हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
[ १८३ ] सताने वाले को भी उसी दशा में देखने या सुनने की थी। यहां उसे मृत्युदंड मिला। इस प्रकार पानीपत के युद्ध-समय में मरहठों का नाश करने की प्रतिज्ञा करने वाले नजीब के परिवार का स्वयं मरहठों के हाथों ऐसा नाश हुआ कि उसके वंश या राज्य का निशान भी अवशेष न रहा। सन् १७८६ ई० में दूसरे मरहठे-सेनापतियों के साथ महादजी ने अपने शत्रुओं पर विजय पाने में सफलता प्राप्त की और मुसलमानों तथा उनके सहायक राजपूतों को हरा कर उनका नाश कर दिया और ऐसी वीरतापूर्वक अङ्गरेज़ों का सामना किया कि वे उसकी बहादुरी का लोहा मानकर दबने लगे। बूढ़ा मुग़ल बादशाह फिर इसके हाथ में आ गया और जब उसने महादजी को 'वकील-ए-मुतलिक' का पद देना चाहा तो उसने एक बार फिर इस पद को अपने स्वामी पेशवा के लिए प्राप्त किया। जिन दिनों मरहठी सेनायें इस प्रकार उत्तर में फँस रही थीं, टीपू के हृदय में फिर गुदगुदी पैदा हुई और उसने एक बार फिर अपनी शक्ति की परीक्षा करने का विचार किया। सन् १७८६ ई० में ही उसने धम- काना शुरू किया, पर वह सीधे मरहठों पर हमला करना नहीं चाहता था। वह किसी प्रकार अपना राज्य बढ़ाना चाहता था। उसने सोचा कि अगर मरहठों के कारण मैं अपना राज्य कृष्णा नदी की ओर नहीं बढ़ा सकता तो अपने पड़ोसी ट्रावनकोर के दुर्बल हिन्दू-राज्य पर आक्रमण कर उसी पर क्यों न अधिकार कर लूँ ? इस लिये नाना ने निज़ाम और अङ्गरेज़ों को साथ मिला कर टीपू से युद्ध ठान लिया और पटवर्धन ने भी टीपू के राज्य पर आक्रमण कर दिया। ध्यान देने की बात है कि मरहठों के पहुँचने पर उस प्रान्त के निवासियों ने अन्यायी टीपू के विपक्ष में उनकी सहायता की, यहां तक कि उन लोगों ने टीपू के सरदारों को वहां से निकाल बाहर किया और मरहठों के बाकी पड़े करों को वसूल करने में सहायता करने लगे। हुबली, घोड़वाड़ और
[ १८४ ] मिश्रीकोट के ले लेने पर मरहठे बड़ी तेज़ी से आगे बढ़े। टीपू का हाल ही का जीता हुआ धारवाड़ घेर लिया गया। मुसलमान सेनापति ने बड़ी वीरतापूर्वक वहाँ मुक़ाबला किया। मरहठों की सलाह न मान कर अङ्गरेज़ों ने चाहा कि छापा मार कर क़िले को ले लें, पर बुरी तरह असफल रहे। बड़ी वीरतापूर्वक कुछ दिनों तक युद्ध होता रहा। अन्त में बार २ आक्रमण करके मरहठों ने उसे ले लिया। पानसे, रास्ते और दूसरे सेनापतियों ने तुंगभद्र नदी पार करके सान्ती, बदनूर, पेनगिरी इत्यादि स्थानों को शत्रु से जीत कर अधिकार में कर लिया। उधर मरहठों की जल-सेना भी बेकार न बैठी थी। इसने समुद्र तट की रक्षा करने के साथ ही साथ करवार तथा हसार इत्यादि स्थानों से मुसलमान सेनापतियों को निकाल बाहर किया। नरसिंह राव देवजी, गणपतिराव महेन्डेल तथा अन्य सेनापतियों ने चन्दावर, गिरिसप्पा, धारेश्वर और उद्गिनी आदि स्थानों को ले लिया और इसके बाद मरहठी फ़ौज श्रीरंगापट्टम की ओर बढ़ी जहां दूसरी ओर से लार्ड कार्नवालिस की अध्यक्षता में इंगलिश सेना भी आ रही थी, जो टीपू की चालबाजियों से व्याकुल हो गई थी। घबराहट और भूख-प्यास के मारे उसका बुरा हाल था और अश्वारोही सेना पैदल हो रही थी, क्योंकि जहां आदमियों का यह हाल था वहां घोड़े को कौन पूछता? चारे बिना घोड़े मर गये थे। भूखों मरती हुई अङ्गरेज़ी सेना के सुख का पारावार न रहा जब उसने सम्पूर्ण सामानों से लैस तथा सुसज्जित महाराष्ट्र-सेना को आते देखा। हरिपन्त फाडके ने मित्रों को सब आवश्यक वस्तुएँ देकर निश्चिन्त किया और यह संयुक्त सेना दस दिन तक वहाँ ठहरी रही। मरहठे इस समय चाहते तो टीपू के राज्य का नाम-निशान भी शेष न रह पाता, पर नाना के विचार के अनुसार उसका सर्वनाश करना उचित न था। वह चाहता था कि टीपू कुछ दिन और इसी प्रकार मद्रास में अङ्गरेज़ों की इच्छा-पूर्ति के मध्य कण्टक-स्वरूप बना रहे। इसी लिये घमसान
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की लड़ाई के बाद जब टीपू ने अपने को सर्वथा मरहठों और अङ्गरेजों के हाथ में समझ कर सुलह की प्रार्थना की तो परशुराम भाऊ और हरिपन्त फाडके के कारण अङ्गरेजों को विवश होकर सन्धि करनी पड़ी। इस सन्धि के अनुसार टीपू ने मरहठों को अपना आधा राज्य तथा लड़ाई का हर्जाना तीन करोड़ रुपये दिये और प्रतिज्ञा की कि वह भविष्य में ट्रावनकोर के राजा को न सतायेगा। उसके दोनों लड़कों को मरहठे और अङ्गरेजों ने अपने पास जमानत के रूप में रक्खा। जो कुछ टीपू से मिला उसे दोनों ने निज़ाम के साथ बराबर २ तीन भागों में विभाजित कर लिया। मरहठों को एक करोड़ रुपये क्षतिपूर्ति और नब्बे लाख सालाना आय की ज़मीन मिली। इस प्रकार टीपू के साथ तीसरी लड़ाई का अन्त हुआ और मरहठी सेना सन् १७९२ ई० में बड़ा प्रतिष्ठा और नाम के बाद पूना पहुँची। महाराष्ट्र राज्य के उत्तरी विभाग की सेना का सेनापति भी उसी समय पठान और रहेलों के साथ नाम प्राप्त करके राजधानी की ओर लौटा। फाडके और रास्ते, तथा