हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १८४ ] मिश्रीकोट के ले लेने पर मरहठे बड़ी तेज़ी से आगे बढ़े। टीपू का हाल ही का जीता हुआ धारवाड़ घेर लिया गया। मुसलमान सेनापति ने बड़ी वीरतापूर्वक वहाँ मुक़ाबला किया। मरहठों की सलाह न मान कर अङ्गरेज़ों ने चाहा कि छापा मार कर क़िले को ले लें, पर बुरी तरह असफल रहे। बड़ी वीरतापूर्वक कुछ दिनों तक युद्ध होता रहा। अन्त में बार २ आक्रमण करके मरहठों ने उसे ले लिया। पानसे, रास्ते और दूसरे सेनापतियों ने तुंगभद्र नदी पार करके सान्ती, बदनूर, पेनगिरी इत्यादि स्थानों को शत्रु से जीत कर अधिकार में कर लिया। उधर मरहठों की जल-सेना भी बेकार न बैठी थी। इसने समुद्र तट की रक्षा करने के साथ ही साथ करवार तथा हसार इत्यादि स्थानों से मुसलमान सेनापतियों को निकाल बाहर किया। नरसिंह राव देवजी, गणपतिराव महेन्डेल तथा अन्य सेनापतियों ने चन्दावर, गिरिसप्पा, धारेश्वर और उद्गिनी आदि स्थानों को ले लिया और इसके बाद मरहठी फ़ौज श्रीरंगापट्टम की ओर बढ़ी जहां दूसरी ओर से लार्ड कार्नवालिस की अध्यक्षता में इंगलिश सेना भी आ रही थी, जो टीपू की चालबाजियों से व्याकुल हो गई थी। घबराहट और भूख-प्यास के मारे उसका बुरा हाल था और अश्वारोही सेना पैदल हो रही थी, क्योंकि जहां आदमियों का यह हाल था वहां घोड़े को कौन पूछता? चारे बिना घोड़े मर गये थे। भूखों मरती हुई अङ्गरेज़ी सेना के सुख का पारावार न रहा जब उसने सम्पूर्ण सामानों से लैस तथा सुसज्जित महाराष्ट्र-सेना को आते देखा। हरिपन्त फाडके ने मित्रों को सब आवश्यक वस्तुएँ देकर निश्चिन्त किया और यह संयुक्त सेना दस दिन तक वहाँ ठहरी रही। मरहठे इस समय चाहते तो टीपू के राज्य का नाम-निशान भी शेष न रह पाता, पर नाना के विचार के अनुसार उसका सर्वनाश करना उचित न था। वह चाहता था कि टीपू कुछ दिन और इसी प्रकार मद्रास में अङ्गरेज़ों की इच्छा-पूर्ति के मध्य कण्टक-स्वरूप बना रहे। इसी लिये घमसान