भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 254 में से

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पृष्ठ 196

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तहस-नहस हुई। मौलवी लोगों द्वारा धर्म के नाम उत्साहित किये जाने पर भी मुग़ल घबराहट में पड़ कर अपने ही खेमे लूटने लगे और शीघ्र ही सिर पर पांव रख कर भाग निकले। मरहठे खेमों के रखवाले तम्बूमें थे। जो कुछ लेकर वे आगे जाते थे ये सब ले लिया करते थे। प्रातः काल निज़ाम की सेना पहिली जगह छोड़ कर खारदा गांव के दुर्ग के पीछे जाकर खड़ी हुई। उस समय उसकी सेना में केवल दस हज़ार सिपाही रह गये थे। मरहठे पार्श्ववर्ती पहाड़ों पर से उन पर गोलाबारी करने लगे। दो-तीन दिन तक मुग़ल उसको सह सके। तीसरे दिन उसकी दाढ़ी ही नहीं अपितु उसका धार्मिक साहस भी सच्चे अर्थों में झुलसा गया। तीसरे दिन प्यास से सूखे गले, धुएं से गला घुंटे हुए, शत्रुओं ने लड़ाई को बन्द करने की प्रार्थना की। मरहठों ने कहा कि पहले मिश- रलमुलक को हमारे हवाले करो तब कोई दूसरी बात होगी। लम्पटता- पूर्वक उसने मरहठे-राजदूत का, नहीं २ महाराष्ट्र के मन्त्री का, जो अप- मान किया है, उसको अपनी उस बड़ी भूल का अवश्य बदला देना पड़ेगा। उन्होंने निराश होकर अपने राजमन्त्री को मरहठों के हवाले किया और यह इच्छा प्रकट की कि आप जिस शर्त पर कहें हम लोग सुलह करने को तैयार हैं। पारंदा और ताप्ती के बीच का सारा देश और तीन करोड़ रुपये चौथ का बकाया मरहठों को मिले। इसके अतिरिक्त भोंसला ने १६ लाख रुपया लड़ाई का हरजाना अलग लिया। इन शर्तों पर मरहठों ने निज़ाम की सेनाको जो कि मरहठों की राजधानी पूना को जलाने, लूटने और पेशवा को काशी भेज कर भीख मंगाने आई थी लौट जाने दिया। मिशरलमुलक को मरहठों की विजयी काफ़िरों की सेना के बीच क़ैदी बना कर घुमाया गया। जब वह क़ैदी की दशा में मरहठों के खेमे-खेमे घुमाया जाता था तो काफ़िर उसे देख कर हर-हर महादेव की ध्वनि से आकाश गुंजाते थे। उन्होंने उस आदमी को पकड़ा था, जो नाना के पकड़ने की डींग मारा करता था। मरहठों ने अपने राजदूत

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