हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १८३ ] अत्याचार करने लगे, मानो इसलाम के नाम पर अन्य धर्मावलम्बियों पर कर रहे हों। इसी भांति जो पहले बाहर अन्याय करता है कभी न कभी घर पर भी अवश्य करता है। अतः अन्यायी कभी-न-कभी अपना ही नाश करते हैं, इसमें संदेह नहीं। अब अपने ही धर्मावलम्बियों द्वारा किये गये क्रूर तथा राक्षसी कृत्यों और अपमानों से नगर-निवासिनी मुसलिम-कन्याओं की कौन रक्षा करने वाला था काफिरों यानी हिन्दू और मरहठों के अतिरिक्त ऐसी और कोई नहीं कर सकता था। दिल्ली राज्यसिंहासन के अधिपति इन मुगलों और इनके पूर्वजों ने हिन्दुओं के मन्दिरों को धूल में मिला दिया था, उनकी मूर्तियां तोड़ डाली थीं। वे उनकी रानियों और राजकुमारियों को पकड़कर अपने महलों में ले गये थे। उन्होंने हिन्दू कन्याओं के सतीत्व को बलात्कार भ्रष्ट किया था। नवयुवकों को उनके धर्म से वंचित किया था। उन्होंने माता को बच्चे से, बहिन को भाई से जुदा किया था और हिन्दुओं के रक्त से होली खेली थी। यह सब कुछ इस लिये करते थे कि वे ग़ाज़ी की प्रतिष्ठा तथा इस दुनियां में धर्म-रक्षक की पदवी प्राप्त कर सकें तथा दूसरी दुनियां में अपने लिये पुण्य के भागी बन सकें। और अब हिन्दू दिल्ली में आ रहे हैं; लेकिन मसजिदों को तोड़ने के लिए नहीं; उनके खंडों को टुकड़े टुकड़े करने के लिये नहीं; मकबरों को धराशायी करने के लिये नहीं और न ही उन्हें अपवित्र करने के लिये; वे किसी राजकुमारी या दीन से दीन मुसलमान-कन्या पर हाथ लगाने या उसे हिन्दू बनाने के लिये, माता को बच्चे से छीनने अथवा पिता का पुत्र से वियोग कराने के लिये नहीं आ रहे। वे सत्यनासिनी शराब में पागल होकर खून बहाने या अपनी प्रतिष्ठा और गौरव का अंदाज़ा शत्रु के धड़से पृथक् की हुई खोपड़ियों के ढेर लगा कर लगाने नहीं आ रहे। उनका उद्देश्य राजधानी को जला कर राख कर डालने का भी नहीं है। वे ऐसा कर सकते थे; और अगर करते भी तो मुसलमानों