हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ६ ] अंश उसमें वर्तमान होना स्वाभाविक ही था। मुसलमान अपने पहले आक्रमण में जिन धार्मिक भावों, सामाजिक संगठन और वीरतापूर्ण उत्साह के कारण विजयी हुए थे, वे गुण हिन्दुओं में बहुत ही कम विद्यमान थे। इस स्थान पर उस समय के—उदाहरणतया पृथ्वीराज और मुहम्मद गौरी के समय के—हिन्दू और मुसलमानों की त्रुटियों और शक्तियों में तुलना करना उचित नहीं जान पड़ता, किन्तु इस बात का प्रकट कर देना आवश्यक प्रतीत होता है कि उन कारणों को बतला दें, जिनसे मुसलमान विजयी होते रहे और अपनी राजनैतिक सत्ता, राज्य और धर्म को इतना अधिक बढ़ा सके। मुसलमान यह शिक्षा प्राप्त करके निकले थे कि इस्लाम धर्म से भिन्न सब धर्म नर्क में लेजाने वाले हैं, अन्य धर्मों का जड़ से सत्या- नाश करदेना पुण्य है, चाहे इसके करने में कितना ही अन्याय और निर्द- यतापूर्ण कार्य क्यों न करने पड़ें, उसमें कोई पाप नहीं है। इन भावों से प्रेरित होकर कार्य करते हुए वे अपने धर्म को विस्तृत करने में समर्थ हुए। इसके विरुद्ध हिंदू स्वभाव से ही शांतिप्रिय थे। "अहिंसा परमो धर्मः" का इन्हें उपदेश मिला था। अपने से विलग हुए भाइयों को, जिन्हें कि विधर्मियों ने जबर्दस्ती छीन लिया था, पुनः गले लगाना ये पाप समझने वाले थे। संग- ठन शक्ति से ये बिल्कुल विहीन थे; अतएव इनपर विजय पाना भी मुसल- मानों केलिये बहुत ही आसान हो गया। यदि हिंदुओं के भीतर धार्मिक प्रेम, संगठन और शुद्धि की प्रथा वर्तमान होती तो उन लोगों ने भी अपनी मातृभूमि और अपने धर्म के गौरव की रक्षा के लिये ऐसा उत्साह और शक्ति दिखलायी होती कि मुसलमान किसी भी प्रकार उनका सामना न कर सकते। मुसलमान जब भारतवर्ष में आये तब वे अनुभव करने लगे कि— उनके धर्म में जो 'ईश्वर एक है' का सिद्धांत है उसके कारण उनका धर्म फैल जायगा और उनमें एक अदम्य शक्ति आजायेगी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी अपना कर्तव्य समझा कि वे सारे संसार को अल्लाह के राज्य में