भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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की लड़ाई के बाद जब टीपू ने अपने को सर्वथा मरहठों और अङ्गरेजों के हाथ में समझ कर सुलह की प्रार्थना की तो परशुराम भाऊ और हरिपन्त फाडके के कारण अङ्गरेजों को विवश होकर सन्धि करनी पड़ी। इस सन्धि के अनुसार टीपू ने मरहठों को अपना आधा राज्य तथा लड़ाई का हर्जाना तीन करोड़ रुपये दिये और प्रतिज्ञा की कि वह भविष्य में ट्रावनकोर के राजा को न सतायेगा। उसके दोनों लड़कों को मरहठे और अङ्गरेजों ने अपने पास जमानत के रूप में रक्खा। जो कुछ टीपू से मिला उसे दोनों ने निज़ाम के साथ बराबर २ तीन भागों में विभाजित कर लिया। मरहठों को एक करोड़ रुपये क्षतिपूर्ति और नब्बे लाख सालाना आय की ज़मीन मिली। इस प्रकार टीपू के साथ तीसरी लड़ाई का अन्त हुआ और मरहठी सेना सन् १७९२ ई० में बड़ा प्रतिष्ठा और नाम के बाद पूना पहुँची। महाराष्ट्र राज्य के उत्तरी विभाग की सेना का सेनापति भी उसी समय पठान और रहेलों के साथ नाम प्राप्त करके राजधानी की ओर लौटा। फाडके और रास्ते, तथा महादजी की सेनायें भी, जिन्होंने क्रमशः दक्षिण भारत में हिन्दुत्व की टीपू के क्रोध से रक्षा की और अङ्गरेजों तथा फ्रांसीसियों के परोक्ष में मुग़ल बादशाह को हिन्दू- साम्राज्य का पेन्शनर-मात्र बना छोड़ा था, पूने में आ मिलीं। इन महान् पुरुषों के पूना में संगम ने भारत तथा भारत से बाहर के दरबारों को भयभीत कर दिया; उन्हें अपना भाग्य भविष्य में शंकित दिखाई पड़ी। इस बड़े संगम का क्या अर्थ हो सकता था ? इसके पश्चात् महा- राष्ट्र-मण्डल कौन कार्य अपने हाथ में लेगा तथा अब इसका शिकार कौन होगा। —इत्यादि बातों को जानने के लिये सब लोगों की दृष्टि पूना की ओर लग रही थी क्योंकि पूना के अन्तर्गत हो जाने के कारण अब दिल्ली की कोई गणना ही न होती थी। लेकिन मरहठे अपने ही तईं झूठी बातों के भ्रम में पड़कर परेशान होने लगे। नाना और महादजी अब एक दूसरे के विरुद्ध हो गये थे। सब लोग जानते थे कि इन दोनों