भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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कर अपने कार्यों से ही अपने उद्देश्यों को जनता के सामने रखते थे, कारण यह था कि वे हिन्दू-जाति के अङ्गों को पुष्ट करने में इतने व्यस्त थे कि उन्हें कुछ कहने का अवकाश ही नहीं मिलता था; तो भी जो कुछ इन्होंने कहा है उसका प्रभाव उतना ही पड़ा है जितना कि उनके कार्यों का। उनके इन कथनों और कार्यों के द्वारा हमने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि उस वीर-महाकाव्य का मुख्य विषय, उस प्रबल संगीत की टेक तथा वह ध्येय जिसने सारे आन्दोलन में जीवन का संचार किया तथा जनता को प्रोत्साहित किये रखा—यह था कि हिन्दूधर्म को विदेशी गैर- हिन्दुओं के शासन की धार्मिक तथा राजनैतिक जंजीरों से मुक्त कराया जाय तथा एक विशाल शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया जाय जो भारतीय सभ्यता और धर्म की रक्षा करने के योग्य हो, जिस में धर्मोन्मत्त विदेशी अपनी हठधर्मी के कारण भारत का सत्यानाश न कर डालें। इस उद्देश्य से न केवल शिवाजी और रामदासजी ही प्रभावित हुए थे वरन् उनके पीछे होने वाले लोगों ने इसी उद्देश्य को दृष्टि में रख कर कार्य किया और एक विशाल साम्राज्य की स्थापना करने में वे सफल भी हुए। सर्वप्रथम शाह जी ने "स्वधर्म राज्य" का स्वप्न लिया। फिर उसके सुपुत्र शिवाजी ने अपने साथियों को अपना परम ध्येय "हिन्दवी स्वराज्य' बताया, तत्पश्चात् बाजीराव ने हिन्दू-पद-पादशाही की स्थापना का दृढ़ निश्चय प्रकट किया; अंत में बुद्धिमान् राजदूत गोविन्दराव काले न १७८५ मे विजय ध्वनि में कहा—'भारत हिन्दुओं का देश है (हें हिंदुस्थान आहे) यह तुर्कों का नहीं है (तुर्कस्थान नव्हे)। देव और धर्म तथा सच्चाई और ईश्वर की सेवा के लिए समर्पित हिन्दू-साम्राज्य की स्थापना की इस श्रेष्ठ धारणा और सजीव उद्देश्य ने इस आंदोलन में अंतिम समय तक स्फूर्ति का संचार किये रखा। स्वतन्त्रता के मौलिक सिद्धांत, स्वराज्य तथा स्वधर्म के पर फैलाये एक शताब्दी तक भारतरूपी अंडे को सेंते रहे और उसमे से शक्तिशाली जाति का जन्म हुआ जिसने इसके