण्य है, चाहे इसके करने में कितना ही अन्याय और निर्द- यतापूर्ण कार्य क्यों न करने पड़ें, उसमें कोई पाप नहीं है। इन भावों से प्रेरित होकर कार्य करते हुए वे अपने धर्म को विस्तृत करने में समर्थ हुए। इसके विरुद्ध हिंदू स्वभाव से ही शांतिप्रिय थे। "अहिंसा परमो धर्मः" का इन्हें उपदेश मिला था। अपने से विलग हुए भाइयों को, जिन्हें कि विधर्मियों ने जबर्दस्ती छीन लिया था, पुनः गले लगाना ये पाप समझने वाले थे। संग- ठन शक्ति से ये बिल्कुल विहीन थे; अतएव इनपर विजय पाना भी मुसल- मानों केलिये बहुत ही आसान हो गया। यदि हिंदुओं के भीतर धार्मिक प्रेम, संगठन और शुद्धि की प्रथा वर्तमान होती तो उन लोगों ने भी अपनी मातृभूमि और अपने धर्म के गौरव की रक्षा के लिये ऐसा उत्साह और शक्ति दिखलायी होती कि मुसलमान किसी भी प्रकार उनका सामना न कर सकते। मुसलमान जब भारतवर्ष में आये तब वे अनुभव करने लगे कि— उनके धर्म में जो 'ईश्वर एक है' का सिद्धांत है उसके कारण उनका धर्म फैल जायगा और उनमें एक अदम्य शक्ति आजायेगी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी अपना कर्तव्य समझा कि वे सारे संसार को अल्लाह के राज्य में

[ ७ ] आधीन लायें हिन्दुओं की शिक्षा-दीक्षा और व्यवहार इसके विरुद्ध था । व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और धार्मिक जीवन-निर्वाह इनका स्वभाव बन गया था। इनकी अवस्था अव्यवस्थित और निरीह बन गई थी। तत्त्वज्ञान के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन करने वाले साधारण भ्रमों में पड़कर 'किंकर्तव्यविमूढ' बन रहे थे। ये विदेशयात्रा को धर्मविरुद्ध समझ कर अपना राज्य-विस्तार करने में ही असमर्थ नहीं थे, वरन् सदा इन्हें विधर्मियों के आक्रमणों का लक्ष्य बनना पड़ता था। परमार्थ की प्रबल इच्छा ने इन्हें राजनैतिक और सामाजिक उन्नति से वंचित कर रक्खा था, विशाल साम्राज्य छोटे २ टुकड़ों में विभक्त हो गया था और एक ही हिंदू-सभ्यता के अन्दर होते हुए भी इनके पारस्परिक बन्धन-सूत्र ढीले पड़ गये थे। हिंदुत्व की वास्तविकता की ओर इनका ध्यान बहुत ही कम था। वर्ण, प्रान्त, सम्प्रदाय आदि विभिन्नताओं ने उन्हें शक्तिहीन बना रक्खा था। भारत के सारे हिन्दुओं को हिन्दू-धर्म के झंडे के नीचे लाने की कई बार बड़ी चेष्टायें और प्रयत्न किये गये; किन्तु कोई फल न निकला अतः वे उन धर्मांध, वीरता के लोलुप विदेशियों के सामने न ठहर सके और एक एक करके हारते गये। यदि विचार किया जाय तो व्यक्तिगत रूप में हिंदू, प्रत्येक उतना ही वीर, बलवान और धर्मपर शहीद होनेवाला था, जितना कि एक मुसलमान। किन्तु मुसलमान ईश्वर और धर्म के नाम पर संगठित, इनपर मरने के लिये सदैव प्रस्तुत, और पवित्र धर्मयुद्ध के नाम पर अन्य धर्मावलम्बियों पर आक्रमण कर अपना राज्य बढ़ाने में प्रयत्नशील थे। हिंदुओं में इन गुणों का सर्वथा अभाव था। किन्तु अब सैकड़ों वर्ष बीत गये, वे सब एक ही प्रकार के कष्टों से पीड़ित हुए, तब हिन्दुओं की आंखें खुलीं और उन्होंने सचेत होकर इस पाठ को सीखा और अनुभव करने लगे कि हम एक हैं, एक देश के लाल और एक भारतजननी के सुपुत्र । वे यह भी सोचने लगे कि पहले हम हिन्दू हैं, पीछे किसी विशेष प्रान्त या सम्प्रदाय के। अपनी असंगठित अवस्था का, जिसके कारण वे निर्बल

[ ८ ]

और शक्तिहीन बन रहे थे, अनुभव करके पश्चात्ताप करने लगे। संगठन का भाव जागृत हो उठा। वे व्यक्तिगत विचारों और कार्यों को घृणा की दृष्टि से देखने लगे। उनमें जातीय गौरव और अभिमान के ऊपर उत्सर्ग होने के विचार आने लगे। उन कारणों के समझने का प्रयत्न करने लगे जो मुसलमानों की सफलता के कारण थे। इस कार्य में वे सफल भी हुए। शीघ्र ही राजनैतिक स्वतन्त्रता और एक हिन्दू-साम्राज्य स्थापना के निमित्त पान-हिन्दू-आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया गया। उस समय के आन्दोलनों और हिन्दू-जगत् की राजनैतिक अवस्था पर दृष्टि डालने पर कोई भी व्यक्ति यह कहे बिना नहीं रह सकता कि केवल महाराष्ट्र के ही हिन्दू इस योग्य थे, जो इस आन्दोलन के अगुआ बनकर हिन्दू-धर्म की स्वतन्त्रता की लड़ाई में सफल हो सकते थे। स्वामी रामदासजी ने, सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करके महाराष्ट्र लौट आने पर मर्मभेदी, परन्तु आशापूर्ण शब्दों में कहा था--“सारे देश में कोई हिन्दू इतना शक्ति- शाली और उत्साही नहीं रहा जो इस हिन्दू-जाति और भारत- माता को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त करा सके। यदि कुछ आशा है तो केवल महाराष्ट्र निवासियों से।” स्वामी रामदासजी और उनके शिष्यगण इसी आधार और विश्वास से इस निर्णय पर पहुंचे कि पहले महाराष्ट्र की एक दृढ़ और सुसंगठित सत्ता बनाई जाये, फिर हिन्दू-राज्य हिन्दू-धर्म, हिन्दू-मन्दिरों और हिन्दू-सिंहासनों को विदेशियों के पंजों से मुक्त कराकर भिन्न २ प्रान्तों और सम्प्रदायों में बिखरे हुए हिंदुओं की संगठित शक्ति से एक ऐसे विशाल महाराष्ट्र-राज्य की नींव डाली जाय, जिस में सदा हिन्दू-धर्म और हिन्दू-जाति की रक्षा होती रहे। किन्तु मरहठे या अन्य हिंदुओं के भीतर से वे कारण, जिनसे जातीयता के भावों का पतन हुआ था, पूर्णतः दूर नहीं हो सके थे। अब भी सर्वसा- धारण में व्यक्तिगत स्वार्थों और आत्म-गौरव की लालसा किसी-न- किसी अंश में वर्तमान थी, जो कभी २ गृहकलह का कारण बन जाया