हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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व्यक्तियों में पारस्परिक द्वेष बढ़ रहा है। पर ये दोनों देशभक्त "हिन्दू- प्रजातन्त्र" स्थापित करने की लालसा और भक्ति के कारण ही अपने भावों को रोके और दबाये हुये थे, और इस प्रजातन्त्र की स्थापना, रक्षा और इसको प्रभावशाली बनाने में, इन दोनों से बढ़कर शायद ही किसी व्यक्ति ने अधिक परिश्रम किया हो पर, क्या वह द्वेषाग्नि, जो आज तक छिपी थी, भड़क कर गृह-कलह पैदा कर देगी ? अगर ऐसा हुआ तो हिन्दू-राज्य के लिये इससे बढ़ कर दुःख की बात और क्या हो सकती है ? सारा महाराष्ट्र इस ख्याल से काँप उठता था; और सब लोग बड़ी चिन्तापूर्वक अपने दोनों बहादुरों और राजनीति-विशेषज्ञों की ओर देख रहे थे । हम पहले ही लिख चुके हैं कि बूढ़ा मुग़ल बादशाह, जो अब भी मरहठों की कृपा से बादशाह की उपाधि का उपभोग कर रहा था, 'वकीले मुतलिक' और 'महाराजाधिराज' का पद महादजी को देना चाहता था; किन्तु इसने अपने लिये अस्वीकार कर उसे अपने स्वामी बालक पेशवा के लिये प्राप्त किया । यह कार्य केवल दिखलाने मात्र को न था । यद्यपि एक बेबस और अयोग्य व्यक्ति के लिये उन पदों का मूल्य उतना भी न था, जितना कि उस काग़ज का मूल्य था जिस पर वह उपाधि लिखी हुई थी, तो भी यह शब्द निरर्थक ही न रहे। उनका पदाधिकारी मुग़ल बादशाह के नाम पर सम्पूर्ण मुग़ल साम्राज्य पर राज्य करने का अधिकारी हो गया और मुग़ल बादशाह ने अपने बादशाही अधिकारों से त्याग-पत्र दे दिया । मरहठों, अङ्गरेज़ों और दूसरे विधर्मियों के बीच बादशाही ताज के लिये मुक़ाबिला था, इसलिये यही उचित समझा गया कि ताज और पद बूढ़े मुग़ल बादशाह के पास पहले ही की भांति बने रहें। इस प्रकार मुग़ल सम्राट् को सारे अधिकारों से वंचित कर दिया गया । लेकिन अङ्गरेज़ और दूसरी मुसलिम शक्तियां भी यह भली-भाँति जानती थीं कि ये पद अगर एक बार भी मरहठों के हाथ में चले गये तो