महादजी की सेनायें भी, जिन्होंने क्रमशः दक्षिण भारत में हिन्दुत्व की टीपू के क्रोध से रक्षा की और अङ्गरेजों तथा फ्रांसीसियों के परोक्ष में मुग़ल बादशाह को हिन्दू- साम्राज्य का पेन्शनर-मात्र बना छोड़ा था, पूने में आ मिलीं। इन महान् पुरुषों के पूना में संगम ने भारत तथा भारत से बाहर के दरबारों को भयभीत कर दिया; उन्हें अपना भाग्य भविष्य में शंकित दिखाई पड़ी। इस बड़े संगम का क्या अर्थ हो सकता था ? इसके पश्चात् महा- राष्ट्र-मण्डल कौन कार्य अपने हाथ में लेगा तथा अब इसका शिकार कौन होगा। —इत्यादि बातों को जानने के लिये सब लोगों की दृष्टि पूना की ओर लग रही थी क्योंकि पूना के अन्तर्गत हो जाने के कारण अब दिल्ली की कोई गणना ही न होती थी। लेकिन मरहठे अपने ही तईं झूठी बातों के भ्रम में पड़कर परेशान होने लगे। नाना और महादजी अब एक दूसरे के विरुद्ध हो गये थे। सब लोग जानते थे कि इन दोनों
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व्यक्तियों में पारस्परिक द्वेष बढ़ रहा है। पर ये दोनों देशभक्त "हिन्दू- प्रजातन्त्र" स्थापित करने की लालसा और भक्ति के कारण ही अपने भावों को रोके और दबाये हुये थे, और इस प्रजातन्त्र की स्थापना, रक्षा और इसको प्रभावशाली बनाने में, इन दोनों से बढ़कर शायद ही किसी व्यक्ति ने अधिक परिश्रम किया हो पर, क्या वह द्वेषाग्नि, जो आज तक छिपी थी, भड़क कर गृह-कलह पैदा कर देगी ? अगर ऐसा हुआ तो हिन्दू-राज्य के लिये इससे बढ़ कर दुःख की बात और क्या हो सकती है ? सारा महाराष्ट्र इस ख्याल से काँप उठता था; और सब लोग बड़ी चिन्तापूर्वक अपने दोनों बहादुरों और राजनीति-विशेषज्ञों की ओर देख रहे थे । हम पहले ही लिख चुके हैं कि बूढ़ा मुग़ल बादशाह, जो अब भी मरहठों की कृपा से बादशाह की उपाधि का उपभोग कर रहा था, 'वकीले मुतलिक' और 'महाराजाधिराज' का पद महादजी को देना चाहता था; किन्तु इसने अपने लिये अस्वीकार कर उसे अपने स्वामी बालक पेशवा के लिये प्राप्त किया । यह कार्य केवल दिखलाने मात्र को न था । यद्यपि एक बेबस और अयोग्य व्यक्ति के लिये उन पदों का मूल्य उतना भी न था, जितना कि उस काग़ज का मूल्य था जिस पर वह उपाधि लिखी हुई थी, तो भी यह शब्द निरर्थक ही न रहे। उनका पदाधिकारी मुग़ल बादशाह के नाम पर सम्पूर्ण मुग़ल साम्राज्य पर राज्य करने का अधिकारी हो गया और मुग़ल बादशाह ने अपने बादशाही अधिकारों से त्याग-पत्र दे दिया । मरहठों, अङ्गरेज़ों और दूसरे विधर्मियों के बीच बादशाही ताज के लिये मुक़ाबिला था, इसलिये यही उचित समझा गया कि ताज और पद बूढ़े मुग़ल बादशाह के पास पहले ही की भांति बने रहें। इस प्रकार मुग़ल सम्राट् को सारे अधिकारों से वंचित कर दिया गया । लेकिन अङ्गरेज़ और दूसरी मुसलिम शक्तियां भी यह भली-भाँति जानती थीं कि ये पद अगर एक बार भी मरहठों के हाथ में चले गये तो
ऐसे सुरक्षित हो जाएँगे कि उनके पास फटकना भी दुस्तर हो जायगा। अतः द्वेष-भाव से प्रेरित हो, मरहठों को नीचा दिखाने की इच्छा से, अङ्गरेज़ों ने पुराने मुग़ल बादशाह को अपना बादशाह साबित करने की कोशिश की और इस बात को सर्व साधारण पर विदित कराने के लिये उत्तरी सरकार को (जिसे अपने बाहुबल द्वारा उन्होंने बहुत पहले से जीत लिया था) अपने पास रखने के लिये शाहआलम से आज्ञा मांगी। किन्तु मरहठे भी अपने प्रतिद्वन्द्वियों से पीछे रहने वाले न थे। अतएव सम्राट् के नाम की आड़ लेकर वे सब प्रकार से राज्य-संचालन करते रहे और यही कारण महादजी सींधिया के महाराष्ट्र-मण्डल के मुखिया के लिये "महाराजाधिराज" और "वकीले मुत'लिक़" की पदवियों को मुग़ल सम्राट् से प्राप्त करने का था। अब बहुत दिनों के बाद एक अत्यन्त आदर्श जीवन व्यतीत करने के पश्चात् वह अपने छोटे सरदार को नवयुवक भगवान् के रूप में देखने के लिये लालायित होकर आया था; इसलिये प्राप्त किये हुये पदों से उसे विभूषित करने के लिये महा- दजी ने एक महान् उत्सव की आयोजना की। जिस समय महाराष्ट्र-सेनापति महादजी की यह इच्छा हुई कि पेशवा को, जो पहले से ही राजाधिराज हैं, महाराज के पद से विभूषित करें, उसी समय नाना ने एक दल तैयार किया, जो इस पर यह कहकर आपत्ति करने लगा कि इससे महाराज-सितारा का अपमान होगा। ऐसे बहुत से उदाहरण मिल सकते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि एक राज्य के निवासियों या रक्षित राज्यों के पदाधिकारियों ने दूसरे राजाओं के दिये पदों को स्वीकार किया है और उससे उनके राज्य की कोई भी हानि नहीं हुई है। यही नहीं, कितने तो ऐसे भी उदाहरण हैं कि दूसरे राज्य वालों के दिये पदों को लोगों ने यह सोच कर स्वीकार कर लिया है कि उनके राज्य की उन्नति होगी। इन बातों के यथार्थ होते हुये भी, इस विचार से कि जातीय आन्दोलन में किसी प्रकार का भेदभाव न उपस्थित हो, महादजी ने महाराज-सितारा से प्रार्थना की; जिसके उत्तर में छत्रपति
