हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: [ ४ ] मनोरथों को सफल बना दिया। दूसरी परमावश्यक बात, जो हम अपनी इस पुस्तक द्वारा महा- राष्ट्र प्रांत से बाहर रहने वाले भारतवासियों के मन में बिठाना चाहते हैं, यह है कि इस कार्य की पूर्त्ति के लिये एक या दो मनुष्य, या एक पीढ़ी ही नहीं, वरन सारी मरहठा-जाति ही उद्यत हो गई थी। यद्यपि हिन्दू-जाति की इस परतन्त्रता की लड़ाई का प्रारम्भ महाराज शिवाजी और स्वामी रामदास जी के वंशजों ने किया था; किन्तु उनकी मृत्यु के पश्चात् यह आन्दोलन बन्द न हुआ, वरन उनकी आनेवाली सन्तानें उनके सिद्धान्तों का अनुसरण करती हुई इस आन्दोलन की सफलता के लिये प्राणपण से प्रयत्न करती चली गईं। ज्यों २ समय बीतता गया त्यों २ यह आन्दो- लन फैलता गया। बड़े २ वीरता के कार्य सम्पादन हुए और उनके द्वारा बड़ी २ सफलतायें भी प्राप्त हुईं। योग्य पुरुषों, स्त्रियों, राजनीतिज्ञों, शूरवीरों, राजाओ और राजाओं को राजा बनाये रखने वाले सूरमाओं और लेखकों ने सहस्रों और लाखों की संख्या में इस कार्यक्षेत्र में पदा- र्पण किया और उनका यह कार्य एक सौ वर्ष तक यथाक्रम उन्नति को प्राप्त होता गया। सारे लोग ज़रीपताका, हिंदु धर्म की पताका - सुनहले गेरुआ वस्त्र के झंडे के नीचे कार्य करते रहे। इसके साथ ही-साथ जब हमारा ध्यान मरहठों के अद्भुत राज- नैतिक ज्ञान और शासन-चातुरी की ओर जाता है और हम यह देखते हैं कि मरहठे अपने राज्यों को मिला कर महाराष्ट्र-मण्डल के रूप में परि- णत कर देते हैं तो हम इस निश्चय पर पहुंचते हैं कि मरहठा-आन्दो- लन न केवल सार्वजनिक आन्दोलन ही था, वरन् उसने भारतवासियों के जीवन में राजनैतिक विचारों और कार्यक्रम के क्रमिक विकास की ओर भी बड़ी प्रगति की थी। जैसे प्रजातन्त्र राज्य को मरहठों ने स्थापित करके लगभग एक सौ वर्ष तक उसका सुचारु रूप से प्रबन्ध किया वैसे प्रजातन्त्र राज्य का उदाहरण भारतवर्ष के वर्तमान इतिहास में एक भी