भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

[ ५ ] नहीं पाया जाता । इस महाराष्ट्र-मण्डल के शासन प्रबन्ध में किसी व्यक्ति विशेष का लेशमात्र अधिकार न था । इस आन्दोलन में भाग लेने वाले व्यक्तियों का ध्येय एक ही था । उनके भीतर प्रजातन्त्र राज्य स्थापित करने के अतिरिक्त और कोई दूसरा भाव न था। महाराष्ट्र- मण्डल के प्रत्येक प्रधान कार्यकर्ता का कार्य, उत्तरदायित्व और अधिकार परिमित था । जिन मनुष्यों की शिक्षा-दीक्षा प्रजातन्त्र राज्य की छत्र- छाया में होती है वे एकतन्त्रात्मक राज्यशासन की अपेक्षा संयुक्तराज्य अमेरिका की शासनप्रणाली की ओर ही अधिक झुकते हैं। वर्त्तमान भारत के इतिहास में प्रजातन्त्रराज्य का दूसरा उदाहरण सिक्ख शासन-विधान में भी मिलता है। किन्तु यह प्रजातन्त्र बहुत छोटे परिमाण में था और इसकी शासनपद्धति भी नियमित नहीं थी, जिसके कारण यह उतने दिनों तक न ठहर सका जितने समय तक महाराष्ट्रमण्डल कार्य करता रहा; किन्तु यह राज्य भी देशभक्ति के उन्हीं उच्च आदर्शों और सिद्धान्तों से परिपूर्ण था, जिनसे कि महाराष्ट्रमण्डल । इसीलिये हम बड़े सम्मान पूर्वक इस बात का वर्णन करते हैं कि सिक्ख-राज्य, हिन्दू-प्रजातन्त्र राज्य का एक दूसरा उदाहरण है । मरहठा-आन्दोलन के राष्ट्रीय तथा पान-हिन्दवी सिद्धांत पर इस पुस्तक में इस लिए अधिक जोर दिया गया है क्यों कि यह आंदोलन जनता की भलाई और समस्त हिन्दुहित के भावों मे भरा हुआ था। परन्तु इससे यह ही न समझ लेना चाहिये कि इस आन्दोलन में भाग लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल सार्व-जनिक भावों और हिन्दू-हितों को ही ध्यान में रखकर कार्य करता था । ऐसा करना हमरी भारी भूल होगी । इस पवित्र धर्मयुद्ध के साथ-साथ मरहठों में गृह कलह भी वर्तमान थी । इसका कारण यह था कि मरहठे पहले हिन्दू थे और इसके पीछे मरहठा । इसी कारण हिन्दुओं के भीतर जो सद्गुण और दुर्गुण, शक्ति और निर्बलता तथा सामूहिक और व्यक्तिगत हित के भाव वर्तमान थे उनका कुछ-न-कुछ