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·ने स्वयं पेशवा को महाराजाधिराज-पद से विभूषित करना स्वीकार किया। इन राजनैतिक कठिनाइयों के दूर हो जाने पर बड़ी धूम-धाम से पेशवा को महाराजाधिराज तथा वकीले-मुतलिक की पदवी दी गई। और यह इनाम उनके वंशजों के लिये सदा के लिये सुरक्षित कर दिया गया। अब पेशवा को मुग़ल बादशाह के नाम पर काम करने का अधि- कार मिल गया। यही नहीं, बल्कि उसके सेनापति महादजी को यह भी अधिकार मिल गया कि मुग़ल बादशाह के जिस पुत्र को चाहें उसका उत्तराधिकारी बनायें। अब सारे भारतवर्ष में घोषणा कर दी गई कि कोई गोवध न करे। सिंधिया, नाना फडनवीस तथा अन्यान्य महाराष्ट्र- सेनापतियों और नेताओं ने इस पवित्र कार्य के लिये उन्हें धन्यवाद दिया। अब मरहठों ने अपने अधिकारों को इस योग्य बना लिया था कि उनके द्वारा अपने प्रतिद्वन्द्वियों को चाहे वे यूरोपियन हों या एशि- याई—तथा जो मुग़ल बादशाह ही को वास्तविक महाराज मानने के बहाने उनका (मरहठों का) अपमान करते थे—नष्ट कर सकें। शासन-कार्य में भी मरहठों ने मुग़ल बादशाह के स्थानापन्न समझे जाने का दावा पेश किया। वे शाही फ़ौज के सेनापति तथा राज्य के मन्त्री थे; मुग़ल-राज्य के उत्तराधिकारी चुनने के लिये स्वतन्त्र थे; और सब से बड़ी बात तो यह थी कि वकील-ए-मुतलिक (महाराजाधिराज) का पद सदा के लिये उनका हो गया था। जब उत्सव समाप्त हो गया तो मनुष्यों की भारी भीड़ उस जुलूस के महल को लौटने का दृश्य देखने के लिये एकत्रित हो गयी। मनुष्यों की जयध्वनि, और तोप-बन्दूकों की गरज से आकाश गूँज उठा। जुलूस के महल के सामने पहुँचने पर पेशवा ने इसके संयोजकों की बड़ी प्रतिष्ठा की। हिन्दू-पद-पादशाही के सेनापति तथा इस उत्सव के विधाता महादजी अपनी सारी शक्ति और शान का विचार छोड़ कर आगे बढ़, पेशवा का जूता उठा लिया और धीरे से बोला— "हिन्दू-साम्राज्य के अधिपति महाराजाधिराज ! सारे राजकुमार, राजे,
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राजे, तुर्क, मुग़ल बादशाह, रुहेले, नवाब और फिरंगी राजनीतिक क्षेत्र से मिट कर आपके आज्ञापालक बन गये हैं। आपका यह दास जन्म से लेकर अपना माग जीवनकाल हाथ में तलवार लेकर, इस प्रजातन्त्र के हित के लिये, दूर देशों में ही व्यतीत करता रहा है। राजाओं पर विजय प्राप्त करके मारा मान, गौरव और प्रतिष्ठा जो मैंने पाई है, वह भी आपके चरणों मे बैठ कर आपकी जूतियों की रखवाली करने की मेरी तृष्णा को न बुझा सकी । मेरी यह हार्दिक इच्छा है कि दिल्ली में प्रधान- मन्त्री होकर रहने की अपेक्षा मुझे महाराष्ट्र मे पटेल बन कर रहने का अधिकार मिले। अतएव कृपा कर वेदूर देशों मे जाकर काम करने से मुझे मुक्त कर दें और यही सेवा करने की आज्ञा प्रदान करें। मुझे भी अपनी पूर्वजों की भांति आपकी वैयक्तिक सेवा मे समय व्यतीत करने का सुअवसर मिले।” महादजी वाक्-पटु था। पेशवा सव ई माधवराव अच्छी प्रकृति का और सरल हृदय नवयुवक था। वह राजनीति के सम्पूर्ण अङ्गों का ज्ञाता था।, महादजी वस्तुतः पेशवा का भक्त था और शीघ्र ही उसने उसे अपनी ओर आकर्षित कर लिया । उसके हृदय मे हिन्दू-पद पाद- शाही के प्रबन्ध-मन्त्री बनने का इच्छा उत्पन्न हुई, जिस पर इस समय नाना फडनवीस था। कुछ काल व्यतीत हो जाने पर स्वय प्रधान-मन्त्री नाना द्वारा निश्चित कार्यक्रम में हस्तक्षेप करने लगा और एक बार जब सुअवसर मिला तो उसने नाना के विचारों का घोर विरोध किया। लेकिन उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ जब उसने पेशवा को गम्भीरता-पूर्वक यह कहते सुना, "नाना और महादजी मेरे राज्य के दो हाथ हैं। प्रथम दाहिना और दूसरा बायां हाथ है और प्रत्येक अपने २ कार्य में दक्ष है। उनके संगठित कार्य से ही राष्ट्र को उन्नति है। इनमें से कोई अगर अपने पद से जरा भी हटा दिया जाय तो वह शक्तिहीन हो जाएगा।” यद्यपि महादजी बातचीत करते समय बड़ा सतर्क रहा था तो भी नानासाहब के चतुर और बुद्धिमान् मित्रवर्ग से यह बात छिपी न रह सकी।
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इस समाचार को पाकर नाना, हरिपन्त फाड़के और समस्त मन्त्रिवर्ग चौंक पड़ा। उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य, सम्पूर्ण भारत को महाराष्ट्र के हिन्दू-साम्राज्य के अन्तर्गत करना था, जिसमें कोई भी स्वतन्त्रराज्य स्थापित न हो सके, अब अन्धकारमय देख पड़ने लगा। वे इस बात को अपने जीवन-काल में होता नहीं देख सकते थे। वे भली-भाँति जानते थे कि अपने पदों से हट जाने के प्रश्न का निपटारा तो हम त्यागपत्र द्वारा कर लेंगे, पर जनता पर इसका बड़ा बुरा प्रभाव पड़ेगा और वह असन्तुष्ट हो जायगी, जिससे अनिवार्य रूप से परस्पर युद्ध आरम्भ हो जायगा। अपना बयान देने के लिये नाना पूना पहुँचा। अपनी सारी सेवाओं का वर्णन करने के बाद उसने पेशवा से निवेदन किया कि "यदि आप सोन्धिया के हाथ में