भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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[ ७ ] आधीन लायें हिन्दुओं की शिक्षा-दीक्षा और व्यवहार इसके विरुद्ध था । व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और धार्मिक जीवन-निर्वाह इनका स्वभाव बन गया था। इनकी अवस्था अव्यवस्थित और निरीह बन गई थी। तत्त्वज्ञान के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन करने वाले साधारण भ्रमों में पड़कर 'किंकर्तव्यविमूढ' बन रहे थे। ये विदेशयात्रा को धर्मविरुद्ध समझ कर अपना राज्य-विस्तार करने में ही असमर्थ नहीं थे, वरन् सदा इन्हें विधर्मियों के आक्रमणों का लक्ष्य बनना पड़ता था। परमार्थ की प्रबल इच्छा ने इन्हें राजनैतिक और सामाजिक उन्नति से वंचित कर रक्खा था, विशाल साम्राज्य छोटे २ टुकड़ों में विभक्त हो गया था और एक ही हिंदू-सभ्यता के अन्दर होते हुए भी इनके पारस्परिक बन्धन-सूत्र ढीले पड़ गये थे। हिंदुत्व की वास्तविकता की ओर इनका ध्यान बहुत ही कम था। वर्ण, प्रान्त, सम्प्रदाय आदि विभिन्नताओं ने उन्हें शक्तिहीन बना रक्खा था। भारत के सारे हिन्दुओं को हिन्दू-धर्म के झंडे के नीचे लाने की कई बार बड़ी चेष्टायें और प्रयत्न किये गये; किन्तु कोई फल न निकला अतः वे उन धर्मांध, वीरता के लोलुप विदेशियों के सामने न ठहर सके और एक एक करके हारते गये। यदि विचार किया जाय तो व्यक्तिगत रूप में हिंदू, प्रत्येक उतना ही वीर, बलवान और धर्मपर शहीद होनेवाला था, जितना कि एक मुसलमान। किन्तु मुसलमान ईश्वर और धर्म के नाम पर संगठित, इनपर मरने के लिये सदैव प्रस्तुत, और पवित्र धर्मयुद्ध के नाम पर अन्य धर्मावलम्बियों पर आक्रमण कर अपना राज्य बढ़ाने में प्रयत्नशील थे। हिंदुओं में इन गुणों का सर्वथा अभाव था। किन्तु अब सैकड़ों वर्ष बीत गये, वे सब एक ही प्रकार के कष्टों से पीड़ित हुए, तब हिन्दुओं की आंखें खुलीं और उन्होंने सचेत होकर इस पाठ को सीखा और अनुभव करने लगे कि हम एक हैं, एक देश के लाल और एक भारतजननी के सुपुत्र । वे यह भी सोचने लगे कि पहले हम हिन्दू हैं, पीछे किसी विशेष प्रान्त या सम्प्रदाय के। अपनी असंगठित अवस्था का, जिसके कारण वे निर्बल