भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 254 में से

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गुलाम और पराधीन कहलाने में कुछ भी लज्जा अनुभव न होती थी वरन् इसी बात में वे अपना गौरव समझते थे । परन्तु यदि मरहठे, जो कि स्पष्ट उनके सामने हिंदू जाति के मान और अधिकारों के लिए लड़ रहे थे, उनको हिंदू-साम्राज्य के प्रति भक्ति प्रदर्शन करने के लिए कहते तो यह बात उनके लिए असह्य हो जाती। जब मरहठों के अश्वारोही उन्हें, जिन्हें कि वे स्वभावतः मुसलमानों के मित्र समझते थे, दण्ड देते तभी वे अपने आपको धन्य मानते थे। मरहठों के वे लोग इस समय तक शत्रु बने रहते थे जबतक कि उन्हें महाराष्ट्र हिंदू साम्राज्य का प्रभुत्व स्वीकार करने पर विवश न कर दिया जाता या उनके स्वामी मुसलमान-शासक मरहठों से हार कर उनकी अधीनता स्वीकार न कर लेते थे । वे अपनी इच्छा से मरहठों के अधीन होना कभी भी पसंद नहीं करते थे। कुछ ऐसे हिंदू-राजा भी मरहठों से लड़े जो विदेशी शत्रुओं का नाम भारतवर्ष से मिटा देने के लिये उतने ही उत्सुक थे जितने कि मरहठे । उन पर भी पान हिंदू-आंदोलन का प्रभाव पड़ा हुआ था। ये लोग इस बात पर हठ कर रहे थे कि मरहठों को क्या अधिकार है कि वे भारतवर्ष की स्वतंत्रता की लड़ाई के मुख्य कार्य-कर्त्ता बनें और दूसरे राजाओं को अपने साम्राज्य की अधीनता स्वीकार करने के लिये विवश करें । अब प्रश्न यह उठता है कि मरहठों के अतिरिक्त दूसरे राजाओं या जातियों ने अपने आप को भारत की सर्वश्रेष्ठ शक्ति स्वीकार कराने का प्रयत्न क्यों न किया ? इनमें कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके पूर्वजों ने हिंदू-धर्म की रक्षा भारतवर्ष के बहुत बुरे दिनों में की थी। इस समय जबकि मुगल राज्य की अवनति हो रही थी, सबको अपनी योग्यतानुसार अपना २ हिंदुराज्य बनाने का सुअवसर मिला था। इसलिये मरहठे भी अपने लिये एक राज्य स्थापित करने का प्रयत्न करने लगे। भला वे ऐसा क्यों न करते ? दूसरे राजों का दावा उचित ही था, किंतु मरहठों का विचार भी तो अनुचित न था। पान-हिंदू दृष्टि से प्रत्येक हिंदू को ऐसा

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