कठ-पुतली बन जायेंगे तो राज्य पर इसका बड़ा बुरा प्रभाव पड़ेगा। महादजी के परामर्श से यदि आप सहसा कोई काम कर बैठेंगे या कोई नवीन प्रबन्ध शुरू करेंगे तो आपस में लड़ाई छिड़ जायगी और हैदराबाद में तैयारी में लगे हुये मुसलमान तथा राज्य के नाश के इच्छुक अंग्रेजों की अभिलाषा पूर्ण हो जायगी और वे इस राज्य को छिन्न-भिन्न कर डालेंगे।" नेत्रों में आँसू भर कर प्रधान मन्त्री ने कहा—"यदि केवल मुझे अपने पद से हटाने का प्रयत्न है तो मैं प्रसन्नता- पूर्वक हटने को तैयार हूं, और यह मेरा त्याग-पत्र है। यदि इतने से राष्ट्र का भला हो और पारस्परिक युद्ध टल जाय तो कृपा करके मुझे आज्ञा दीजिये कि अब काशीजी जाऊँ और इस संसार से सम्बन्ध विच्छेद करने की कोशिश करूँ।" नवयुवक पेशवा पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा और महाराष्ट्र-निर्माता नाना के इस नम्र निवेदन पर उसका भी हृदय पिघल गया और उच्च स्वर से कहने लगा—"किन कारणों से आप ऐसा कह रहे हैं, और किस प्रकार ऐसे विचारों ने आपके हृदय में स्थान पाया ? आप केवल मेरे मन्त्री ही नहीं, किन्तु मेरे पथ-प्रदर्शक, राज- नैतिक गुरु और मित्र हैं। इस राज्य का सम्पूर्ण भार आपके कन्धों पर है और ज्यों ही आप हट जायेंगे यह गिर कर टुकड़े २ हो जायगा।"
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नाना का गला भर आया और कहने लगे- "महाराज ! आपके जन्मकाल से ही नहीं; किन्तु इसके पहले से भी आपके अधिकारों और इस राज्य की भलाई के लिये मैंने लाखों मनुष्यों से शत्रुता उत्पन्न की । अब मेरी उन सेवाओं की गणना नहीं है और शत्रुओं की बात सुनी जाती है।" उदारचित्त नवयुवक इन बातों को सुन कर इतना दुःखी हुआ कि अपने राज्य के प्रधान और नाना के प्रधान-मन्त्री होने की सुधि भी उसे न रही और प्रेम से अधीर होने के कारण उसके गले में अपना हाथ डाल कर सिसकते हुये कहने लगा— "मेरा त्याग न कीजिये; दुःखित होने का कोई कारण नहीं है, आप न केवल मेरे प्रधान-मन्त्री ही हैं प्रत्युत् बालपन से आप ही मेरे पिता हैं। यदि मैं अपने मार्ग से पथ-भ्रष्ट हुआ हूँ तो उसके लिये क्षमा कीजिये। कदापि मैं तुम्हें अपने पद से त्याग-पत्र देने अथवा पृथक् होने की स्वीकृति नहीं दूँगा। मैं आजीवन आपको नहीं छोड़ सकता।" पेशवा के इन दयायुक्त विश्वासपूर्ण शब्दों से नाना, भाऊ, हरिपन्त फाडके तथा मन्त्री-मण्डल के अन्यान्य नेता सशक्त हुये और महादजी पर भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ा । वे भी विस्मित हो गये । चाहे व्यक्तिगत इच्छा जो कुछ भी रही हो, पर इसमें कुछ सन्देह नहीं कि महादजी हिन्दू-साम्राज्य के उतने ही बड़े भक्त और शुभचिन्तक थे जितना उनके कोई भी सहयोगी कार्यकर्त्ता वे सर्वदा अपने प्राण बलिदान करके उसे सर्वोपरि रखने में प्रयत्नशील रहने वाले थे । यह दादा राघोबा नहीं थे । यद्यपि उनका विचार महाराष्ट्र राज्य को अपने हाथ में रखने का था, पर वह कभी यह नहीं चाहते थे कि आपस में युद्ध हो । अतएव प्रसन्नतापूर्वक मन्त्रिमण्डल के साथ सहमत हो पेशवा की इच्छानुसार चलने पर तैयार हो गये। इसी बीच में हरिपन्त फाडके इत्यादि ने उनको घेर कर सूचित किया कि आपकी, मन्त्रिमण्डल के समस्त अधिकारों को अपने हाथ में रखने की इच्छा के कारण, हम लोगों में प्रतिद्वन्दिता होने
लगेगी, जिससे बाहरी शत्रु प्रबल होकर उस हिन्दू-साम्राज्य को, जिसके लिये सहस्रों वीर आत्मायें बलिदान हो गईं, बड़ी हानि पहुँचायेंगे। नाना ने त्याग-पत्र दे देना उचित समझा है, कारण, वे गृहकलह पसन्द नहीं करते। इन बातों का महादजी पर बड़ा प्रभाव पड़ा और उन्होंने प्रण किया कि भविष्य में अब वह कभी नाना और उसके दल का विरोध न करेगा। जैसा मरहठा इतिहास में कई बार पहिले भी हो चुका है, इस बार भी हुआ। जातीय हित के सामने व्यक्तिगत स्वार्थ को ठुकरा कर दो बड़े नेता सहयोगपूर्वक काम करने को फिर उद्यत हो गये। दोनों ने पेशवा के चरणों के पास बैठ कर शपथ खायी कि आज से वे लोग अपनी पुरानी बातों को भूल जायेंगे और पेशवा तथा इस प्रजातन्त्र की, जो हिन्दुओं और उनके धर्म का रक्षक है, सेवा में जीवन सफल करेंगे। नाना फड़नवीस और महादजी के मनोमालिन्य दूर हो जाने का - समाचार सारे महाराष्ट्र में फैल गया और सब लोगों ने इस बात पर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की। इस का अन्दाजा गोविन्दराव काले के पत्र से-जो उस समय के महाराष्ट्र-मण्डल का एक बड़ा भारी विद्वान् और देशभक्त राजनीतिज्ञ था और निज़ाम-राज्य में रेज़ीडेण्ट नियुक्त था-लग सकता है। यह पत्र निज़ाम की राजधानी से इस प्रकार लिखा गया था-"आप के पत्र ने मुझे प्रसन्न कर दिया और मेरे आनन्द का पारावार न रहा। जब सारा विवरण पढ़ चुका तो हृदय में अनेकों विचार उठने लगे। अटक से हिन्दमहासागर पर्यंत सारा देश हिन्दुओं का होने के कारण हिंदुस्तान है, न कि तुर्किस्तान। पांडवों के समय से लेकर महाराज विक्र- मादित्य तक ये ही हमारे देश की सीमाएं रही हैं और उन्होंने देशकी विदे- शियों से रक्षा की तथा उसपरशासन किया। परन्तु उनके उत्तराधिकारी इतने अयोग्य और नपुंसक निकले कि भारत के शासन की बागडोर यवनों के हाथ में चली गई और हमारी स्वाधीनता का नाश हो गया। बाबरके वंशजोंने हस्तिनापुर या देहली का राज्य जीता और अन्त में औरङ्गज़ेब के शासन-
