भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 195

[ १६७ ]

ने स्वयं अपने मन्त्री को लिये सेना के साथ प्रस्थान किया। यह पहला अवसर था जब कि नवयुवक पेशवा ने स्वयं युद्ध में भाग लिया था। यह देखकर मरहठे-सिपाही, शूरता और वीरता से भर उठे और इस आक्रमण को बहुत आवश्यक समझने लगे। निज़ाम पहले से ही रणक्षेत्र में डटा था। निज़ाम के साथ एक लाख दस हज़ार घुड़सवार और पैदल सेना और बहुत बड़ा तोपखाना था। उसे विश्वास था कि वह विजयी होगा। मरहठों की बहुत-सी सेनायें सीमान्त प्रदेश की रक्षा के लिये पीछे रह गई थीं तथापि एक लाख तीस हज़ार सेना इकट्ठी हो गई। यह दोनों सेनायें महाराष्ट्र के सीमान्त पर पारंदा स्थान पर मिलीं। नाना ने परशु- राम भाऊ पटवर्धन को सारी सेना का सेनापति नियुक्त किया। ज्यों ही दोनों सेनायें इतनी दूरी पर आ गईं कि गोली एक दूसरे तक पहुँच सके, लड़ाई प्रारम्भ हो गई। पठानों ने कई बार मरहठों की सेना को पीछे हटने के लिये विवश किया। चूंकि इस पराजित सेना में परशुराम भाऊ भी सम्मिलित था इसलिए मुग़लों और पठानों की प्रसन्नता का पारावार न रहा और उन्होंने इस सफलता पर अपने खेमे में एक दरबार किया। किन्तु जब मरहठों की मुख्य सेना पहुँची तब निज़ाम को अपनी भूल मालूम हुई। अहमदअली खां ने ५० हज़ार चुनी सेना लेकर मरहठों की सेना का सामना करके बड़ी वीरता से वार करना आरम्भ कर दिया। भोंसले की सेना ने उनका मुकाबला किया और उनकी सेना पर गोलाबारी शुरू कर दी। शीघ्र ही सींधिया के तोप- खाने ने एक दूसरी तरफ़ से गोलाबारी करना आरम्भ कर दिया। लड़ाई ने बड़ा भयंकर रूप धारण कर लिया। मुसलमान अल्लाहोअकबर की ध्वनि से आकाश को गुंजाने लगे, किन्तु फिर भी वे अपने स्थान पर डटे न रह सके। वे पीठ दिखाकर भाग गये और उनकी सेना की बहुत बुरी पराजय हुई। निज़ाम भी बहुत डर गया और लड़ाई के मैदान से भाग गया और रात्रि हो जाने के कारण मरहठों के हाथ न आया। छोटी २ लड़ाइयां सारी रात होती रहीं। घबराहट के कारण मुसलमानी सेना