हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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और गौ-ब्राह्मण की सेवा करना भी हमारा मुख्य कर्तव्य है; और इन सब उद्देश्यों की पूर्ति की कुञ्जी आप और महादजी के हाथों में है। आप लोगों के बीच का ज़रा-सा भी मनो-मालिन्य शत्रुओं की शक्ति को प्रबल बना देगा। किन्तु अब आप लोगों के आपस में मेल हो जाने के समाचार ने हम लोगों की सारा शंकाओं का अन्त कर दिया। अब अपनी सेनाओं को हम लाहौर में पड़ो रहने दें और सीमान्त की ओर बढ़ने के लिये तैयार हों। हमारे शत्रुओं को यह आशा थी कि हम लोग आपस में लड़कर नष्ट हो जायेंगे; अब उनकी इन आशाओं पर पानी फिर गया। मुझे इसकी बड़ी चिन्ता थी; आज वे सारी चिन्तायें मिट गईं। अच्छा हुआ; बहुत ही अच्छा हुआ, अब मुझे शान्ति प्राप्त हुई है।" सच्चे उत्साही कार्यकर्त्ता द्वारा लिखा हुआ उपरोक्त पत्र, कई दर्जन नीरस इतिहासों की अपेक्षा, मरहठों की आत्मा, स्वभाव और उत्साह का कहीं ठीक चित्र खींच देता है। पर इन महान शंकाओं और आशाओं के संघर्ष के बीच ही महादजी को ज्वर हो गया और पूना के समीप वानावादी में १२ फ़रवरी सन १७६४ ई० को इस संसार से चल बसे। इस से समस्त राष्ट्र शोकसागर में डूब गया। शक्तिशाली सरदार और सेनापति महादजी की मृत्यु को देख कर महाराष्ट्र के शत्रुओं में नवीन जीवन का संचार हो गया, और वे महाराष्ट्र- मंडल को नष्ट करने के लिये प्राण-पण से प्रयत्न करने लगे। इन शत्रुओं में अग्रगण्य निज़ाम हैदराबाद थे जिनको मरहठों ने बिल्कुल निर्बल करके अच्छी प्रकार अपने हाथों में कर लिया था। अब वह मरहठों से बदला लेने का सुअवसर समझ कर उत्तेजित हो उठा। इस समय उसने अपनी सेना पहले की अपेक्षा बारहगुनी कर ली थी; और उसे एक फ्रांसीसी सेनापति की अध्यक्षता में रक्खा था। निज़ाम का मन्त्री मुशरूलमुल्क एक कट्टर मुसलमान था। महादजी ने, जो बादशाही अधिकार मुगल सम्राट से अपने पेशवा के लिये प्राप्त किया था, वह