[ १६३ ] काल में हम इतने दबा दिये गये कि हमारी यज्ञोपवीत धारण करने की धार्मिक स्वतन्त्रता भी छिन गई । इस समय अपने धर्म के निमित्त विवश होकर पोल-टैक्स देना पड़ता था तथा हमें विवश होकर अपवित्र भोजन खरीदना और खाना पड़ता था । 'ऐसे नाजुक समय में महाराज शिवाजी का जन्म हुआ जो एक नवीन युग के प्रवर्तक और धर्म के रक्षक थे । उन्होंने भारतवर्ष के एक कोने को स्वतन्त्र करके हिन्दू-धर्म को शरण दी । उसके पश्चात् नाना साहब और भाऊसाहब हुये, जिनका तेज सूर्य की भांति चमका । जो कुछ हम खो चुके थे वह सब महादजी सींधिया की बुद्धिमत्ता द्वारा हम लोगों ने महाराज पेशवा के शासनकाल में फिर लौटा लिया । यह सब कार्य किस प्रकार सम्पादित हुए यह सोचकर आश्चर्य होता है । एक बार भी सफलता प्राप्त कर लेने पर हम अन्धे हो जाते हैं और उसके भारी परिणाम को नहीं देखते । यदि ऐसी सफलता मुसलमानों ने प्राप्त की होती तो कई इतिहास उनके गुणानुवाद में तैयार हो जाते । मुसलमान एक छोटे काम को भी आसमान तक चढ़ा देते हैं, पर इसके विपरीत हिन्दू यदि कोई कितना भी गौरवपूर्ण कार्य क्यों न करें, हम उस प्रकट तक नहीं करते । किन्तु वास्तव में आश्चर्यजनक घटनाएं हुई हैं; अजेय जीता गया है । मुसलमान राज्य को काफिरों के हाथ मे जाने और काफिरशाही आने की बात सोच २ प्रत्यक्ष रो रहे हैं । 'वास्तव में जिन जिन लोगों ने भारतवर्ष में हमारे विरुद्ध सिर उठाया, महादजी ने सब को चकनाचूर कर दिया । हम लोगों ने जितनी सफलता प्राप्त की है वह मानवशक्ति के बाहर है । बहुत अंशों में सम्पूर्ण होते हुये भी अभी हमें बहुत से कार्य करने शेष हैं । कोई नहीं जानता कि कब और कहां हमारे गुण हमे असफल बनादें और दुष्टों की क्रूर दृष्टि हमारे लिये हानिकारक हो । हम लोगों का गौरव राज्य प्राप्त करने तक ही परिमित नहीं है, हम संसारिक सुखों से ही सन्तुष्ट नहीं हो सकते; वरन् वेद, पुराण और शास्त्रों की रक्षा, धर्म और हिन्दू-सभ्यता की वृद्धि
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और गौ-ब्राह्मण की सेवा करना भी हमारा मुख्य कर्तव्य है; और इन सब उद्देश्यों की पूर्ति की कुञ्जी आप और महादजी के हाथों में है। आप लोगों के बीच का ज़रा-सा भी मनो-मालिन्य शत्रुओं की शक्ति को प्रबल बना देगा। किन्तु अब आप लोगों के आपस में मेल हो जाने के समाचार ने हम लोगों की सारा शंकाओं का अन्त कर दिया। अब अपनी सेनाओं को हम लाहौर में पड़ो रहने दें और सीमान्त की ओर बढ़ने के लिये तैयार हों। हमारे शत्रुओं को यह आशा थी कि हम लोग आपस में लड़कर नष्ट हो जायेंगे; अब उनकी इन आशाओं पर पानी फिर गया। मुझे इसकी बड़ी चिन्ता थी; आज वे सारी चिन्तायें मिट गईं। अच्छा हुआ; बहुत ही अच्छा हुआ, अब मुझे शान्ति प्राप्त हुई है।" सच्चे उत्साही कार्यकर्त्ता द्वारा लिखा हुआ उपरोक्त पत्र, कई दर्जन नीरस इतिहासों की अपेक्षा, मरहठों की आत्मा, स्वभाव और उत्साह का कहीं ठीक चित्र खींच देता है। पर इन महान शंकाओं और आशाओं के संघर्ष के बीच ही महादजी को ज्वर हो गया और पूना के समीप वानावादी में १२ फ़रवरी सन १७६४ ई० को इस संसार से चल बसे। इस से समस्त राष्ट्र शोकसागर में डूब गया। शक्तिशाली सरदार और सेनापति महादजी की मृत्यु को देख कर महाराष्ट्र के शत्रुओं में नवीन जीवन का संचार हो गया, और वे महाराष्ट्र- मंडल को नष्ट करने के लिये प्राण-पण से प्रयत्न करने लगे। इन शत्रुओं में अग्रगण्य निज़ाम हैदराबाद थे जिनको मरहठों ने बिल्कुल निर्बल करके अच्छी प्रकार अपने हाथों में कर लिया था। अब वह मरहठों से बदला लेने का सुअवसर समझ कर उत्तेजित हो उठा। इस समय उसने अपनी सेना पहले की अपेक्षा बारहगुनी कर ली थी; और उसे एक फ्रांसीसी सेनापति की अध्यक्षता में रक्खा था। निज़ाम का मन्त्री मुशरूलमुल्क एक कट्टर मुसलमान था। महादजी ने, जो बादशाही अधिकार मुगल सम्राट से अपने पेशवा के लिये प्राप्त किया था, वह
