भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 254 में से

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ऐसे सुरक्षित हो जाएँगे कि उनके पास फटकना भी दुस्तर हो जायगा। अतः द्वेष-भाव से प्रेरित हो, मरहठों को नीचा दिखाने की इच्छा से, अङ्गरेज़ों ने पुराने मुग़ल बादशाह को अपना बादशाह साबित करने की कोशिश की और इस बात को सर्व साधारण पर विदित कराने के लिये उत्तरी सरकार को (जिसे अपने बाहुबल द्वारा उन्होंने बहुत पहले से जीत लिया था) अपने पास रखने के लिये शाहआलम से आज्ञा मांगी। किन्तु मरहठे भी अपने प्रतिद्वन्द्वियों से पीछे रहने वाले न थे। अतएव सम्राट् के नाम की आड़ लेकर वे सब प्रकार से राज्य-संचालन करते रहे और यही कारण महादजी सींधिया के महाराष्ट्र-मण्डल के मुखिया के लिये "महाराजाधिराज" और "वकीले मुत'लिक़" की पदवियों को मुग़ल सम्राट् से प्राप्त करने का था। अब बहुत दिनों के बाद एक अत्यन्त आदर्श जीवन व्यतीत करने के पश्चात् वह अपने छोटे सरदार को नवयुवक भगवान् के रूप में देखने के लिये लालायित होकर आया था; इसलिये प्राप्त किये हुये पदों से उसे विभूषित करने के लिये महा- दजी ने एक महान् उत्सव की आयोजना की। जिस समय महाराष्ट्र-सेनापति महादजी की यह इच्छा हुई कि पेशवा को, जो पहले से ही राजाधिराज हैं, महाराज के पद से विभूषित करें, उसी समय नाना ने एक दल तैयार किया, जो इस पर यह कहकर आपत्ति करने लगा कि इससे महाराज-सितारा का अपमान होगा। ऐसे बहुत से उदाहरण मिल सकते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि एक राज्य के निवासियों या रक्षित राज्यों के पदाधिकारियों ने दूसरे राजाओं के दिये पदों को स्वीकार किया है और उससे उनके राज्य की कोई भी हानि नहीं हुई है। यही नहीं, कितने तो ऐसे भी उदाहरण हैं कि दूसरे राज्य वालों के दिये पदों को लोगों ने यह सोच कर स्वीकार कर लिया है कि उनके राज्य की उन्नति होगी। इन बातों के यथार्थ होते हुये भी, इस विचार से कि जातीय आन्दोलन में किसी प्रकार का भेदभाव न उपस्थित हो, महादजी ने महाराज-सितारा से प्रार्थना की; जिसके उत्तर में छत्रपति