हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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की अपेक्षा उनकी देशभक्ति का आदर्श, जनसमुदाय के हित का विचार और संगठन कम था। इसी कारण उन्हें अंत में अंग्रेज़ों से पराजित होना पड़ा। यह सब होते हुए भी मरहठे हिन्दू-आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में रखने और अपने आप को हिन्दू-पद-पादशाही का चिन्ह और कार्यालय मानने में न्याय-युक्त ही थे। सबसे पहले इन्होंने ही साहस किया और इतनी सफलता प्राप्त की, इतना स्वार्थ त्याग और इतना आत्मसमर्पण किया। इसलिये यदि हम निष्पक्ष होकर विचार करें तो ऐसी दशा में जो उन लोगों ने सारे भारतवर्ष को अपने अधीन और अपनी ध्वजा के नीचे लाने का प्रयत्न किया यह बिल्कुल उचित ही था। उन्होंने अपने ही ऊपर हिन्दू-धर्म की रक्षा के उत्तरदा- यित्व के भार को लिया। उनका ऐसा करना पान-हिन्दू दृष्टि से प्रत्युत्तम था, क्योंकि जो कुछ हम संक्षेप में लिख आये हैं, उससे यही सिद्ध होता है कि उनके भीतर हिन्दूधर्म की रक्षा करने की शक्ति वर्तमान थी। यदि हिंदू-जाति के अन्तर्गत कोई दूसरा सम्प्रदाय इसी प्रकार साहस करके इतनी सफलता प्राप्त करने के पश्चात् मरठों को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिये कहता तो पान-हिन्दू दृष्टि से वह ऐसा करने में न्याय ही करता। यह बात अधिक महत्व की नहीं कि हिन्दुराज्य या हिंदु-पद-पाद- शाही राजपूतों, सिक्खों, तामिल अथवा कोलौं या बंगाली आदि किस की पादशाही है। यह पादशाही चाहे किसी की होती, जिस किसी ने सामाजिक, जातीय आदि किसी रूप में हिन्दू धर्म की रक्षा का प्रण कर के समस्त भारत के हिन्दुओं को एक विशाल हिन्दू-साम्राज्य की छत्रछाया में लाने का प्रयत्न किया होता, वही समस्त भारतियों की कृतज्ञता और श्रद्धा का पात्र अवश्य होता।