हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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और शक्तिहीन बन रहे थे, अनुभव करके पश्चात्ताप करने लगे। संगठन का भाव जागृत हो उठा। वे व्यक्तिगत विचारों और कार्यों को घृणा की दृष्टि से देखने लगे। उनमें जातीय गौरव और अभिमान के ऊपर उत्सर्ग होने के विचार आने लगे। उन कारणों के समझने का प्रयत्न करने लगे जो मुसलमानों की सफलता के कारण थे। इस कार्य में वे सफल भी हुए। शीघ्र ही राजनैतिक स्वतन्त्रता और एक हिन्दू-साम्राज्य स्थापना के निमित्त पान-हिन्दू-आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया गया। उस समय के आन्दोलनों और हिन्दू-जगत् की राजनैतिक अवस्था पर दृष्टि डालने पर कोई भी व्यक्ति यह कहे बिना नहीं रह सकता कि केवल महाराष्ट्र के ही हिन्दू इस योग्य थे, जो इस आन्दोलन के अगुआ बनकर हिन्दू-धर्म की स्वतन्त्रता की लड़ाई में सफल हो सकते थे। स्वामी रामदासजी ने, सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करके महाराष्ट्र लौट आने पर मर्मभेदी, परन्तु आशापूर्ण शब्दों में कहा था--“सारे देश में कोई हिन्दू इतना शक्ति- शाली और उत्साही नहीं रहा जो इस हिन्दू-जाति और भारत- माता को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त करा सके। यदि कुछ आशा है तो केवल महाराष्ट्र निवासियों से।” स्वामी रामदासजी और उनके शिष्यगण इसी आधार और विश्वास से इस निर्णय पर पहुंचे कि पहले महाराष्ट्र की एक दृढ़ और सुसंगठित सत्ता बनाई जाये, फिर हिन्दू-राज्य हिन्दू-धर्म, हिन्दू-मन्दिरों और हिन्दू-सिंहासनों को विदेशियों के पंजों से मुक्त कराकर भिन्न २ प्रान्तों और सम्प्रदायों में बिखरे हुए हिंदुओं की संगठित शक्ति से एक ऐसे विशाल महाराष्ट्र-राज्य की नींव डाली जाय, जिस में सदा हिन्दू-धर्म और हिन्दू-जाति की रक्षा होती रहे। किन्तु मरहठे या अन्य हिंदुओं के भीतर से वे कारण, जिनसे जातीयता के भावों का पतन हुआ था, पूर्णतः दूर नहीं हो सके थे। अब भी सर्वसा- धारण में व्यक्तिगत स्वार्थों और आत्म-गौरव की लालसा किसी-न- किसी अंश में वर्तमान थी, जो कभी २ गृहकलह का कारण बन जाया