हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १८३ ] सताने वाले को भी उसी दशा में देखने या सुनने की थी। यहां उसे मृत्युदंड मिला। इस प्रकार पानीपत के युद्ध-समय में मरहठों का नाश करने की प्रतिज्ञा करने वाले नजीब के परिवार का स्वयं मरहठों के हाथों ऐसा नाश हुआ कि उसके वंश या राज्य का निशान भी अवशेष न रहा। सन् १७८६ ई० में दूसरे मरहठे-सेनापतियों के साथ महादजी ने अपने शत्रुओं पर विजय पाने में सफलता प्राप्त की और मुसलमानों तथा उनके सहायक राजपूतों को हरा कर उनका नाश कर दिया और ऐसी वीरतापूर्वक अङ्गरेज़ों का सामना किया कि वे उसकी बहादुरी का लोहा मानकर दबने लगे। बूढ़ा मुग़ल बादशाह फिर इसके हाथ में आ गया और जब उसने महादजी को 'वकील-ए-मुतलिक' का पद देना चाहा तो उसने एक बार फिर इस पद को अपने स्वामी पेशवा के लिए प्राप्त किया। जिन दिनों मरहठी सेनायें इस प्रकार उत्तर में फँस रही थीं, टीपू के हृदय में फिर गुदगुदी पैदा हुई और उसने एक बार फिर अपनी शक्ति की परीक्षा करने का विचार किया। सन् १७८६ ई० में ही उसने धम- काना शुरू किया, पर वह सीधे मरहठों पर हमला करना नहीं चाहता था। वह किसी प्रकार अपना राज्य बढ़ाना चाहता था। उसने सोचा कि अगर मरहठों के कारण मैं अपना राज्य कृष्णा नदी की ओर नहीं बढ़ा सकता तो अपने पड़ोसी ट्रावनकोर के दुर्बल हिन्दू-राज्य पर आक्रमण कर उसी पर क्यों न अधिकार कर लूँ ? इस लिये नाना ने निज़ाम और अङ्गरेज़ों को साथ मिला कर टीपू से युद्ध ठान लिया और पटवर्धन ने भी टीपू के राज्य पर आक्रमण कर दिया। ध्यान देने की बात है कि मरहठों के पहुँचने पर उस प्रान्त के निवासियों ने अन्यायी टीपू के विपक्ष में उनकी सहायता की, यहां तक कि उन लोगों ने टीपू के सरदारों को वहां से निकाल बाहर किया और मरहठों के बाकी पड़े करों को वसूल करने में सहायता करने लगे। हुबली, घोड़वाड़ और