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उसे असह्य हो गया। मुसलमान गांव-गांव और घर-घर घूमकर डींग मारते फिरते और कहा करते थे कि शीघ्र ही युद्ध होगा; जिसमें काफिर- शाही का अन्त होगा और पूना में मुसलमानी ध्वजा फहराएगी। निज़ाम का मन्त्री इतना ढीठ हो गया कि जब मरहठा रेजिडेण्ट ने उससे चौथ मांगी तो उसने उत्तर दिया कि नाना स्वयं हैदराबाद आवें और हमें बतलावें कि उन्हें "चौथ" लेने का क्या अधिकार है। फिर उसने कहा— "यदि नाना यहां स्वयं न आएगा तो मैं शीघ्र ही उसे यहां ले आऊँगा।" फिर यह सोच कर कि सम्भव है कि इतने ही अपमान करने पर मरहठे लड़ने को उद्यत न हों, निज़ाम ने एक बादशाही उत्सव किया जिसमें दूसरे देशों के भी राजदूत बुलाये गये थे। उन राजदूतों के समक्ष अपने दो दरबारियों को नाना और माधोराव पेशवा बना कर उनका हर प्रकार से परिहास किया गया। इस पर मरहठे राजदूत गोविन्दराव पिंगले और गोविन्दराव काले क्रोध भरे उठ खड़े हुये और निज़ाम के इस असभ्यता- पूर्ण कार्य का घोर विरोध और निन्दा की और अन्त में मरहठा वीर ने ललकार कर कहा, "ऐ मुशीरुलमुल्क ! तू ने कई बार अपनी शक्ति पर अभिमान करके नाना को नीचा दिखलाने का प्रयत्न किया और चाहा कि उन्हें हैदराबाद आने के लिये विवश करूं, किन्तु स्वयं अपमानित हुआ। इस बार भी तूने इस राजदरबार में हमारे स्वामी का अपने दरबारियों द्वारा अपमान कराया है। मैं आज ही ललकार कर कहे देता हूँ कि यदि मरहठे तुमको जीते पकड़ कर महाराष्ट्र की राजधानी में तमाशा बनाकर न घुमायें तो मेरा नाम गोविन्दराव नहीं।" यह कह कर मरहठे-राजदूत निज़ाम के दरबार से निकल कर पूना के लिये चल दिये और पूना पहुँच कर लड़ाई की घोषणा कर दी। अंग्रेज़ दोनों विपक्षियों के हितकारी बनने का ढोंग दिखाने के लिये सुलह कराने का प्रयत्न करने लगे; किन्तु मरहठों ने उन्हें डांट कर कह दिया कि महाराष्ट्र-के कार्यों में आप लोग कभी भी हाथ न डाला करें। इस भाव को जानकर अंग्रेज़ ऐसे भयभीत
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हुये कि यद्यपि निज़ाम ने उनकी सहायता चाही, किन्तु अंग्रेजों ने देने का साहस न किया। निज़ाम ने लड़ाई की बड़ी तैयारी की थी। उसका मन्त्री बड़ी बड़ी डींगे मारता था और उसने कुछ मुसलमान मौलवियों को आज्ञा दे दी थी कि घूम-घूम कर यह प्रचार करो कि यह धार्मिक युद्ध है और इसमें भाग लेना प्रत्येक मुसलमान का परम कर्त्तव्य है। काफ़िरों का सत्यानास करके पूना को लूट कर जला देना हमारा परम धर्म है। वज़ीर मुशरुलमुल्क स्वयं कहा करता था कि मैं मुगलराज्य को मरहठों की पराधीनता से मुक्त करूँगा और इस बार नवयुवक पेशवा को भिक्षुक बना दूँगा, ताकि वह महाराष्ट्र छोड़ कर बनारस जाकर द्वार-द्वार भिक्षा मांगे। जबकि हैदराबाद का वज़ीर इस प्रकार की डींगें मारने में चूर हो रहा था, उस समय मरहठों का मन्त्री अपनी सेनाओं की गणना कर रहा था, और आक्रमण करने का उपाय सोच रहा था। यद्यपि उनके वीर सरदार और प्रधान सेनापति महादजी की मृत्यु हो गई थी, फिर भी मरहठों ने उस समय पूर्ण उत्साह दिखलाया। नाना की बुद्धि कभी इतनी प्रखर न हुई थी। अपने समाज के लोगों पर उसका जैसा अद्भूत प्रभाव इस बार दिखाई दिया पहले कभी देखने में न आया था। उसकी आज्ञा पर महाराष्ट्र की दूर देशों में फैली सेना, हिन्दू-पद-पादशाही के नाम पर पूना में एकत्रित होने लगी। महादजी का उत्तराधिकारी दौलतराव सींधिया, आगरे का रक्षक जीवादादा बख्शी, दूसरे सेनापति, और जो सेनायें उत्तरी भारतवर्ष में पठानों, रुहेलो और तुर्कों को आधीन किये हुए थीं, बुलाई गईं। तुकाजी होल्कर अपनी सेना के साथ वहां पर पहले से उपस्थित था। राघोजी भोंसला एक शक्तिशाली सेना लेकर नागपुर से चल पड़ा। गायकवाड़ भी बड़ौदा से चल कर पूना में आ पहुंचा। पटवर्धन, रास्ते, राजेबहादुर और विनचुरकर, घाटगे, च्यावन, डाफिले, पवार, थोराट आदि बहुत से सरदार और सेनापति इस स्थान पर एकत्रित हो गये। पेशवा
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ने स्वयं अपने मन्त्री को लिये सेना के साथ प्रस्थान किया। यह पहला अवसर था जब कि नवयुवक पेशवा ने स्वयं युद्ध में भाग लिया था। यह देखकर मरहठे-सिपाही, शूरता और वीरता से भर उठे और इस आक्रमण को बहुत आवश्यक समझने लगे। निज़ाम पहले से ही रणक्षेत्र में डटा था। निज़ाम के साथ एक लाख दस हज़ार घुड़सवार और पैदल सेना और बहुत बड़ा तोपखाना था। उसे विश्वास था कि वह विजयी होगा। मरहठों की बहुत-सी सेनायें सीमान्त प्रदेश की रक्षा के लिये पीछे रह गई थीं तथापि एक लाख तीस हज़ार सेना इकट्ठी हो गई। यह दोनों सेनायें महाराष्ट्र के सीमान्त पर पारंदा स्थान पर मिलीं। नाना ने परशु- राम भाऊ पटवर्धन को सारी सेना का सेनापति नियुक्त किया। ज्यों ही दोनों सेनायें इतनी दूरी पर आ गईं कि गोली एक दूसरे तक पहुँच सके, लड़ाई प्रारम्भ हो गई। पठानों ने कई बार मरहठों की सेना को पीछे हटने के लिये विवश किया। चूंकि इस पराजित सेना में परशुराम भाऊ भी सम्मिलित था इसलिए मुग़लों और पठानों की प्रसन्नता का पारावार न रहा और उन्होंने इस सफलता पर अपने खेमे में एक दरबार किया। किन्तु जब मरहठों की मुख्य सेना पहुँची तब निज़ाम को अपनी भूल मालूम हुई। अहमदअली खां ने ५० हज़ार चुनी सेना लेकर मरहठों की सेना का सामना करके बड़ी वीरता से वार करना आरम्भ कर दिया। भोंसले की सेना ने उनका मुकाबला किया और उनकी सेना पर गोलाबारी शुरू कर दी। शीघ्र ही सींधिया के तोप- खाने ने एक दूसरी तरफ़ से गोलाबारी करना आरम्भ कर दिया। लड़ाई ने बड़ा भयंकर रूप धारण कर लिया। मुसलमान अल्लाहोअकबर की ध्वनि से आकाश को गुंजाने लगे, किन्तु फिर भी वे अपने स्थान पर डटे न रह सके। वे पीठ दिखाकर भाग गये और उनकी सेना की बहुत बुरी पराजय हुई। निज़ाम भी बहुत डर गया और लड़ाई के मैदान से भाग गया और रात्रि हो जाने के कारण मरहठों के हाथ न आया। छोटी २ लड़ाइयां सारी रात होती रहीं। घबराहट के कारण मुसलमानी सेना
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तहस-नहस हुई। मौलवी लोगों द्वारा धर्म के नाम उत्साहित किये जाने पर भी मुग़ल घबराहट में पड़ कर अपने ही खेमे लूटने लगे और शीघ्र ही सिर पर पांव रख कर भाग निकले। मरहठे खेमों के रखवाले तम्बूमें थे। जो कुछ लेकर वे आगे जाते थे ये सब ले लिया करते थे। प्रातः काल निज़ाम की सेना पहिली जगह छोड़ कर खारदा गांव के दुर्ग के पीछे जाकर खड़ी हुई। उस समय उसकी सेना में केवल दस हज़ार सिपाही रह गये थे। मरहठे पार्श्ववर्ती पहाड़ों पर से उन पर गोलाबारी करने लगे। दो-तीन दिन तक मुग़ल उसको सह सके। तीसरे दिन उसकी दाढ़ी ही नहीं अपितु उसका धार्मिक साहस भी सच्चे अर्थों में झुलसा गया। तीसरे दिन प्यास से सूखे गले, धुएं से गला घुंटे हुए, शत्रुओं ने लड़ाई को बन्द करने की प्रार्थना की। मरहठों ने कहा कि पहले मिश- रलमुलक को हमारे हवाले करो तब कोई दूसरी बात होगी। लम्पटता- पूर्वक उसने मरहठे-राजदूत का, नहीं २ महाराष्ट्र के मन्त्री का, जो अप- मान किया है, उसको अपनी उस बड़ी भूल का अवश्य बदला देना पड़ेगा। उन्होंने निराश होकर अपने राजमन्त्री को मरहठों के हवाले किया और यह इच्छा प्रकट की कि आप जिस शर्त पर कहें हम लोग सुलह करने को तैयार हैं। पारंदा और ताप्ती के बीच का सारा देश और तीन करोड़ रुपये चौथ का बकाया मरहठों को मिले। इसके अतिरिक्त भोंसला ने १६ लाख रुपया लड़ाई का हरजाना अलग लिया। इन शर्तों पर मरहठों ने निज़ाम की सेनाको जो कि मरहठों की राजधानी पूना को जलाने, लूटने और पेशवा को काशी भेज कर भीख मंगाने आई थी लौट जाने दिया। मिशरलमुलक को मरहठों की विजयी काफ़िरों की सेना के बीच क़ैदी बना कर घुमाया गया। जब वह क़ैदी की दशा में मरहठों के खेमे-खेमे घुमाया जाता था तो काफ़िर उसे देख कर हर-हर महादेव की ध्वनि से आकाश गुंजाते थे। उन्होंने उस आदमी को पकड़ा था, जो नाना के पकड़ने की डींग मारा करता था। मरहठों ने अपने राजदूत
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के प्रण को पूरा किया। सज्जन मन्त्री और सर्व-प्रिय पेशवा ने शत्रु को यह दिखला दिया कि अगर वे चाहें तो उसे पूना के द्वार-द्वार घुमा सकते हैं। किन्तु उन्होंने उसका और अधिक अपमान करना उचित न समझा। नाना ने उसे क्षमा कर दिया। मरहठों ने यह दिखला दिया कि ये जिसे चाहें दण्ड दे सकते हैं, किन्तु वे बहुत लोगों को क्षमा ही कर दिया करते हैं। पेशवा ने सारे सेनापतियों के साथ बड़े धूमधाम और उत्सव के साथ अपनी राजधानी में प्रवेश किया। चारों ओर से मनुष्यों के झुंड-के-झुंड पूना में अपने पेशवा और बहादुर सैनिकों को बधाई देने के लिये आने लगे। पूना अपने विजयी सपूतों के स्वागत के लिये अति उत्तमता पूर्ण सजाया गया था। स्त्रियां बादशाही शहर के महलों की छतों झरोखों पर बैठी हुई विजयी शूरवीरों, सेनापतियों, राजनीतिज्ञों तथा अपने प्रिय पेशवा के ऊपर पुष्पों की वर्षा करती थीं। कुमारी कन्यायें तथा भद्र महिलायें, भक्ति और श्रद्धापूर्वक अपने २ द्वारों पर खड़ी होकर, अपने नवयुवक पेशवा की आरती उतारती थीं। अपनी राज्यभक्त और श्रद्धालु प्रजा द्वारा सम्मानित होता हुआ पेशवा अपने राजमहल की ओर बढ़ता गया। बहुत से सेनापति और सरदार- गण अपनी बड़ी बड़ी सेनायें लिये हुए, राजधानी के चारों ओर बहुत दिनों तक पड़े रहे। यह देखकर नाना के मन्त्रित्व और भाऊ के सेनापतित्व में हिन्दू-महा-राष्ट्र के दिनों की याद आने लगी। प्रिय पाठको! हम कुछ समय तक यहीं रुक जांय और अपने नवयुवक, भाग्यशाली और सुप्रसन्न पेशवा को अपनी प्रजा की अपार भक्ति और सर्वप्रियता का आनन्द लेने के लिये, बलवान् मन्त्रिगणों द्वारा जीते हुये राज्य को प्रजातन्त्र राज्य के उचित विभागों में विभाजित करके उनका सुप्रबन्ध करने के लिये, भविष्य कार्यक्रम बनाने के लिए, प्रान्तों के प्रतिनिधियों और सेनापतियों से परामर्श करने के लिये, महाराष्ट्र के निवासियों को विजय की प्रसन्नता पर आनन्द मनाने के लिये, भाट और
[ २०० ] राज-कवियों को अपने पूर्वजों और सन्तानों के गुणगान जिनको सुनकर अब भी मनुष्य आनन्द से विह्वल हो जाता है किसानों को नाना के सुप्रबन्ध से प्रसन्न होकर अपने हलों के पीछे गाना गाने के लिये छोड़ दें ; और हम उन मन्दिरों के दृश्य को देखें जहां पर सहस्रों मनुष्य भेंट लेकर नाना प्रकार से पूजा करने के लिये एकत्रित हुये हैं और अपने पूजन में मग्न हैं, जहां देशों के भिन्न-भिन्न भागों के यात्री, संन्यासी, योगी, यती और वैज्ञानिक हरिद्वार से लेकर रामेश्वर तक, अपने- अपने कार्यों में निश्चित होकर संलग्न हैं और जहां धनी लोग शास्त्रों और वेदों के अध्ययन के प्रोत्साहन के लिये करोड़ों रुपये व्यय कर रहे हैं, जिससे अध्यापक और विद्यार्थी गुरुकुल और महाविद्यालयों में विद्याध्य- यन कराते और करते हैं, जहां सैनिक और मल्लाह लोग वीरतापूर्ण कहा- नियां अपनी प्यारी स्त्रियों और अपनी पूज्य माताओं को सुना रहे हैं और उन्हें अपने शौर्यपूर्ण कार्यों का समर्थन कराने के लिये शत्रुओं से लूट में पाये हुये हीरे जवाहरात और स्वर्ण को दिखा रहे हैं, सारा महाराष्ट्र स्वतन्त्र है और आनन्द के सागर में किल्लोल कर रहा है। पाठको ! हमें प्रजा को ऐसे आनन्द में ही छोड़ देना उचित है ताकि स्वतन्त्रता और राष्ट्र-महत्ता के फल का उपभोग कर सकें जोकि उन्होंने कई पीढ़ियों के अपार परिश्रम और प्रयत्नों से प्राप्त किया है। यद्यपि उसे परमात्मा ने यह ज्ञान दिया है कि सुख क्षणिक है, तथापि वह सदैव वैभव की चोटी पर रहना चाहता है। इसलिए जितने समय तक उन सुखों को वह भोग सकता है उसे भोग लेने देना चाहिए। अब हम, जो कुछ पहिले संक्षेप से महाराष्ट्र के वर्तमान इतिहास में लिख आये हैं, उसी का सिंहावलोकन करेंगे। हम महाराष्ट्र के इतिहास को भारत के इतिहास से सम्बन्धित करने की चेष्टा करेंगे और यह दिखाने का प्रयत्न करेंगे कि यह भारत के इतिहास का ही एक अंग है एवं उसका एक महत्वपूर्ण और मार्मिक अध्याय है।
उत्तरार्ध सिंहावलोकन १. आदर्श महाराष्ट्र प्रभुत्व के अधीन अखिल भारतीय हिंदू साम्राज्य। "स्वामी हिंदुराज्यकार्यधुरंधरः राज्याभिवृद्धिकर्तेः तुम्हा लोकांचे आज्ञेवगनीं पावले. संपूर्ण हिन्दुस्तान निरुपद्रवी राहे तें, संपूर्ण देशदुर्ग हस्तवश्य करून वारणशीस जाऊन, श्रीविश्वेश्वरस्थापना करितात"॥ ॐ — रामचंद्र पंत अमात्य महाराष्ट्र के इतिहास का सिंहावलोकन हम इस उद्देश्य से कर रहे हैं ताकि विस्तृत वर्णनों के झमेलों में से उन मुख्य २ घटनाओं को पृथक करके ऐसे क्रम से रखें जिससे हम पान-हिन्दू आन्दोलन दृष्टि से वर्तमान महाराष्ट्र के इतिहास का उचित मूल्य आंक सकें और उसकी यथार्थ प्रशंसा भी कर सकें। हमारा ऐसा करने का दूसरा उद्देश्य यह है कि हम इसको इस प्रकार से वर्णन करें जिससे यह प्रकट हो कि महाराष्ट्र का इतिहास भी हिन्दू-राष्ट्रीय इतिहास का ही एक अंग है अथवा ॐ सारे भारत के शासक, अपने राज्य को सुव्यवस्थित रूप से चलाने वाले, राज्य की प्रतिदिवस वृद्धि करने वाले महाराज ! आपकी आशीर्वाद से हमने इस कार्य में सफलता प्राप्त करके सारे भारत में शान्ति स्थापित करदी, सारे किलो पर अपना अधिकार कर लिया, और बनारस में विश्वेश्वर जी की स्थापना की है।
उसका एक अध्याय ही है, यद्यपि वह कितना ही महत्वशाली और शानदार है। इसलिए यह परमावश्यक था कि हम महाराष्ट्र के इतिहास का यथासंभव संक्षेप से वर्णन करते। इसके साथ यह भी जरूरी था कि हम उस मूलकारण, स्रोत तथा प्रेरक शक्ति को भी एक निश्चित रूप में प्रकट करते जिसमें कि प्रोत्साहित होकर सारी महाराष्ट्र जाति एक शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य स्थापित करने तक, संघर्ष तथा, प्रयत्न करती रही और अपने प्राणों की आहुतियां चढ़ाती रही। क्योंकि महाराष्ट्र प्रांत से बाहर वाले लोग महाराष्ट्र के इतिहास के प्रथम भाग से ही भली भांति परिचित हैं और उस भाग का, पिछले भाग की अपेक्षा, मान भी अधिक करते हैं—पिछला भाग बालाजी विश्वनाथ के प्रादुर्भाव तथा महाराष्ट्र-मण्डल की स्थापना से आरम्भ होता है। इसके विषय में लोग बहुत कम जानते हैं। रानाडे जैसे विद्वान् शिवाजी तथा : राजाराम के वंशजों के पूर्ण वृत्तान्त उनके वास्तविक रूप में पहले ही प्रकट कर चुके हैं। हमने भी प्रथम भाग की केवल दो चार घटनाओं का ही स्थूल दृष्टि से वर्णन किया है। दूसरे भाग का हमने विस्तार पूर्वक वर्णन किया है यद्यपि वह भी सम्पूर्ण नहीं कहा जा सकता। दूसरे भाग के आरम्भ होने के साथ ही महाराष्ट्र का इतिहास विशेष महाराष्ट्र का इतिहास नहीं रह जाता, वरन् वह इतना महत्वशाली बन जाता है कि उसे सारे भारतवर्ष का इतिहास मानना पड़ता है। पान-हिन्दु सिद्धांत की दृष्टि से महाराष्ट्र इतिहास का सिंहाव- लोकन करने, तथा उन सिद्धान्तों को, जिन सिद्धान्तों ने कि महा- राष्ट्रवासियों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रोत्साहित किये रखा—निश्चित रूप में प्रकट करने का जो हमने प्रयास किया है, उनके संबन्ध में हमने अपनी ओर से कुछ नहीं लिखा, अपितु उस आन्दोलन के संचालक विचारकों तथा कार्यकर्ताओं तथा उनके महान् उद्देश्यों से ही उसका समर्थन कराया है। इस आन्दोलन में सम्मिलित होनेवाले वीर मुख से कुछ न कह